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झारखंड लोक सेवा आयोग विवाद की सुनवाई से अलग हुईं जस्टिस वेंकिटा सुब्रमणि मोहना, अब 5 अक्टूबर को नई बेंच करेगी विचारझारखंड
29 सित॰ 2026, 8:57 am (16 मिनट पहले)· 0

झारखंड लोक सेवा आयोग विवाद की सुनवाई से अलग हुईं जस्टिस वेंकिटा सुब्रमणि मोहना, अब 5 अक्टूबर को नई बेंच करेगी विचार

सुप्रीम कोर्ट में झारखंड लोक सेवा आयोग से जुड़े विवाद की सुनवाई से जस्टिस वेंकिटा सुब्रमणि मोहना अलग हो गई हैं, क्योंकि वकील रहते हुए वह इस मामले में पैरवी कर चुकी थीं। अब दूसरी बेंच 5 अक्टूबर को छात्रों से जुड़ी अर्जियों और प्राथमिकियों पर सुनवाई करेगी।

झारखंड लोक सेवा आयोग यानी जेपीएससी से जुड़े एक संवेदनशील और बहुचर्चित विवाद की कानूनी प्रक्रिया में शीर्ष अदालत के स्तर पर एक अहम बदलाव हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई कर रही पीठ से जस्टिस वेंकिटा सुब्रमणि मोहना अलग हो गई हैं, जिसके बाद यह पूरा प्रकरण अब एक अन्य पीठ के समक्ष स्थानांतरित कर दिया गया है। न्यायिक मर्यादा और निष्पक्षता की परंपरा का पालन करते हुए यह कदम तब उठाया गया, जब कार्यवाही के दौरान अदालत को अवगत कराया गया कि पीठ में शामिल जज पूर्व में एक वकील के तौर पर इसी विवाद के कुछ पक्षकारों की तरफ से अदालत में पेश हो चुकी थीं।

पुराने कानूनी जुड़ाव के चलते दूसरी पीठ को सौंपा गया मामला

अदालत में जब जेपीएससी से संबंधित याचिकाएं विचार के लिए आईं, तो यह तथ्य सामने रखा गया कि बार में वकालत के अपने दिनों में जस्टिस मोहना ने इस विवाद में शामिल कुछ पक्षों की ओर से पैरवी की थी। न्यायिक सिद्धांतों के तहत किसी भी मामले में हितों के संभावित टकराव को टालने और सुनवाई की पूर्ण पारदर्शिता बनाए रखने के लिए पीठ बदलने का निर्णय लिया गया। अब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 5 अक्टूबर की तारीख मुकर्रर की गई है, जहां एक नई पीठ याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर विचार करेगी।

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याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष कुछ तात्कालिक राहत से जुड़ी मांगें रखी गई हैं। इसमें विशेष रूप से यह आग्रह किया गया है कि इस विवाद के संबंध में छात्रों के विरुद्ध किसी भी प्रकार की दंडात्मक या जबरन कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाई जाए। इसके साथ ही, इस पूरे मामले से जुड़ी सभी प्राथमिकी यानी एफआईआर की मूल प्रतियां अदालत के रिकॉर्ड पर पेश करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है। आने वाली 5 अक्टूबर की तारीख पर यह तय होने की उम्मीद है कि छात्रों की सुरक्षा और आयोग से जुड़े कानूनी विवाद पर अदालत का रुख क्या रहता है।

पोल्लाची से शीर्ष अदालत तक का असाधारण सफर

इस प्रकरण के केंद्र में आईं जस्टिस वेंकिटा सुब्रमणि मोहना हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में शामिल हुई हैं। केंद्र सरकार ने जून 2026 में उनकी पदोन्नति को हरी झंडी दी थी। उनके इस मनोनयन के साथ एक ऐतिहासिक उपलब्धि भी जुड़ी है, क्योंकि वह बार से सीधे उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश नियुक्त होने वाली देश की दूसरी महिला अधिवक्ता बनी हैं। उनसे पहले वर्ष 2018 में जस्टिस इंदु मल्होत्रा को सीधे वकालत से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद पर नियुक्त किया गया था।

