बेंगलुरु के एक सेम सेक्स कपल के बीच दिए गए एक बेहद निजी और भावनात्मक तोहफे ने अब एक बड़ी कानूनी लड़ाई का रूप ले लिया है। यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंच चुका है, और इसका फैसला पूरे भारत में समलिंगी जोड़ों के वित्तीय अधिकारों की दिशा तय कर सकता है। विवाद के केंद्र में सोने की एक चूड़ी और देश के आयकर कानूनों की वह सख्त शब्दावली है, जो LGBTQ+ समुदाय को उन बुनियादी आर्थिक छूटों से वंचित रखती है, जो विपरीत लिंगी शादीशुदा जोड़ों को आसानी से मिल जाती हैं। यह कानूनी जंग इस बात पर रोशनी डालती है कि समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने के बावजूद, सेम सेक्स पार्टनर्स को आज भी रोजमर्रा के वित्तीय और कानूनी मामलों में किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।
एक एनिवर्सरी गिफ्ट और आयकर का नोटिस
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब अखिलेश गोदी ने अपने पार्टनर अनुराग कालिया को उनके रिलेशनशिप एनिवर्सरी के मौके पर एक खास तोहफा देने का फैसला किया। अखिलेश ने अनुराग को 22 कैरेट सोने की एक चूड़ी भेंट की, जो उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली थी। करीब ₹1.15 लाख रुपये की कीमत वाली यह चूड़ी दोनों के रिश्ते और प्रतिबद्धता का एक गहरा प्रतीक थी। लेकिन यह खुशी तब एक कानूनी और वित्तीय परेशानी में बदल गई, जब अनुराग अपना इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने के लिए बैठे। उन्हें बताया गया कि चूड़ी का मूल्य काफी अधिक होने के कारण इसे आयकर के दायरे में रखा जाएगा। कर नियमों के अनुसार, इस तोहफे को "अन्य आय" के रूप में देखा जाएगा, और अनुराग को अपनी जेब से इसके मूल्य पर भारी टैक्स चुकाना होगा, सिर्फ इसलिए क्योंकि सरकार उनके रिश्ते को कानूनी मान्यता नहीं देती है।
आयकर कानून की धारा 56(2)(x) का पेंच
इस टैक्स देनदारी का मुख्य कारण आयकर अधिनियम की धारा 56(2)(x) में छिपा है। इस कानून के मुताबिक, अगर किसी भी व्यक्ति को ₹50,000 से ज्यादा कीमत का कोई गिफ्ट—चाहे वह नकद हो, कोई संपत्ति हो या फिर सोने के आभूषण—मिलता है, तो उसे उस पर टैक्स देना अनिवार्य है। हालांकि, इस नियम में एक बहुत बड़ी छूट भी शामिल है: अगर यह तोहफा किसी "रिश्तेदार" से मिला है, तो उस पर कोई कर नहीं लगता। आयकर विभाग ने "रिश्तेदार" की एक बहुत ही स्पष्ट परिभाषा तय कर रखी है, जिसमें माता-पिता, भाई-बहन जैसे खून के रिश्ते और "पति या पत्नी" शामिल हैं। चूंकि भारत में सेम सेक्स विवाह को अब तक कोई कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है, इसलिए अखिलेश और अनुराग का रिश्ता इस परिभाषा में फिट नहीं बैठता। वे न तो रक्त संबंधी हैं और न ही कानून की नजर में पति-पत्नी हैं, जिसके चलते उन्हें इस छूट से बाहर कर दिया गया है।
'दंपत्ति' शब्द की व्याख्या को लेकर हाईकोर्ट में चुनौती
इस व्यवस्था को सीधे तौर पर भेदभावपूर्ण मानते हुए, अखिलेश और अनुराग ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। दोनों ने अदालत में जोरदार तर्क दिया है कि आयकर का यह नियम समानता के अधिकार का हनन करता है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि अगर वे विपरीत लिंग के होते, तो यह ₹1.15 लाख का गिफ्ट पूरी तरह से टैक्स-फ्री होता। इस असमानता को दूर करने के लिए कपल ने हाईकोर्ट से मांग की है कि आयकर कानून में लिखे गए "दंपत्ति" शब्द को लिंग-तटस्थ नजरिए से पढ़ा जाना चाहिए। उनका कहना है कि इस शब्द का दायरा बढ़ाकर सेम सेक्स पार्टनर्स को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए, या फिर कानून में इस तरह से बदलाव किए जाने चाहिए कि समलिंगी जोड़ों को भी कर छूट का यह बुनियादी अधिकार मिल सके।
केंद्र सरकार का कड़ा विरोध और उनके तर्क
हाईकोर्ट में चल रही इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार ने याचिकाकर्ताओं की मांगों का कड़ा विरोध किया है। अदालत में सरकार का पक्ष रखते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अरविंद कामथ ने स्पष्ट किया कि टैक्स में दी जाने वाली यह छूट किसी के लिंग के आधार पर नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से "विवाह या खून के रिश्ते" की कानूनी मान्यता पर आधारित है। सरकार का मुख्य तर्क यह है कि विवाह एक ऐसा कानूनी संबंध है जिसका बाकायदा रजिस्ट्रेशन होता है और जिसकी जांच आसानी से की जा सकती है। सरकार के अनुसार, अगर बिना किसी कानूनी मान्यता वाले रिश्तों को भी पति-पत्नी वाली टैक्स छूट मिलने लगी, तो इसके जरिए टैक्स चोरी के मामले बढ़ सकते हैं, क्योंकि ऐसे रिश्तों का कोई कानूनी रिकॉर्ड या प्रमाण मौजूद नहीं होता है।
समलिंगी जोड़ों के अधिकारों का भविष्य
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह भी साफ किया गया है कि उनका मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तरह समलैंगिक विवाह को पूर्ण कानूनी मान्यता दिलाने का प्रयास नहीं है। वे केवल इतना चाहते हैं कि जो वित्तीय और टैक्स लाभ एक शादीशुदा जोड़े को दिए जाते हैं, उनसे सेम सेक्स जोड़ों को वंचित न रखा जाए। कर्नाटक हाईकोर्ट का इस मामले पर जो भी फैसला आएगा, उसका असर बहुत व्यापक होगा। अगर अदालत याचिका को स्वीकार कर लेती है, तो यह पूरे देश में सेम सेक्स कपल्स के लिए एक बड़ी जीत होगी, जिससे उनके लिए कई अन्य टैक्स छूटों के रास्ते खुल सकते हैं। वहीं, अगर हाईकोर्ट सरकार के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो व्यवस्था में किसी भी बदलाव के लिए संसद को खुद नया कानून बनाना होगा।




















