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मचान और मल्चिंग से करेले की उन्नत खेती कर बोकारो के किसान शिवनाथ ने निकाला भारी मुनाफाझारखंड
30 अक्तू॰ 2026, 12:39 am (6 घंटे पहले)· 0

मचान और मल्चिंग से करेले की उन्नत खेती कर बोकारो के किसान शिवनाथ ने निकाला भारी मुनाफा

झारखंड के बोकारो जिले में किसान शिवनाथ ने आधुनिक कृषि पद्धतियों का सहारा लेकर 70 डिसमिल जमीन पर करेले की खेती की और लागत काटकर 1.40 लाख रुपये की शुद्ध आमदनी हासिल की.

पारंपरिक तौर-तरीकों को छोड़कर वैज्ञानिक और आधुनिक तकनीकों को अपनाने से बागवानी में किसानों की आय कई गुना बढ़ सकती है. बोकारो के प्रगतिशील किसान शिवनाथ ने इसे सच कर दिखाया है. दूसरे किसानों को नई विधियों से खेती करते देखकर और स्मार्टफोन पर खेती-किसानी से जुड़े वीडियो देखकर शिवनाथ को नई तकनीक अपनाने की प्रेरणा मिली. इसके बाद उन्होंने सब्जियों की व्यावसायिक खेती शुरू की. अब वह मचान और मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल करके करेले की भरपूर पैदावार ले रहे हैं.

अगस्त में रोपाई और 70 दिनों में तुड़ाई

शिवनाथ ने बताया कि उन्होंने अगस्त के महीने में करेले की फसल लगाई थी. करेले की किस्म के आधार पर लगभग 60 से 70 दिनों के भीतर पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है. एक बार तुड़ाई शुरू होने के बाद नियमित अंतराल पर फल तोड़े जा सकते हैं और उन्हें नजदीकी मंडियों में बेचा जा सकता है. इससे किसान को लगातार नकदी मिलती रहती है और फसल का बाजार मूल्य भी बेहतर हासिल होता है.

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लागत, उत्पादन और कुल मुनाफे का गणित

शिवनाथ के अनुसार, 70 डिसमिल जमीन पर करेले की पूरी फसल तैयार करने में लगभग 30 हजार रुपये का कुल खर्च आया. इतनी जमीन से करीब 90 से 100 क्विंटल तक करेले का कुल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. थोक मंडियों में करेले का औसत भाव 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम तक रहता है.

यदि 70 डिसमिल खेत से 90 क्विंटल करेले की पैदावार मानकर 20 रुपये प्रति किलो के न्यूनतम औसत भाव पर भी गणना की जाए, तो करीब 1 लाख 80 हजार रुपये की कुल बिक्री होती है. इस कुल बिक्री में से 30 हजार रुपये की खेती की लागत और फसल को बाजार तक पहुंचाने का परिवहन खर्च घटा देने के बाद लगभग 1 लाख 40 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा आसानी से बच जाता है.

पोषण प्रबंधन और कीट नियंत्रण के उपाय

करेले की खेती में आने वाली चुनौतियों पर बात करते हुए शिवनाथ ने स्पष्ट किया कि खाद की कमी अथवा कीटों के हमले के कारण पौधों की पत्तियों में पीलापन आ सकता है. पत्तियों के पीले पड़ने से बेलों की वानस्पतिक वृद्धि रुक जाती है और फल लगने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है. इसलिए किसानों को अपनी मिट्टी की जांच और फसल की आवश्यकता के अनुसार ही संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए.

इसके अलावा खेत की रोजाना निगरानी बेहद जरूरी है. कीटों या रोगों के शुरुआती लक्षण नजर आते ही कृषि विशेषज्ञों की राय लेकर समय पर उचित कीटनाशक या नियंत्रण उपाय करने चाहिए. सही समय पर देखरेख और वैज्ञानिक प्रबंधन से फसल सुरक्षित रहती है, उपज की गुणवत्ता सुधरती है और किसान को अधिकतम आर्थिक लाभ प्राप्त होता है.

सवाल-जवाब

शिवनाथ ने करेले की खेती के लिए कौन सी आधुनिक तकनीकें अपनाईं?
उन्होंने करेले की बेहतर पैदावार लेने के लिए मचान विधि और मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल किया.
करेले की फसल किस महीने में लगाई गई थी?
शिवनाथ ने करेले की फसल की बुवाई अगस्त के महीने में की थी.
करेले की पहली तुड़ाई कितने दिनों में शुरू हो जाती है?
किस्म के आधार पर लगभग 60 से 70 दिनों के भीतर करेले की पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है.
70 डिसमिल जमीन पर खेती करने में कितना खर्च आया?
70 डिसमिल जमीन पर करेले की खेती करने में कुल लागत लगभग 30 हजार रुपये आई.
70 डिसमिल जमीन से कुल कितना उत्पादन प्राप्त होता है?
इस रकबे से करीब 90 से 100 क्विंटल तक करेले का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.
मंडी में करेले का औसत थोक भाव क्या मिलता है?
मंडी में करेले का औसत थोक मूल्य 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम तक रहता है.
लागत घटाने के बाद शिवनाथ को कितना शुद्ध मुनाफा हुआ?
लागत और परिवहन खर्च घटाने के बाद लगभग 1 लाख 40 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ.
करेले की पत्तियों में पीलापन आने का क्या कारण होता है?
खाद की कमी अथवा कीटों के प्रकोप के कारण पत्तियों में पीलापन आ सकता है, जिसे संतुलित खाद और विशेषज्ञ सलाह से ठीक किया जाता है.
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