जस्टिस मोहना का व्यक्तिगत और शैक्षणिक सफर काफी प्रेरणादायी रहा है। उनका जन्म तमिलनाडु के पोल्लाची में हुआ, जहां वह 13 भाई-बहनों से भरे एक विशाल परिवार में पली-बढ़ीं। उनके पिता ने पहले भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दी थीं और बाद में तमिलनाडु सरकार के अधीन वरिष्ठ एंटोमोलॉजिस्ट के पद पर कार्यरत रहे। उस दौर में उनके घर का माहौल कड़े अनुशासन और अध्ययन के प्रति गहरे समर्पण से बंधा हुआ था।

उनकी माता औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे तक नहीं जा सकी थीं, किंतु उन्होंने अपनी बेटी के भीतर तार्किक बहस करने और सार्वजनिक मंचों पर बेबाकी से अपनी बात रखने की स्वाभाविक क्षमता को समय रहते पहचान लिया था। माता के इसी प्रोत्साहन ने उन्हें विधि के क्षेत्र को अपना करियर चुनने की दिशा दिखाई।

शुरुआती बैच से वरिष्ठ अधिवक्ता और जज बनने का मुकाम

कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में भी जस्टिस मोहना देश के एक ऐतिहासिक बदलाव की साक्षी रहीं। उन्होंने वर्ष 1983 में प्रारंभ किए गए देश के सबसे पहले पांच वर्षीय एकीकृत बीए एलएलबी पाठ्यक्रम के शुरुआती बैच में प्रवेश लिया था। उन्होंने यह डिग्री कोयंबटूर लॉ कॉलेज से हासिल की। उस दौर में कानूनी शिक्षा के संसाधन बेहद सीमित हुआ करते थे और बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते कक्षाएं भी किराए के भवनों में संचालित की जाती थीं।

इन तमाम चुनौतियों के बीच उन्होंने वर्ष 1988 में अपनी वकालत की पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी की और विधि व्यवसाय में कदम रखा। उसी दौर में उनके साथ अध्ययन करने वाले साथियों में केवी विश्वनाथन भी शामिल थे, जिन्होंने बाद में देश के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल, उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और अंततः सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में ख्याति प्राप्त की।

जस्टिस मोहना ने शीर्ष अदालत में वर्षों तक निरंतर वकालत की और जटिल कानूनी मुद्दों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई। उनकी उत्कृष्ट पैरवी और कानूनी दक्षता को मान्यता देते हुए वर्ष 2015 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा प्रदान किया गया था। इसके बाद जून 2026 में सीधे बार से शीर्ष अदालत की बेंच तक का उनका सफर भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। अब सबकी नजरें 5 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां जेपीएससी और छात्रों से जुड़े कानूनी बिंदुओं पर नई पीठ निर्णय लेगी।

सवाल-जवाब

जस्टिस वेंकिटा सुब्रमणि मोहना जेपीएससी मामले की सुनवाई से अलग क्यों हुईं?
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वह अपनी वकालत के दौरान इस मामले से जुड़े कुछ पक्षकारों की ओर से पेश हो चुकी थीं। इसलिए निष्पक्षता बनाए रखने के लिए उन्होंने खुद को अलग कर लिया।
जेपीएससी से जुड़े इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच अब इस मामले पर 5 अक्टूबर को सुनवाई करेगी।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से क्या राहत मांगी है?
याचिकाकर्ताओं ने छात्रों के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने और मामले से जुड़ी सभी एफआईआर अदालत के समक्ष पेश करने की मांग की है।
जस्टिस मोहना सुप्रीम कोर्ट की जज कब बनीं?
केंद्र सरकार ने जून 2026 में उनकी सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में नियुक्ति को मंजूरी दी थी।
सीधे बार से सुप्रीम कोर्ट जज बनने वाली पहली महिला कौन थीं?
वर्ष 2018 में जस्टिस इंदु मल्होत्रा सीधे बार से सुप्रीम कोर्ट जज नियुक्त होने वाली पहली महिला वकील बनी थीं।
जस्टिस मोहना ने अपनी कानूनी शिक्षा कहां से पूरी की थी?
उन्होंने 1983 में कोयंबटूर लॉ कॉलेज में पांच वर्षीय बीए एलएलबी कोर्स में दाखिला लिया और 1988 में अपनी डिग्री पूरी की।
जस्टिस मोहना को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा कब मिला था?
सुप्रीम कोर्ट में वर्षों की वकालत के बाद उन्हें वर्ष 2015 में वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा प्रदान किया गया था।
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