फसलों की भरपूर पैदावार हासिल करने की होड़ में अक्सर किसान बुवाई की शुरुआत से ही रासायनिक उर्वरकों और महंगे बीजों के प्रबंध में लग जाते हैं। आमतौर पर खेतों में यूरिया समेत कई प्रकार की कृत्रिम खादों का भारी इस्तेमाल देखने को मिलता है, जिससे उत्पादन लागत लगातार बढ़ती जाती है। इस वित्तीय बोझ से बचने और मिट्टी की प्राकृतिक सेहत को सुरक्षित रखने के लिए किसान स्वयं अपने खेत पर जैविक पोषक तत्व तैयार कर सकते हैं। देसी पद्धति से बनने वाला तरल उर्वरक जीवामृत रासायनिक खादों के मुकाबले एक किफायती और बेहद असरदार विकल्प साबित हो रहा है। गाय के गोबर, गौमूत्र तथा छाछ जैसी आसानी से मिलने वाली चीजों से बनने वाली यह खाद कम लागत में खेती को मुनाफे का सौदा बना देती है।
सिरोही के तपोवन में डेढ़ दशक से जैविक खेती की मुहिम
राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित तपोवन परिसर में ब्रह्माकुमारी संस्थान की तरफ से प्राकृतिक और जैविक खेती को प्रोत्साहित करने की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है। इस केंद्र पर पिछले करीब डेढ़ दशक से जीवामृत और ठोस रूप वाले घन जीवामृत के प्रयोग से खेती की जा रही है। यहां सिर्फ खुद खेती करने तक ही काम सीमित नहीं है, बल्कि देशभर के विभिन्न हिस्सों से आने वाले कृषकों को भी इस प्राकृतिक खाद को तैयार करने और खेतों में उसके सही उपयोग का पूरा तरीका सिखाया जाता है। तपोवन से जुड़े बीके ललन भाई के अनुसार, किसान बिना किसी जटिल तकनीक के अपने ही खेत पर इस खाद को बेहद सरलता से बना सकते हैं।
जीवामृत और घन जीवामृत तैयार करने की सरल विधि
तरल जीवामृत खाद बनाने के लिए गाय का ताजा गोबर, गौमूत्र, छाछ, गुड़, नीम और सरसों की खली को निर्धारित मात्रा में पानी के भीतर अच्छी तरह मिलाया जाता है। इस पूरे मिश्रण को तैयार करने के बाद दो से तीन दिनों तक किसी छायादार स्थान पर किण्वन के लिए रख दिया जाता है। जब यह तरल खाद पूरी तरह तैयार हो जाए, तब एक लीटर जीवामृत को 100 लीटर पानी के अनुपात में मिलाया जाता है। इसे छोटे पौधों तक ड्रिप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से पहुंचाया जा सकता है, जबकि बड़े पेड़ों की जड़ों में इसे सीधे तौर पर डाला जा सकता है।
इसी प्रक्रिया से यदि घन जीवामृत बनाना हो, तो तैयार सामग्री में गाय का गोबर मिलाकर उसे दोबारा दो से तीन दिनों तक सड़ने अथवा परिपक्व होने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस तय समय के बाद यह ठोस रूप में खेतों में छिड़काव या मिट्टी में मिलाने के लिए पूरी तरह उपयोगी बन जाता है।
ड्रिप सिंचाई और मिट्टी में सूक्ष्मजीवों का संवर्धन
तपोवन में छोटे पौधों के पोषण के लिए जीवामृत को ड्रिप प्रणाली के जरिए सीधे जड़ों तक पहुंचाया जाता है और बड़े पेड़ों को यह पारंपरिक तरीके से दिया जाता है। इस देसी खाद के प्रयोग से जमीन में मौजूद मित्र सूक्ष्मजीवों और लाभकारी जीवाणुओं को फलने-फूलने का अनुकूल वातावरण मिलता है। लगातार प्रयोग से खेतों में केंचुओं की संख्या में तेजी से इजाफा होता है, जिससे मिट्टी की संरचना भुरभुरी, मुलायम और हवादार बनी रहती है। केंचुओं और सूक्ष्मजीवों की यह सक्रियता जमीन की उर्वरा शक्ति को नई ताकत देती है। फसल की बुवाई करने से पहले ही मिट्टी में जीवामृत अथवा घन जीवामृत मिला देने से पौधों की वृद्धि तेज होती है और उपज की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया जा सकता है।



















