जीवन में सीखने की ललक जब किसी पद, प्रतिष्ठा और उम्र के बंधनों से बड़ी हो जाती है, तब कक्षा की सामान्य लकड़ी की बेंच भी कॉर्पोरेट बोर्डरूम से अधिक महत्वपूर्ण लगने लगती है। 68 वर्ष की आयु में रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में स्नातकोत्तर की कक्षा में युवा छात्रों के बीच बैठकर नोट्स तैयार करते डॉ. अशोक कुमार इसी सोच की जीती-जागती तस्वीर हैं। लंबे समय तक सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बड़े औद्योगिक संस्थानों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभालने के बाद उन्होंने अपनी पुरानी पहचान को पीछे छोड़कर एक सामान्य छात्र के रूप में नई शुरुआत की है। उनका कहना है कि वे कॉलेज परिसर में किसी पूर्व उच्चाधिकारी की तरह नहीं, बल्कि एक सामान्य अध्येता के रूप में आते हैं, क्योंकि अगले दो वर्षों तक संस्थागत अनुशासन और सीखने की मर्यादा का पालन करना उनका नैतिक कर्तव्य है।
वरिष्ठ पदों पर काम करते हुए मिलने वाली सुविधाएं, आधिकारिक प्रभाव और चार लाख रुपये का मासिक वेतन छोड़कर उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय लौटना कोई साधारण कदम नहीं है। वर्ष 2025 में एक निजी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट और एडवाइजर की अपनी अंतिम नौकरी को अलविदा कहने के बाद उन्होंने मनोविज्ञान में दाखिला लिया। डॉ. अशोक कुमार के अनुसार, जीवन के इस मोड़ पर उनकी पढ़ाई का उद्देश्य किसी नौकरी की तलाश या करियर में पदोन्नति पाना नहीं है। उनका मुख्य ध्येय उस ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से समझना है, जिसका अनुभव उन्होंने दशकों तक कारखानों, खनन परियोजनाओं और कॉर्पोरेट कार्यालयों में कर्मचारियों के साथ काम करते हुए व्यावहारिक रूप से महसूस किया था।
कॉर्पोरेट अनुभव और मनोविज्ञान विषय चुनने का कारण
औद्योगिक संस्थानों में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान डॉ. अशोक कुमार ने यह गहराई से देखा कि किसी भी उद्यम की सफलता केवल मशीनों, वित्तीय पूंजी या तकनीकी रणनीतियों पर निर्भर नहीं होती। संस्थान की असली ताकत वहां काम करने वाले लोग होते हैं। वे यह समझना चाहते थे कि कार्यस्थल पर कर्मचारियों की मानसिक स्थिति, उनके व्यक्तिगत तनाव और उनके व्यवहार का काम की गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ता है। उन्होंने महसूस किया कि श्रमिकों और प्रबंधकों को किस तरह प्रेरित किया जाए, उनका मनोबल कैसे ऊंचा रखा जाए और उनके कल्याण को सुनिश्चित करते हुए उनसे संस्थान के हित में सर्वोत्तम कार्य कैसे लिया जाए, यह एक अत्यंत गहरा विषय है।
इसी समझ को अकादमिक और वैज्ञानिक आधार देने के लिए उन्होंने स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए मनोविज्ञान को चुना। उनका मानना है कि कार्यक्षमता और मानसिक संतुलन का गहरा संबंध है। जीवन भर लोगों के प्रबंधन से जुड़े रहने के बाद जब उन्होंने अकादमिक दुनिया में कदम रखा, तो उनका उद्देश्य केवल एक औपचारिक उपाधि लेना नहीं था, बल्कि मानव मन की गहराइयों को समझकर स्वयं के दृष्टिकोण को और समृद्ध करना था। वे मानते हैं कि चार लाख रुपये की नौकरी छोड़ना उनके लिए कोई वित्तीय या व्यक्तिगत घाटा नहीं था, बल्कि यह उनके भीतर लंबे समय से दबी उस आंतरिक इच्छा को पूरा करने की दिशा में उठाया गया कदम था, जो भागदौड़ भरे कामकाजी जीवन में पूरी नहीं हो सकी थी।
खगड़िया से शुरू होकर कोल इंडिया के शीर्ष तक की यात्रा
डॉ. अशोक कुमार का प्रारंभिक जीवन बिहार के खगड़िया जिले से जुड़ा रहा है, जहां से उन्होंने 1975 में अपनी मैट्रिक की परीक्षा पास की। स्कूली शिक्षा के बाद वे उच्च अध्ययन के लिए रांची आए और 1977 में साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने इसी कॉलेज में फिजिक्स ऑनर्स में दाखिला लिया, लेकिन परिस्थितियों के कारण वे इस पाठ्यक्रम को पूरा नहीं कर सके। उच्च शिक्षा की दिशा बदलते हुए उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रवेश लिया और इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान उन्होंने भारतीय इंजीनियरिंग सेवा की लिखित परीक्षा में भी सफलता पाई।
