पलामू के रहने वाले पर्यावरणविद् डॉ. कौशल किशोर जयसवाल ने प्रकृति की सेवा में अपना पूरा जीवन लगा दिया है। पर्यावरण संरक्षण के राष्ट्रीय अध्यक्ष और वनराखी मूवमेंट के प्रणेता के रूप में वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। उनके इस लंबे और समर्पित सफर को कई मंचों पर सराहा गया है और उन्हें राज्यपाल द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है। पिछले लगभग 60 वर्षों से वह प्रदूषण के खिलाफ जंग लड़ते हुए मुफ्त पौधे बांटने और रोपने का बीड़ा उठाए हुए हैं।
लाखों पौधे बांटने और उगाने का अभियान
डॉ. कौशल किशोर जयसवाल ने बातचीत के दौरान साझा किया कि यह सम्मान उनके दशकों के कड़े संघर्ष और पर्यावरण के प्रति अगाध प्रेम का नतीजा है। इससे पहले भी उन्हें कई बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उनके निरंतर प्रयासों का दायरा केवल देश तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने कई दूसरे देशों में भी जाकर मुफ्त पौधे रोपने और वितरित करने का काम किया है। ‘पेड़ लगाओ-पेड़ बचाओ’ अभियान के तहत अब तक वह कुल मिलाकर 65 लाख से ज्यादा पौधे मुफ्त में बांट चुके हैं और जमीन पर उनका रोपण भी कर चुके हैं।
उनका यह अभियान देश के 26 राज्यों के 181 जिलों के साथ-साथ नेपाल, भूटान, म्यांमार, सिंगापुर, मलेशिया, अजरबैजान, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान और वियतनाम तक फैल चुका है। आने वाले समय में उनका इरादा ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस मुहिम से जोड़कर एक हरा-भरा और स्वस्थ पर्यावरण तैयार करना है। उनके मुफ्त पौधा वितरण अभियान को 58 वर्ष पूरे हो चुके हैं, जबकि उनके द्वारा शुरू किया गया वनराखी मूवमेंट लगभग पांच दशकों का लंबा सफर तय कर चुका है। इस अनोखे अभियान के जरिए वह पेड़ों को अपने परिवार का सदस्य मानकर उनकी हिफाजत करने का संदेश समाज को देते हैं।
धरती को हरा-भरा रखने का अटूट संकल्प
उनका मानना है कि इंसानों की गलतियों, अंधाधुंध वनों की कटाई और लगातार बढ़ते प्रदूषण की वजह से आज हमारी धरती पर तमाम पेड़-पौधों और जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। पर्यावरण की रक्षा करने का उनका यह सफर वर्ष 1966 में शुरू हुआ था और उन्होंने साल 1967 में अपनी 7.72 एकड़ की निजी जमीन पर पौधे लगाकर ‘जंगल बचाव-जंगल लगाव’ मुहिम को धार दी थी, जिसके बाद उनका कारवां लगातार आगे बढ़ता गया।
इस लंबी यात्रा के दौरान उन्होंने सुंदरलाल बहुगुणा समेत देश के कई जाने-माने पर्यावरणविदों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। लगभग छह दशकों के इस अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अब तक 65 प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। उनका एकमात्र संकल्प आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरती को और अधिक हरा-भरा और रहने योग्य बनाना है।



















