राजस्थान के पाली जिले में एक बेहद असाधारण और दुर्लभ चिकित्सीय मामला प्रकाश में आया है, जहाँ साधारण खाँसी और सीने के संक्रमण की शिकायत लेकर अस्पताल पहुँचे दो सगे भाई-बहनों की आंतरिक शारीरिक संरचना देखकर चिकित्सक स्तब्ध रह गए. सामान्य तौर पर मानव शरीर में दिल बाईं तरफ और लिवर दाईं तरफ होता है, लेकिन इन दोनों बच्चों के शरीर में यह व्यवस्था पूरी तरह उलट निकली. दोनों मासूमों के सीने और पेट के महत्वपूर्ण अंग सामान्य दिशा के बिल्कुल विपरीत स्थिति में कार्य कर रहे हैं.
अस्पताल में नियमित जाँच के दौरान हुआ चौंकाने वाला खुलासा
पाली स्थित बांगड़ अस्पताल के श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. लक्ष्मण सोनी ने बताया कि 25 अक्टूबर को परिजन अपनी 13 साल की बेटी और 10 साल के बेटे को लेकर अस्पताल पहुँचे थे. परिजनों का कहना था कि दोनों बच्चों को शैशवावस्था से ही लगातार खाँसी चलने, साँस लेने में तकलीफ होने और बार-बार निमोनिया की चपेट में आने की समस्या बनी हुई थी. बच्चों की निरंतर बिगड़ती सेहत और पुरानी बीमारी को देखते हुए चिकित्सकों ने उनकी पूरी शारीरिक स्थिति का गहन विश्लेषण करने का निर्णय लिया.
चिकित्सकों ने बीमारी की जड़ तक पहुँचने के लिए बच्चों के कई परीक्षण करवाए, जिनमें सीटी स्कैन, पेट की सोनोग्राफी, ईकोकार्डियोग्राफी तथा अन्य महत्वपूर्ण नैदानिक टेस्ट शामिल थे. जब इन सभी परीक्षणों की रिपोर्ट सामने आई, तो चिकित्सा दल चकित रह गया. दोनों ही बच्चों का दिल सीने के दाईं ओर धड़क रहा था, जबकि उनका लिवर सामान्य स्थान से हटकर पेट के बाईं ओर स्थित था. चिकित्सा जगत में इस प्रकार दोनों भाई-बहनों में एक साथ अंगों की दिशा पलटी हुई मिलना अत्यधिक विस्मयकारी माना जा रहा है.
क्या है साइटस इनवर्सस और कार्टाजेनर सिंड्रोम की स्थिति
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, जब शरीर के आंतरिक अंग अपनी सामान्य स्थिति की तुलना में दर्पण छवि यानी उल्टी दिशा में विकसित होते हैं, तो इस शारीरिक अवस्था को 'साइटस इनवर्सस' कहा जाता है. आंकड़ों के लिहाज से यह बेहद दुर्लभ स्थिति होती है, जो करीब 50 हजार नवजात शिशुओं में से किसी एक में देखने को मिलती है. यह पूरी तरह से एक जन्मजात और आनुवंशिक विकार है, जिसे 'प्राइमरी सिलियरी डिस्काइनेशिया' (PCD) और 'कार्टाजेनर सिंड्रोम' के नाम से भी जाना जाता है.
इस सिंड्रोम में मानव श्वसन तंत्र की आंतरिक कोशिकाओं पर मौजूद बेहद बारीक बाल जैसी संरचनाएं, जिन्हें 'सिलिया' कहा जाता है, सामान्य गति से कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं. स्वस्थ शरीर में सिलिया का प्रमुख दायित्व साँस की नली में प्रवेश करने वाले बाहरी धूल-कणों, बैक्टीरिया और बलगम को निरंतर बाहर की ओर धकेलना होता है. जब ये सिलिया निष्क्रिय या शिथिल हो जाती हैं, तो फेफड़ों और श्वास नली में बलगम जमा होने लगता है. इसी कारण पीड़ित बच्चों को जीवनभर लगातार खाँसी, बार-बार फेफड़ों का गंभीर संक्रमण और साँस संबंधी जटिलताओं का सामना करना पड़ता है.
एक ही परिवार के दो बच्चों में मिलना क्यों है असाधारण
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही माता-पिता की दो संतानों में एक साथ जन्मजात रूप से अंगों का उल्टा होना और इस दुर्लभ सिंड्रोम की मौजूदगी इस मामले को चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है. PCD के कई प्रकार माता-पिता के जीन्स के माध्यम से बच्चों में वंशानुगत रूप से स्थानांतरित होते हैं. हालांकि, चिकित्सकों का यह भी कहना है कि केवल अंगों की विपरीत स्थिति देखकर ही बीमारी की अंतिम पुष्टि नहीं मानी जा सकती, बल्कि इसके पुख्ता प्रमाण के लिए संपूर्ण जेनेटिक परीक्षण कराया जाना अनिवार्य होता है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आम नागरिकों और अभिभावकों को सचेत किया है कि यदि बच्चों में लंबे समय से लगातार खाँसी, कफ या बार-बार निमोनिया होने के लक्षण दिखाई दे रहे हों, तो उसे मौसमी बीमारी समझकर अनदेखा न करें. ऐसे मामलों में समय रहते योग्य श्वास रोग विशेषज्ञों से परामर्श लेकर जरूरी जाँचें करवानी चाहिए, ताकि सही समय पर सटीक निदान और प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके.



















