अक्सर किसान अपनी जमीन पर धान, गेहूं, आलू और अलग-अलग मौसमी सब्जियों की पैदावार करके अपने घर-परिवार का भरण-पोषण करते हैं। अगर मौसम अनुकूल रहे और पैदावार अच्छी मिल जाए तो ठीक-ठाक गुजर-बसर हो जाती है, मगर कई बार मौसम की बेरुखी या मंडियों में उपज का सही भाव न मिलने की वजह से उम्मीद के मुताबिक मुनाफा हाथ नहीं लग पाता। ऐसी अनिश्चितताओं के बीच थोड़ी सी व्यावहारिक सूझबूझ अपनाकर खेत के भीतर ही कमाई का एक नया जरिया तैयार किया जा सकता है। ज्यादातर किसान अपने खेतों की मेड़ों को बिल्कुल खाली छोड़ देते हैं, जबकि थोड़ी सी योजना के साथ इसी अप्रयुक्त जगह का बेहतर इस्तेमाल कर अतिरिक्त उपज निकाली जा सकती है। देवघर की कृषि विशेषज्ञ अंबिका के अनुसार, किसान अपने खेतों की मेड़ों पर मोरिंगा यानी सहजन के पौधे रोपकर अपनी आमदनी को बढ़ाने का प्रयास कर सकते हैं। इस रणनीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि किसानों को अपनी मुख्य नकदी या पारंपरिक फसलों को छोड़ने की तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़ती। धान, गेहूं या सब्जियों की मूल खेती अपनी जगह सामान्य रूप से चलती रहती है और साथ ही साथ मेड़ों पर सहजन के पेड़ भी विकसित हो जाते हैं।
साल भर मांग में रहने वाला बहुउपयोगी पौधा
सहजन एक ऐसी वनस्पति है जिसकी बाजार में मांग पूरे बारह महीने बनी रहती है। इस पौधे की खासियत यह है कि इसके पत्ते, फूल और फलियां सभी का अलग-अलग ढंग से इस्तेमाल किया जाता है। कई इलाकों में सहजन की फलियों को सुटी के नाम से भी जाना जाता है, जिसे लोग बड़े चाव से सब्जी के रूप में पकाते हैं। इसके अलावा इसके पोषक पत्तों का उपयोग भी खान-पान में व्यापक रूप से किया जाता है। विभिन्न हिस्सों के कई तरह के उपयोग होने के कारण मंडियों में इसकी निरंतर मांग बनी रहती है। अगर कोई किसान अपने खेत की खाली सीमा या मेड़ पर इसके पौधे लगाता है, तो उसे मुख्य फसल की पैदावार के साथ-साथ सहजन से भी अतिरिक्त उपज मिल सकती है। इस प्रकार जिस मेड़ पर अब तक कुछ भी पैदा नहीं हो रहा था, वही बंजर पड़ी जगह आमदनी के एक नए स्रोत में बदल सकती है।
पौधे रोपते समय इन सावधानियों का रखें ध्यान
मेड़ पर सहजन की बुवाई या रोपाई करने से पहले किसानों को अपने खेत की भौगोलिक बनावट और मिट्टी की स्थिति का भली-भांति आकलन कर लेना चाहिए। पौधों को इस तरह से व्यवस्थित करना बेहद जरूरी है कि जैसे-जैसे उनकी टहनियां और डालियां बढ़ें, वे मुख्य फसल के नियमित कृषि कार्यों में कोई बाधा न डालें। खेत में उग रही अन्य फसलों तक पर्याप्त धूप पहुंचती रहे और उनकी बढ़वार के लिए खुली जगह बनी रहे, इसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है। यदि पौधों के बीच की दूरी का सही पैमाना रखा जाए और समय पर उनकी डालियों की छंटाई की जाती रहे, तो मेड़ का उपयोग बिना किसी नुकसान के किया जा सकता है। चूंकि हर खेत की मिट्टी, जल निकासी और स्थितियां एक समान नहीं होती हैं, इसलिए पौधे लगाने से पूर्व स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सही दूरी, रोपाई की विधि और देखभाल के तौर-तरीकों की जानकारी लेना ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद रहता है।
उपज और देखभाल से बढ़ेगा कुल मुनाफा
कृषि लागत को देखते हुए छोटी से छोटी जगह का सटीक सदुपयोग करना किसानों के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। जब किसान खेत तैयार करते हैं, तो जुताई, बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरों की मजदूरी पर काफी पूंजी लगानी पड़ती है। ऐसे में यदि मेड़ की खाली पड़ी जमीन पर भी कोई उपयोगी और व्यावसायिक पौधा तैयार हो जाता है, तो उससे प्राप्त उपज का उपयोग या तो घर-परिवार के पोषण में हो सकता है या फिर उसे स्थानीय बाजार में बेचकर नकद पैसे कमाए जा सकते हैं। इस तरीके से होने वाली कुल अतिरिक्त कमाई इस बात पर निर्भर करेगी कि खेत की मेड़ पर कितने पौधे लगाए गए हैं, उनकी देखभाल किस स्तर की है, पौधों से कितना उत्पादन प्राप्त हुआ है और उस समय मंडी में सहजन का क्या भाव चल रहा है।

















