जमशेदपुर के कालू बागान इलाके में स्थित हजरत बाबा सैयद मस्कीन अली शाह की मजार अपनी बेहद अनूठी और खास परंपरा के कारण देश भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। इस मजार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं और इच्छाओं को कागजी चिट्ठियों में लिखकर सीधे मजार परिसर में टांग देते हैं। स्थानीय निवासियों का ऐसा पक्का विश्वास और मानना है कि जो कोई भी सच्चे दिल और साफ नीयत के साथ बाबा के दरबार में अपनी अर्जी लगाता है, उसकी हर दुआ और मुराद समय आने पर जरूर पूरी होती है।
चिट्ठियों में बयां होती हैं जीवन की उम्मीदें
इस पवित्र मजार पर आने वाले लोगों द्वारा लिखी गई तरह-तरह की और अनगिनत चिट्ठियां आसानी से देखने को मिल जाती हैं। इन सभी पत्रों में लोग अपनी जिंदगी से जुड़ी विभिन्न समस्याओं और सपनों का जिक्र करते हैं, जिनमें मुख्य रूप से बेहतर नौकरी मिलना, योग्य जीवनसाथी के साथ शादी होना, संतान की प्राप्ति होना, पूरे परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन के तमाम संकटों व परेशानियों का दूर होना शामिल है। हर व्यक्ति अपनी गहरी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार अपनी मनोकामना को कोरे कागज पर उतारकर उसे मजार की जाली या परिसर में बांध देता है और बाबा से अपनी झोली भरने की दुआ मांगता है। यही कारण है कि यह स्थान तमाम जरूरतमंदों और उम्मीद खो चुके लोगों के लिए आस्था और रोशनी का एक बहुत बड़ा केंद्र बन चुका है।
वर्षों से जुड़ी है लोगों की गहरी अटूट आस्था
मुस्कान और नीतिश जैसे कई ऐसे समर्पित श्रद्धालु हैं जो पिछले कई लंबे वर्षों से लगातार इस मजार पर अपनी हाजिरी लगाते आ रहे हैं। इन सभी का साफ तौर पर यह कहना है कि इस आध्यात्मिक जगह के साथ उनकी बेहद गहरी और पुरानी भावनाएं जुड़ी हुई हैं। उनके अनुभव के मुताबिक, यहां आने वाले हर एक शख्स की अपनी अलग और निजी समस्याएं होती हैं, जिन्हें लेकर वे अपनी फरियाद बाबा के दरबार में लेकर पहुंचते हैं। उन्हें इस बात पर अटूट भरोसा है कि यहां की गई इबादत कभी खाली नहीं जाती और सच्ची निष्ठा से मांगी गई हर मुराद जरूर कुबूल होती है, और इसी पक्के यकीन की वजह से वे पीढ़ी दर पीढ़ी या लगातार सालों से यहां आते चले आ रहे हैं।
सर्वधर्म समभाव और आपसी भाईचारे की मिसाल
कालू बागान में बनी यह ऐतिहासिक मजार ऐसे रिहायशी इलाके के बीच में स्थित है जहां बहुत बड़ी तादाद में हिंदू परिवार भी निवास करते हैं। इसके बावजूद यहां का माहौल पूरी तरह से सेकुलर और गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाने वाला है, क्योंकि यहां केवल किसी एक विशेष जाति या धर्म के लोग ही माथा टेकने नहीं आते हैं। बल्कि इसके विपरीत, समाज के हर वर्ग और अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी पूरी आस्था और अटूट विश्वास के साथ बाबा के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। कोई अपने परिवार की भलाई के लिए तो कोई रोजगार के वास्ते, कोई विवाह के बंधन में बंधने के लिए तो कोई अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना को लेकर यहां अर्जी लगाता है। लोगों का यह आपसी मेलजोल और साझा विश्वास ही इस जगह को समाज में सबसे अलग और खास पहचान दिलाता है.
शांति का अनुभव और शुक्रिया अदा करने की परंपरा
इस मजार पर देश के कोने-कोने से या आसपास से पहुंचने वाले आम लोगों का यह भी कहना है कि यहां कदम रखते ही उन्हें एक बेहद अलौकिक और अलग तरह की मानसिक शांति का अहसास होने लगता है। बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिनकी मुरादें पूरी होने के बाद वे दोबारा इसी पवित्र स्थल पर लौटकर आते हैं और बाबा का आभार व्यक्त करते हुए उनका शुक्रिया अदा करते हैं। स्थानीय परंपरा और मान्यताओं के अनुसार हजरत बाबा सैयद मस्कीन अली शाह की इस मजार को एक ऐसा दरबार माना जाता है जहाँ हर हारा हुआ इंसान अपनी भारी से भारी परेशानियां लेकर आता है और हल्का होकर लौटता है।



















