भारतीय वायुसेना के शीर्ष नेतृत्व में बड़ा बदलाव हुआ है, जहां एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने 29वें वायुसेना प्रमुख का पदभार संभाल लिया है. उन्होंने इस पद पर एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह का स्थान लिया है. वायुसेना में उपप्रमुख रह चुके दीक्षित का लंबा करियर ऑपरेशनल दक्षता, रणनीतिक योजना और आधुनिक तकनीक के समन्वय से भरा रहा है. उनके कमान संभालने के साथ ही भारतीय रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी निर्माण और अत्याधुनिक वायु शक्ति को और अधिक रफ्तार मिलने की संभावना जताई जा रही है.
स्वदेशी लड़ाकू विमानों और तेजस पर रहेगा विशेष फोकस
नए वायुसेना प्रमुख के नेतृत्व में घरेलू स्तर पर विकसित हो रहे रक्षा कार्यक्रमों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता मिलने की उम्मीद है. खासकर हल्के लड़ाकू विमान तेजस की विकास यात्रा और उसकी उत्पादन क्षमता को मजबूत करने में उनकी गहरी दिलचस्पी रही है. वर्ष 2023 में उन्होंने खुद एलसीए तेजस और अन्य घरेलू लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट्स की जमीनी प्रगति की गहन समीक्षा की थी. उस दौरान उन्होंने स्पष्ट किया था कि सुरक्षा बलों की भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भरता और देश में तैयार तकनीक को बढ़ावा देना कितना जरूरी है. उनके इस रुख से आने वाले समय में वायुसेना की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को सीधा लाभ पहुंचेगा.
3500 घंटे से ज्यादा की उड़ान और फाइटर पायलट का सफर
9 दिसंबर 1966 को जन्मे एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित का सैन्य सफर करीब चार दशकों का है. उन्होंने 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में औपचारिक कमीशन प्राप्त किया था. वे राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के साथ-साथ बांग्लादेश के डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज और राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज के पूर्व छात्र रहे हैं. एक कुशल फाइटर पायलट के रूप में उनके पास विभिन्न श्रेणियों के सैन्य विमानों पर 3,500 घंटे से अधिक समय तक उड़ान भरने का गहरा अनुभव है.
अपने करियर में उन्होंने मिराज-2000, जगुआर, हॉक, आईएल-78, किरण, मिग के अलग-अलग संस्करणों और स्वदेशी तेजस जैसे आधुनिक व चुनौतीपूर्ण विमानों को उड़ाया है. वे केवल एक दक्ष पायलट ही नहीं हैं, बल्कि एक योग्य उड़ान प्रशिक्षक और प्रायोगिक परीक्षण पायलट भी हैं. नए सैन्य विमानों के परीक्षण और वैमानिकी प्रणालियों के विकास में उनका यह तकनीकी अनुभव वायुसेना की युद्धक तैयारियों के लिए काफी अहम माना जाता है.
कारगिल से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक अहम योगदान
एयर मार्शल दीक्षित का सेवा इतिहास कई ऐतिहासिक सैन्य अभियानों में सक्रिय भागीदारी का गवाह रहा है. उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ऑपरेशन सफेद सागर, सीमा सुरक्षा से जुड़े ऑपरेशन रक्षक और महत्वपूर्ण ऑपरेशन सिंदूर में सक्रिय भूमिका निभाई. इसके अतिरिक्त वे कई बड़े राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सैन्य अभ्यासों का भी हिस्सा रहे हैं, जहां उन्होंने वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में सामरिक रणनीति का प्रदर्शन किया.
कमान, प्रशासनिक अनुभव और उच्च सैन्य सम्मान
वायुसेना प्रमुख बनने से पहले वे वायुसेना मुख्यालय में उपप्रमुख के रूप में कार्यरत थे. उससे पूर्व उन्होंने एकीकृत रक्षा स्टाफ मुख्यालय में सीआईएससी यानी चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ टू द चेयरमैन, चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली थी. वे सेंट्रल एयर कमांड में एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के पद पर भी सेवाएं दे चुके हैं. क्षेत्रीय स्तर पर उन्होंने पश्चिमी सीमा के अग्रिम लड़ाकू एयरबेस और दक्षिणी कमान के प्रमुख लड़ाकू प्रशिक्षण केंद्र का सफल नेतृत्व किया था.
उत्कृष्ट सेवाओं और असाधारण नेतृत्व के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सैन्य पदकों से नवाजा गया है. उन्हें वर्ष 2006 में वायु सेना मेडल और वर्ष 2011 में विशिष्ट सेवा मेडल दिया गया था. इसके बाद वर्ष 2023 में उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल और वर्ष 2026 में देश के शीर्ष सैन्य सम्मानों में शामिल परम विशिष्ट सेवा मेडल प्रदान किया गया. उनकी यह नई जिम्मेदारी ऐसे वक्त में शुरू हुई है जब वायुसेना तकनीकी आधुनिकीकरण, नेटवर्क-केंद्रित युद्ध प्रणाली और स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर पूरा बल दे रही है.



















