हिंदू धर्म में माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए रखा जाने वाला जितिया व्रत (जीवित्पुत्रिका व्रत) बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस उपवास को सबसे कठिन व्रतों में से एक गिना जाता है क्योंकि इसमें महिलाएं लगभग 24 घंटे से अधिक समय तक बिना अन्न और जल के निर्जला उपवास रखती हैं। मुख्य रूप से भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इस पावन पर्व को अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में इस व्रत की तैयारियों को लेकर महिलाओं में अभी से उत्साह देखा जा रहा है।
जितिया व्रत 2026 की तिथि और उदया तिथि का महत्व
देवघर के सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुदगल ने इस आगामी व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त को लेकर विशेष जानकारियां साझा की हैं। उनके अनुसार, साल 2026 में जितिया व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 3 अक्टूबर 2026 को तड़के सुबह 4 बजकर 29 मिनट से हो रही है। यह तिथि अगले दिन यानी 4 अक्टूबर 2026 की रात (तड़के सुबह) 2 बजकर 21 मिनट पर समाप्त होगी। शास्त्रों में उदया तिथि को विशेष मान्यता दी जाती है, इसलिए उदया तिथि के नियमों का पालन करते हुए 3 अक्टूबर को ही मुख्य व्रत रखना सर्वथा उचित और शास्त्रसम्मत रहेगा।
निर्जला उपवास के कड़े नियम और सरगी की परंपरा
जितिया पर्व की परंपराएं बेहद कठोर और आस्था से परिपूर्ण हैं। इस व्रत को करने वाली महिलाएं व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठकर सरगी ग्रहण करती हैं। सरगी खाने की यह रस्म भोर के समय निभाई जाती है, जिसके बाद सूर्य देव के उदय होते ही निर्जला व्रत का कड़ा संकल्प लिया जाता है। इसके बाद पूरे दिन और रात भर पानी की एक बूंद भी गले से नीचे नहीं उतारी जाती। यह तपस्या अगले दिन सूर्योदय के पश्चात विधि-विधान से पारण करने के बाद ही संपन्न होती है। माताओं का विश्वास है कि इस कठिन साधना से उनकी संतान के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उन्हें दीर्घायु प्राप्त होती है।
व्रत से पूर्व विशेष साग खाने का धार्मिक महत्व
ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुदगल बताते हैं कि जितिया व्रत से जुड़ी कई ऐसी पारंपरिक प्रथाएं हैं जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं और जिनका आज भी कड़ाई से पालन किया जाता है। इस व्रत को शुरू करने से ठीक एक दिन पहले विशेष प्रकार का साग खाने की एक अनिवार्य परंपरा कई हिंदू परिवारों में प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस साग का सेवन करना व्रत की पूर्व-तैयारी का एक आवश्यक हिस्सा माना जाता है। इस सात्विक भोजन को ग्रहण करने के पश्चात ही महिलाएं अगले दिन के महाव्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बिना इस अनुष्ठान को अधूरा माना जाता है।
चील-सियारिन की पूजा और जीमूतवाहन की कथा
इस पर्व में केवल शारीरिक तपस्या ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं और प्रकृति के विभिन्न रूपों की आराधना का भी विशेष विधान है। इस दिन महिलाएं विशेष रूप से अपने पूर्वजों यानी पितरों की पूजा-अचना करती हैं, जिससे परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। कई क्षेत्रों में महिलाएं मिट्टी और गाय के गोबर का उपयोग करके चील और सियारिन की सुंदर आकृतियां बनाती हैं। इन आकृतियों को स्थापित कर धूप, दीप और पुष्पों से उनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। जितिया व्रत की पूजा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक कि व्रती महिलाएं जीमूतवाहन की पौराणिक कथा और चील-सियारिन से जुड़ी प्राचीन लोककथाएं न सुन लें। इन कथाओं के श्रवण से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
वर्ष 2026 के लिए शुभ मुहूर्त और समय सारणी
पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए शुभ समय का विशेष ध्यान रखा जाता है। पंडित नंद किशोर मुदगल के अनुसार, 3 अक्टूबर 2026 को ब्रह्म मुहूर्त का समय सुबह 6 बजकर 14 मिनट से शुरू होकर 7 बजकर 3 मिनट तक रहेगा। इसके अतिरिक्त, इस दिन का सबसे कल्याणकारी समय यानी अमृत काल दोपहर में 12 बजकर 35 मिनट से प्रारंभ होकर दोपहर 2 बजकर 5 मिनट तक रहेगा। इन शुभ समयों में पूजा करना अत्यंत फलदायी माना गया है। जैसे-जैसे यह पवित्र त्योहार समीप आ रहा है, श्रद्धालु परिवारों में पूजन सामग्री के संचय और व्रत की आवश्यक तैयारियों को अंतिम रूप देने का काम तेजी से शुरू हो गया है।


















