झारखंड में दुर्गा पूजा का पर्व अत्यंत उल्लास और भव्यता के साथ मनाया जाता है, जहां हर तरफ आकर्षक पूजा पंडाल और देवी की प्रतिमाएं लोगों को आकर्षित करती हैं। हालांकि पलामू के मेदिनीनगर में कोयल नदी के तट पर स्थित दुर्गाबाड़ी की परंपरा अपने आप में बेहद अनूठी है। इस ऐतिहासिक स्थल पर बीते 112 वर्षों से बंगाली परंपरा के अनुसार ही मां दुर्गा की आराधना की जाती रही है। इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां माता का श्रृंगार बहुमूल्य सोने और चांदी के गहनों से किया जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से भक्त पहुंचते हैं और इस दौरान होने वाला चक्षु दान भी विशेष आकर्षण का केंद्र बनता है।
112 वर्षों से चली आ रही अनूठी बंगाली परंपरा
मेदिनीनगर के इस दुर्गाबाड़ी में होने वाले अनुष्ठान पूरी तरह से बंगाली संस्कृति और रीति-रिवाजों के अनुरूप संपन्न होते हैं। यह पावन स्थल केवल बंगाली समाज के लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि तमाम गैर-बंगाली श्रद्धालुओं की भी अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। जब भी भक्तों की कोई मन्नत पूरी होती है, वे अपनी श्रद्धा के अनुसार मां को सोने और चांदी के आभूषण अर्पित करते हैं। इन्हीं दान में मिले गहनों से हर साल देवी का यह भव्य और अलौकिक श्रृंगार किया जाता है। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे श्रद्धालुओं का विश्वास और समर्पण बढ़ता गया, जिसके परिणामस्वरूप मां के श्रृंगार में उपयोग होने वाले आभूषणों की मात्रा में भी लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
साढ़े सात से आठ किलो सोने-चांदी के गहनों से होता है श्रृंगार
दुर्गाबाड़ी पूजा समिति से जुड़े सैकत चटर्जी ने जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस वर्ष मां दुर्गा का श्रृंगार लगभग 7 से 8 किलो सोने और चांदी के आभूषणों से सजाया गया है। इसमें माता की सोने की आंखें, खूबसूरत बिंदिया, नथिया और बाला के साथ-साथ चांदी के तीन अलग-अलग हार, सीता हार, मांग टीका, कमरधनी, ब्रेसलेट, कंगन, पायल, खड़ग, चांद माला, बाजूबंद और पाजेब जैसे तमाम बेशकीमती आभूषण शामिल हैं। इस बार मां का विशेष मुकुट भी मुख्य आकर्षण का बड़ा केंद्र बना हुआ है, जिसे भक्तों द्वारा समय-समय पर दान किए गए गहनों को आपस में गलाकर ही तैयार किया गया है। केवल मां दुर्गा ही नहीं, बल्कि माता लक्ष्मी और माता सरस्वती का भी सोने-चांदी के गहनों से ही श्रृंगार किया जाता है, जबकि भगवान गणेश और कार्तिकेय को भी सोने का टीका पहनाया जाता है।
चक्षु दान और हर दिशा से निहारती नजर आती हैं मां
दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गाबाड़ी में संपन्न होने वाला मां का चक्षु दान बेहद महत्वपूर्ण और भावुक कर देने वाला अनुष्ठान माना जाता है। ऐसी गहरी मान्यता है कि जब माता की आंखें पूरी तरह बन जाती हैं, उसके बाद भक्त उन्हें जिस भी दिशा या कोने से देखते हैं, उन्हें ऐसा ही प्रतीत होता है कि मां सीधे उन्हीं की तरफ निहार रही हैं। आयोजकों के अनुसार, प्रतिमा के विसर्जन से ठीक पहले माता की आंखों और चेहरे के भावों में इतनी जीवंत और अद्भुत सजीवता दिखाई देती है कि वहां मौजूद श्रद्धालु भावुक हो जाते हैं। यह मनमोहक दृश्य देखने वालों के लिए हमेशा से गहरी आस्था और कौतुक का विषय रहता है।
बैंक लॉकर में पूरी तरह सुरक्षित रखे जाते हैं आभूषण
सैकत चटर्जी ने यह भी स्पष्ट किया कि श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धापूर्वक दान किए गए इन सभी आभूषणों को पूरे साल भर बैंक के लॉकर में अत्यंत सुरक्षित रखा जाता है। हर साल दुर्गा पूजा की षष्ठी तिथि के पावन अवसर पर इन्हें बैंक से बाहर निकाला जाता है और इनसे मां का श्रृंगार किया जाता है। इसके विपरीत, दशमी के दिन प्रतिमा विसर्जन से पहले इन सभी गहनों को एक-एक करके उतारा जाता है और उनकी पूरी गिनती की जाती है। रजिस्टर में विधिवत विवरण दर्ज करने के बाद इन्हें वापस बैंक के सुरक्षित लॉकर में पहुंचा दिया जाता है। परिसर की सुरक्षा को चाक-चौबंद रखने के लिए दुर्गाबाड़ी परिसर में कई सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और मां की प्रतिमा के चारों तरफ मजबूत बैरिकेडिंग की व्यवस्था की जाती है।
लगातार चार पीढ़ियों से जारी है श्रृंगार करने की सेवा
इस आयोजन से जुड़े राजीव मुखर्जी ने बताया कि यहां हर साल मां दुर्गा की प्रतिमा को पूरी तल्लीनতা और विशेषता के साथ गढ़ा जाता है। पिछले चार पीढ़ियों से लगातार सुकुमार जी ही मां का यह श्रृंगार करते चले आ रहे हैं। षष्ठी की रात को ही इन चमकीले सोने-चांदी के आभूषणों से मां को सजाया जाता है। भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने पर जो गहने भेंट किए जाते हैं, उन्हें ही मां को धारण कराया जाता है। यही लंबी और अनूठी परंपरा इस दुर्गाबाड़ी की पूजा को एक विशिष्ट पहचान दिलाती है।
