वर्ष 1985 में उन्होंने सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट में अपनी औपचारिक पेशेवर सेवा शुरू की। इसके बाद उन्होंने मेघालय में रीजनल स्टडीज, रांची स्थित मुख्यालय और महानदी कोलफील्ड्स में विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं। अपने समर्पण और कार्यकुशलता के बल पर वे महानदी कोलफील्ड्स में डिप्टी जीएम बने और आगे चलकर जनरल मैनेजर के प्रतिष्ठित पद तक पहुंचे। वर्ष 2018 में कोल इंडिया से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी सक्रियता थमी नहीं। शिक्षण के प्रति उनके रुझान को देखते हुए उन्हें केआईटीएस से अध्यापन का प्रस्ताव भी मिला था। हालांकि, इसी दौरान उन्हें एक बड़ी निजी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट का दायित्व मिला, जहां बाद में उन्होंने सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और एडवाइजर के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 2025 में उन्होंने इस कॉर्पोरेट जिम्मेदारी को भी पूरी तरह छोड़ दिया।
कक्षा का माहौल, पारिवारिक संबल और सहपाठियों का साथ
सेवानिवृत्ति के इतने वर्षों बाद विश्वविद्यालय की नियमित कक्षाओं में शामिल होने के इस निर्णय में उनके पूरे परिवार ने संबल प्रदान किया। उनके दोनों पुत्र विदेशों में रहते हैं और उन्होंने अपने पिता के इस शैक्षणिक संकल्प का पूरा समर्थन किया। दिलचस्प बात यह है कि उनकी पत्नी भी उनके साथ ही मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरू करना चाहती थीं, लेकिन घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वे विश्वविद्यालय में नामांकन नहीं ले सकीं। ऐसे में डॉ. अशोक अकेले ही प्रतिदिन कॉलेज जाते हैं और सामान्य विद्यार्थियों की तरह उपस्थित रहते हैं।
पिछले एक वर्ष से कोई औपचारिक नौकरी न होने के बावजूद उन्हें आर्थिक रूप से किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ रहा है। वे अपनी नियमित पेंशन के माध्यम से अपने दैनिक पारिवारिक खर्च और पढ़ाई का प्रबंध कर रहे हैं, जिसे वे अपनी जरूरतों के लिए पूरी तरह पर्याप्त मानते हैं। विभाग में अपने से उम्र में काफी छोटे सहपाठियों के साथ उनका तालमेल भी बेहद सहज है। कक्षा में शुरुआती दिनों के दौरान जब उन्हें नए पाठ्यक्रम और अकादमिक परिवेश में ढलने में समय लग रहा था, तब जॉय नाम के एक सहपाठी ने विषय की अवधारणाओं को समझने और विभाग के माहौल में सहज होने में उनकी काफी सहायता की थी। आज वे अपने सभी सहपाठियों के साथ मिलकर एक समान अध्येता के रूप में पढ़ाई करते हैं।
नई शिक्षा नीति और जीवन पर्यंत अध्ययन की प्रासंगिकता
रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. परवेज हसन का कहना है कि डॉ. अशोक कुमार की उपस्थिति विभाग और पूरे विश्वविद्यालय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका मानना है कि ज्ञान अर्जन की कोई समय सीमा या उम्र तय नहीं की जा सकती। नई शिक्षा नीति का मूल ढांचा भी इसी लचीलेपन को बढ़ावा देता है, ताकि समाज का कोई भी व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव पर अपनी रुचि के अनुसार ज्ञान हासिल कर सके।
विभागाध्यक्ष के अनुसार, इस उम्र में विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले लोग किसी आजीविका या डिग्री आधारित पदोन्नति की होड़ में नहीं होते, बल्कि वे अपनी विशुद्ध बौद्धिक जिज्ञासा और आंतरिक रुचि को संतुष्ट करने आते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आधुनिक समय में मनोविज्ञान विभाग का महत्व और प्रासंगिकता निरंतर बढ़ रही है। विभिन्न क्षेत्रों के वरिष्ठ पेशेवर मानव मन के व्यवहार को समझने के लिए इस विषय की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इससे पूर्व भी विभाग में भारतीय सेना के सेवारत कर्नल और सेवानिवृत्त कर्नल जैसे उच्च पदों पर रहे लोग उच्च अध्ययन के लिए प्रवेश ले चुके हैं।



















