पारंपरिक तौर-तरीकों को छोड़कर वैज्ञानिक और आधुनिक तकनीकों को अपनाने से बागवानी में किसानों की आय कई गुना बढ़ सकती है. बोकारो के प्रगतिशील किसान शिवनाथ ने इसे सच कर दिखाया है. दूसरे किसानों को नई विधियों से खेती करते देखकर और स्मार्टफोन पर खेती-किसानी से जुड़े वीडियो देखकर शिवनाथ को नई तकनीक अपनाने की प्रेरणा मिली. इसके बाद उन्होंने सब्जियों की व्यावसायिक खेती शुरू की. अब वह मचान और मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल करके करेले की भरपूर पैदावार ले रहे हैं.
अगस्त में रोपाई और 70 दिनों में तुड़ाई
शिवनाथ ने बताया कि उन्होंने अगस्त के महीने में करेले की फसल लगाई थी. करेले की किस्म के आधार पर लगभग 60 से 70 दिनों के भीतर पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है. एक बार तुड़ाई शुरू होने के बाद नियमित अंतराल पर फल तोड़े जा सकते हैं और उन्हें नजदीकी मंडियों में बेचा जा सकता है. इससे किसान को लगातार नकदी मिलती रहती है और फसल का बाजार मूल्य भी बेहतर हासिल होता है.
लागत, उत्पादन और कुल मुनाफे का गणित
शिवनाथ के अनुसार, 70 डिसमिल जमीन पर करेले की पूरी फसल तैयार करने में लगभग 30 हजार रुपये का कुल खर्च आया. इतनी जमीन से करीब 90 से 100 क्विंटल तक करेले का कुल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. थोक मंडियों में करेले का औसत भाव 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम तक रहता है.
यदि 70 डिसमिल खेत से 90 क्विंटल करेले की पैदावार मानकर 20 रुपये प्रति किलो के न्यूनतम औसत भाव पर भी गणना की जाए, तो करीब 1 लाख 80 हजार रुपये की कुल बिक्री होती है. इस कुल बिक्री में से 30 हजार रुपये की खेती की लागत और फसल को बाजार तक पहुंचाने का परिवहन खर्च घटा देने के बाद लगभग 1 लाख 40 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा आसानी से बच जाता है.
पोषण प्रबंधन और कीट नियंत्रण के उपाय
करेले की खेती में आने वाली चुनौतियों पर बात करते हुए शिवनाथ ने स्पष्ट किया कि खाद की कमी अथवा कीटों के हमले के कारण पौधों की पत्तियों में पीलापन आ सकता है. पत्तियों के पीले पड़ने से बेलों की वानस्पतिक वृद्धि रुक जाती है और फल लगने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है. इसलिए किसानों को अपनी मिट्टी की जांच और फसल की आवश्यकता के अनुसार ही संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए.
इसके अलावा खेत की रोजाना निगरानी बेहद जरूरी है. कीटों या रोगों के शुरुआती लक्षण नजर आते ही कृषि विशेषज्ञों की राय लेकर समय पर उचित कीटनाशक या नियंत्रण उपाय करने चाहिए. सही समय पर देखरेख और वैज्ञानिक प्रबंधन से फसल सुरक्षित रहती है, उपज की गुणवत्ता सुधरती है और किसान को अधिकतम आर्थिक लाभ प्राप्त होता है.



















