झारखंड के पलामू जिले में लगातार मौसम की अनिश्चितता और सुखाड़ की मार झेल रहे किसानों के लिए स्ट्रॉबेरी की खेती एक बड़ा सहारा बनकर उभरी है। पारंपरिक फसलों में होने वाले घाटे से बचने के लिए किसान अब इस कम समय वाली नगदी फसल की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सही तकनीक और सटीक समय सारणी का पालन किया जाए तो किसान मात्र एक एकड़ जमीन से लगभग 3 से 4 लाख रुपये तक की शानदार कमाई कर सकते हैं। पलामू के कई प्रखंडों में बड़े पैमाने पर इसकी खेती शुरू हो चुकी है, जहां स्थानीय स्तर पर ही बाजार उपलब्ध होने के कारण किसानों को अपनी उपज बेचने में कोई परेशानी नहीं उठानी पड़ती।
टिशू कल्चर पौधों की रोपाई और रिज बेड तकनीक
स्ट्रॉबेरी की बेहतर पैदावार सुनिश्चित करने के लिए कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने विशेष तकनीक अपनाने की सलाह दी है। उनके अनुसार किसानों को टिशू कल्चर लैबोरेटरी से तैयार किए गए स्वस्थ पौधों का ही चुनाव करना चाहिए। इन पौधों को सीधे समतल खेत में लगाने के बजाय मेड़ या रिज बेड बनाकर रोपना सबसे ज्यादा फायदेमंद रहता है।
रिज बेड तैयार करते समय मेड़ की चौड़ाई लगभग 2 से 2.5 फीट और ऊंचाई करीब 25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इस खास बनावट से पौधों की जड़ों तक पानी और जरूरी पोषक तत्व बहुत आसानी से पहुंचते हैं। इसके साथ ही खेत में जलजमाव की समस्या पैदा नहीं होती, जो स्ट्रॉबेरी की जड़ों को सड़ने से बचाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सिंचाई के लिए ड्रिप इरिगेशन सिस्टम का उपयोग करने की सिफारिश की जाती है, जिससे जल की खपत कम होती है और पौधों को आवश्यकतानुसार नमी मिलती रहती है।
मिट्टी की जांच और बलुई दोमट मिट्टी की महत्ता
खेती की शुरुआत करने से पहले खेत की मिट्टी का पीएच टेस्ट कराना अनिवार्य है। स्ट्रॉबेरी के पौधों के विकास और फलों के उत्पादन के लिए हल्की अम्लीय मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसके लिए मिट्टी का पीएच मान 5 से 6.5 के बीच होना चाहिए। यदि मिट्टी में अम्लीयता या क्षारीयता का संतुलन बिगड़ता है, तो पौधों की बढ़वार रुक सकती है और फल का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
मिट्टी की किस्म की बात करें तो बलुई दोमट मिट्टी को स्ट्रॉबेरी की फसल के लिए सबसे उत्तम माना गया है। ऐसे खेत जिनमें पानी की निकासी की समुचित व्यवस्था हो, वहां इसकी पैदावार सबसे अच्छी होती है। यदि खेत में पानी ठहरता है तो जड़ों के गलने का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए बुवाई से पूर्व ही ड्रेनेज सिस्टम को ठीक कर लेना चाहिए।
15 अक्टूबर तक रोपाई और मार्च तक फसल चक्र
पलामू के जलवायु माहौल में स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए अक्टूबर का महीना बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जाता है। किसानों के लिए 15 अक्टूबर तक पौधों की रोपाई का कार्य पूरा कर लेना सबसे उत्तम रहता है। हालांकि इसके बाद भी पौधे लगाए जा सकते हैं, लेकिन समय पर रोपाई करने से फसल को विकास के लिए अनुकूल मौसम का पूरा समय मिल जाता है।
यह फसल सामान्य परिस्थितियों में मार्च महीने तक फल देती है। मार्च के बाद पलामू में तापमान में तेजी से बढ़ोतरी होने लगती है। बढ़ता तापमान और तेज धूप स्ट्रॉबेरी के पौधों और फलों की गुणवत्ता पर बुरा असर डालते हैं, जिससे उत्पादन समाप्त हो जाता है। इसलिए समय प्रबंधन इस खेती की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।



















