पलामू में इन दिनों कई घरों के गार्डनों में लगे गुड़हल के पौधों को लेकर एक आम शिकायत देखने को मिलती है कि पौधे हरे-भरे तो हैं लेकिन उनमें फूल नहीं खिल रहे हैं। नवरात्रि का पावन त्योहार नजदीक आते ही मां भगवती को अर्पित किए जाने वाले लाल गुड़हल के फूलों की मांग बाजार में काफी बढ़ जाती है। धार्मिक अनुष्ठानों और दैनिक पूजा-पाठ में इस फूल का विशेष महत्व होने के कारण हर कोई चाहता है कि उसका पौधा फूलों से लदा रहे। हालांकि, उचित देखभाल के अभाव में कई बार पौधे केवल पत्तियां ही विकसित करते रह जाते हैं और उन पर कलियां नहीं बनती हैं। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए कुछ कृषि विशेषज्ञों और अनुभवी किसानों ने खास गार्डनिंग टिप्स साझा किए हैं जिन पर अमल करके पौधे की सेहत सुधारी जा सकती है।
पर्याप्त धूप और सही स्थान का चुनाव
पलामू जिले के किसान तारकेश्वर सिंह चेरो के अनुसार गुड़हल के पौधे को बेहतरीन विकास और बंपर फूलों के लिए प्रचुर मात्रा में सीधी धूप की आवश्यकता होती है। पौधे को रोजाना कम से कम पांच से छह घंटे की धूप मिलना अनिवार्य माना जाता है जिससे उसमें कलियों का निर्माण तेजी से होता है। यदि पौधे को घर के ऐसे कोने में रखा गया है जहाँ पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी या धूप नहीं पहुँच पाती है, तो उसकी ग्रोथ पर सीधा नकारात्मक असर पड़ता है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि गमले या पौधे को ऐसी खुली जगह पर स्थानांतरित किया जाए जहाँ उसे ताजी हवा के साथ-साथ भरपूर धूप भी मिल सके।
संतुलित खाद और नाइट्रोजन का प्रबंधन
पौधे में फूल नहीं आने का एक अन्य मुख्य कारण मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन होना है, विशेष तौर पर जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजनयुक्त खादों का प्रयोग। अत्यधिक नाइट्रोजन मिलने से पौधे में केवल हरी पत्तियां और लंबी शाखाएं ही बढ़ती चली जाती हैं, जबकि फूल आने की प्रक्रिया रुक जाती है। गुड़हल के स्वस्थ विकास के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का एक संतुलित अनुपात होना आवश्यक होता है, जिसके लिए सात अनुपात छह अनुपात पांच के अनुपात वाले एनपीके उर्वरक का उपयोग फायदेमंद साबित हो सकता है। खाद डालने के तुरंत बाद पौधे में हल्का पानी देना चाहिए और उसे दोबारा तेज धूप में रख देना चाहिए ताकि पोषक तत्व जड़ों तक आसानी से पहुँच सकें।
नमी नियंत्रण और नियमित प्रूनिंग
गुड़हल के गमले की मिट्टी में हल्की नमी बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इस बात का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए कि जड़ों के पास लगातार पानी जमा न हो। जलभराव होने से पौधे की जड़ें सड़ने लगती हैं और फूल आने की संभावना पूरी तरह खत्म हो जाती है, इसलिए गमले में जल निकासी यानी ड्रेनेज सिस्टम हमेशा दुरुस्त रहना चाहिए। जब गमले की ऊपरी मिट्टी सूखी हुई महसूस हो, तभी आवश्यकतानुसार पानी का छिड़काव किया जाना चाहिए। इसके अलावा समय-समय पर पौधे की हल्की छंटाई यानी प्रूनिंग करने से नई शाखाएं फूटने में मदद मिलती है, क्योंकि इन्हीं नई शाखाओं पर सबसे ज्यादा संख्या में फूल खिलते हैं। पौधे की सूखी, कमजोर और रोगग्रस्त टहनियों को समय पर काट कर अलग कर देना चाहिए।
जैविक पोषण और कीट नियंत्रण के उपाय
पौधे की संपूर्ण ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए हर दस से पंद्रह दिन के अंतराल पर जैविक खाद या अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। कई बार पौधों पर एफिड्स जैसे छोटे कीट हमला बोल देते हैं जो पत्तियों और कलियों का रस चूस लेते हैं, जिससे फूल खिलने से पहले ही झड़ जाते हैं। इस तरह के कीटों की समस्या से निपटने के लिए नीम के तेल का सही मात्रा में घोल बनाकर पूरे पौधे पर नियमित रूप से स्प्रे करना चाहिए। कुल मिलाकर यदि धूप, संतुलित पोषण, नियंत्रित सिंचाई, बेहतर जल निकासी और उचित कटाई-छंटाई का सही तालमेल बिठाया जाए, तो गुड़हल का पौधा बहुत कम समय में अनगिनत फूलों से भर सकता है।



















