झारखंड के कोडरमा जिले की सुरम्य वादियों और घने जंगलों के बीच एक अनोखा शक्तिपीठ स्थापित है, जिसे श्रद्धालु माता चंचला देवी या चंचलिनी धाम के नाम से पूजते हैं। जिला मुख्यालय से लगभग 33 किलोमीटर की दूरी पर नवलशाही क्षेत्र में स्थित यह पवित्र धाम अपनी अनूठी मान्यताओं और धार्मिक विधानों के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। करीब 500 फीट ऊंचे पहाड़ के मध्य भाग में माता का मंदिर बना हुआ है, जहां हर दिन सैकड़ों भक्त मत्था टेकने पहुंचते हैं। इस धाम की सबसे विलक्षण बात यह है कि यहां शक्तिस्वरूपा देवी की आराधना एक कन्या के रूप में की जाती है। इसी कारण मंदिर के गर्भ गृह में सिंदूर चढ़ाने की सख्त मनाही है।
कन्या स्वरूप की आराधना और सिंदूर निषेध की परंपरा
सनातन परंपरा में देवी मंदिरों के भीतर सिंदूर अर्पण को अत्यंत शुभ माना जाता है, मगर चंचलिनी धाम की प्रथा बिल्कुल अलग है। यहां माता चंचला देवी की पूजा बालिका अथवा कन्या रूप में होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुंवारी कन्या को सिंदूर नहीं लगाया जाता, इसलिए इस धाम में पूजा पाठ के दौरान सिंदूर का प्रयोग पूरी तरह प्रतिबंधित है। श्रद्धालु माता को लाल चुनरी, नारियल और सात्विक प्रसाद अर्पित करके अपनी मुरादें मांगते हैं। स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं का मानना है कि जो भी भक्त सच्चे और पवित्र मन से माता के इस बाल रूप की आराधना करता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती। इसी अटूट विश्वास के चलते पूरे वर्ष यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।
501 सीढ़ियों की दुर्गम चढ़ाई और प्राकृतिक गुफा का रहस्य
पहाड़ के सीने पर बसे इस धाम तक पहुंचना आस्था की एक कठिन परीक्षा की तरह है। माता के मुख्य दरबार तक पहुंचने के लिए भक्तों को 501 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। ऊंचे पहाड़ों और हरियाली से आच्छादित जंगलों के मध्य बनी ये सीढ़ियां भले ही थका देने वाली हों, लेकिन श्रद्धालुओं का उत्साह कभी कम नहीं होता। पहाड़ के मध्य में मुख्य मंदिर के पास ही एक प्राकृतिक गुफा भी मौजूद है। इस गुफा के भीतर मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों के दर्शन होते हैं। भक्त इस गुफा को आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र मानते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इतनी कठिन और खड़ी चढ़ाई के बावजूद आज तक किसी भी श्रद्धालु को यहां किसी तरह की शारीरिक परेशानी या दुर्घटना का सामना नहीं करना पड़ा है। भक्त इसे माता की असीम कृपा और सुरक्षा का प्रमाण मानते हैं।
संतान सुख और कारोबार में तरक्की के लिए कठिन अनुष्ठान
धाम के मुख्य पुजारी पवन पांडेय के अनुसार, इस दरबार में भक्त संतान प्राप्ति, व्यापार में बरकत, रोगों से मुक्ति और पारिवारिक संकटों से पार पाने के लिए आते हैं। कई श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी कराने के लिए मंदिर परिसर में ही डेरा डाल देते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में धरना देना कहा जाता है। ऐसे भक्तों के ठहरने के लिए मंदिर प्रांगण में विशेष कमरों का निर्माण कराया गया है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार सात दिन, पंद्रह दिन अथवा पूरे एक महीने तक इन्हीं कमरों में रहकर माता की सेवा करते हैं। इस दौरान वे परिसर की साफ-सफाई में हाथ बंटाते हैं और दोनों पहर की पूजा-आरती में भाग लेते हैं। पुजारी पवन पांडेय बताते हैं कि साधना की इस अवधि में कई भक्तों को स्वप्न के माध्यम से माता के दिव्य संकेत मिलते हैं, जिन्हें संकट निवारण का प्रत्यक्ष प्रमाण समझा जाता है। संकेत मिलने पर भक्त खुशी-खुशी अपने घर लौटते हैं। कई श्रद्धालु मनोकामना पूर्ण होने के बाद पुन: धाम आकर अपनी कुल परंपरा के अनुसार बकरे की बलि भी अर्पित करते हैं।
शिखर पर बुढ़वा महादेव और नवरात्र में कलश स्थापना
चंचला देवी धाम का आध्यात्मिक दायरा केवल देवी के दरबार तक ही सीमित नहीं है। इस पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर भगवान शिव का बुढ़वा महादेव स्वरूप विराजमान है। चोटी पर स्थापित शिवलिंग तक जाने का रास्ता बेहद सीधा और पथरीला है, जहां चढ़ने के लिए श्रद्धालुओं को लोहे के पाइप से बनी सुरक्षा रेलिंग का सहारा लेना पड़ता है। शिखर पर पहुंचकर श्रद्धालु बुढ़वा महादेव का जलाभिषेक करते हैं और हर-हर महादेव के जयकारे लगाते हैं। नवरात्र के पावन पर्व पर इस धाम का परिवेश पूरी तरह भक्ति के रंग में रंग जाता है। इस दौरान पहाड़ पर ही पारंपरिक वैदिक रीति से कलश की स्थापना की जाती है और नौ दिनों तक विशेष अनुष्ठान आयोजित होते हैं। झारखंड के स्थानीय जनपदों के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से भी भारी संख्या में तीर्थयात्री यहां अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं।




















