झारखंड की राजधानी रांची की गलियों में कोयले की धीमी आंच पर सिकने वाली पारंपरिक लिट्टी का स्वाद इन दिनों लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। बिहार के नवादा जिले के मूल निवासी सोनू के इस ठेले पर हर दिन कुछ ही घंटों में लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। यहां रोजाना केवल 3 से 4 घंटे के भीतर लगभग 150 पीस लिट्टी पूरी तरह बिक जाती है और दुकान पर माल आउट ऑफ स्टॉक हो जाता है। खाने के शौकीनों के लिए यह थाली 30 से ₹40 के किफायती बजट में उपलब्ध कराई जाती है, जिसमें स्वाद और पारंपरिकता का पूरा मेल नजर आता है।
स्वाद की थाली में क्या है खास
सोनू की दुकान पर परोसी जाने वाली लिट्टी की सबसे बड़ी खासियत इसे पकाने का पारंपरिक अंदाज है। इसे किसी आधुनिक ओवन या गैस पर नहीं, बल्कि शुद्ध कोयले की धीमी आंच पर धीरे-धीरे पकाया जाता है। इस पारंपरिक तरीके से पकने के कारण लिट्टी में एक खास सौंधापन आ जाता है, जिसे लोग बेहद पसंद करते हैं। ग्राहकों की थाली में लिट्टी के साथ बैंगन का भर्ता, चोखा, दो अलग-अलग तरह की चटनियां, बारीक कटा प्याज और हरी मिर्च दी जाती है। यह पूरा संयोजन मिलकर लिट्टी के स्वाद को कई गुना बढ़ा देता है।
गोलगप्पे से लिट्टी बनाने तक का सफर
खानपान के कारोबार में सोनू का सफर काफी दिलचस्प रहा है। उन्होंने शुरुआत में गोलगप्पे तैयार करना सीखा था और उनका वह काम काफी हिट भी रहा। हालांकि, उनका संबंध बिहार के नवादा जिले से है, जहां लिट्टी चोखा लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और संस्कृति का अटूट हिस्सा माना जाता है। सोनू ने बचपन से अपने घर में मां को लिट्टी बनाते हुए देखा था। वहीं से उन्होंने लिट्टी तैयार करने का हुनर सीखा। सोनू बताते हैं कि अभ्यास करते-करते वह अपनी मां से भी बेहतर स्वाद वाली लिट्टी पकाने लगे, जिसे उनके परिचित और ग्राहक खूब पसंद करने लगे।
घाटे की दुकान से नया कारोबार
पहले सोनू अपने बड़े भाई के साथ मिलकर काम संभाला करते थे, लेकिन उनके मन में हमेशा से खुद का स्वतंत्र उद्यम शुरू करने की इच्छा थी। इसी दौरान उन्हें इलाके में एक ऐसी दुकान के बारे में पता चला जो लगातार घाटे में चल रही थी। सोनू ने उस नुकसान में जा रही दुकान की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली और वहां कोयले की आंच पर लिट्टी तैयार करने का काम शुरू किया।
गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सोनू की कार्यशैली भी बेहद अनूठी है। वह पहले से बहुत सारी लिट्टी बनाकर स्टॉक करके नहीं रखते हैं। वह एक बार में सिर्फ 10 से 12 पीस लिट्टी ही तैयार करते हैं, ताकि हर ग्राहक को सीधी आंच से उतरी हुई एकदम गर्म और ताजा लिट्टी खाने को मिले। यही वजह है कि दुकान खुलते ही 4 से 5 घंटे में पूरा सामान खत्म हो जाता है।
स्टाफ की दिक्कतों के बाद पत्नी बनीं ताकत
कारोबार की राह सोनू के लिए बिल्कुल आसान नहीं रही। जब उनकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगी और काम रफ्तार पकड़ने लगा, तब साथ में काम करने वाले लोगों ने कर्मचारियों को भड़का दिया, जिसके बाद स्टाफ अचानक काम छोड़कर चला गया। इसके बाद सोनू ने दूसरा स्टाफ रखा, लेकिन वह भी महज एक महीने बाद काम छोड़ गया। बार-बार कर्मचारियों के चले जाने के बाद सोनू निराश नहीं हुए। उन्होंने खुद अकेले दुकान की कमान संभाली। अब सोनू की पत्नी इस पूरे काम में उनका हाथ बंटाती हैं और दोनों पति-पत्नी मिलकर दुकान का संचालन करते हैं तथा लोगों को गर्मागर्म लिट्टी परोस रहे हैं।



















