बेंगलुरु। कर्नाटक की राजनीति में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर अभियान को लेकर घमासान छिड़ गया है। राज्य के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर चिंता जताते हुए भारत के चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर मांग की है कि सत्यापन और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए निर्धारित समय सीमा को आगे बढ़ाया जाए। उनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य का कोई भी पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न हो सके और हर वास्तविक मतदाता का नाम अंतिम सूची में सुरक्षित बना रहे।
इस पूरे मामले को जनता के सामने लाते हुए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर डीके शिवकुमार द्वारा लिखा गया पत्र सार्वजनिक किया। इस पत्र के सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि किस प्रकार प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलताओं के कारण लाखों लोग मतदान के अधिकार से दूर हो सकते हैं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो इसके परिणाम लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं।
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने 25 अगस्त को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को प्रेषित अपने विस्तृत पत्र में कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। पत्र के अनुसार, राज्य के कुल 5.54 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 1.08 करोड़ मतदाताओं को एएसडीडीओ श्रेणी के तहत रखा गया है। इसके अलावा, 24 अगस्त को जैसे ही प्रारूप मतदाता सूची का प्रकाशन हुआ, उसके तुरंत बाद करीब 43.8 लाख मतदाताओं को तार्किक विसंगतियों का सामना करना पड़ा। साथ ही, वर्ष 2002 की पुरानी मतदाता सूची के साथ लिंक न जुड़ पाने की वजह से इन्हें सत्यापन नोटिस मिलने की पूरी संभावना है।
बेंगलुरु शहर को लेकर स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बताई जा रही है, जहां अकेले 46.88 लाख मतदाताओं को एएसडीडीओ श्रेणी में डाल दिया गया है। मुख्यमंत्री ने अपनी आशंका खुलकर जाहिर की है कि यदि तय समय सीमा के भीतर दावे और आपत्तियां दाखिल करने का मौका नहीं मिला, तो कर्नाटकभर में लगभग 1.5 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होने का बड़ा खतरा मंडराने लगेगा। इतनी बड़ी संख्या में नाम कटना चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर बड़ा सवालिया निशान लगा सकता है।
डीके शिवकुमार ने तर्क दिया है कि अनुपस्थित श्रेणी के अंतर्गत आने वाले बहुत से लोग वास्तव में वैध मतदाता हैं, जो आजीविका, खराब स्वास्थ्य या अन्य अपरिहार्य कारणों की वजह से अपना गणना प्रपत्र समय पर जमा नहीं करा पाए। इसके अतिरिक्त, जिन नागरिकों ने अपना निवास स्थान या फिर पोलिंग बूथ बदल लिया है और जो बूथ स्तर अधिकारियों यानी बीएलओ की घर-घर जाकर सत्यापन करने वाली प्रक्रिया के दौरान अनुपस्थित रहे, उन्हें भी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि केवल पता बदल जाने या स्थान परिवर्तन हो जाने के कारण किसी भी नागरिक को उसके मताधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग के समक्ष चार प्रमुख और व्यावहारिक मांगें रखी हैं। पहली मांग यह है कि आपत्तियां और दावे दर्ज कराने की समयसीमा को बढ़ाया जाए। दूसरी मांग है कि शहरी इलाकों में वार्ड समितियों की बैठकें और ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामसभाओं का आयोजन अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाए। तीसरी मांग के तहत उन्होंने मतदाताओं को नोटिस का जवाब देने के लिए तीन से चार सप्ताह का पर्याप्त समय देने की बात कही है। चौथी और अंतिम मांग यह है कि जिन जिलों में एएसडीडीओ के मामले सबसे अधिक संख्या में दर्ज हैं, वहां विशेष रूप से अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती की जाए।
पत्र के अंत में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य प्रशासन चुनाव आयोग को हरसंभव सहयोग देने के लिए पूरी तरह तैयार है, चाहे वह ग्रामसभाओं का आयोजन हो, वार्ड समितियों की बैठकें हों या फिर व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाना हो। उन्होंने कहा कि हम सबका साझा उद्देश्य ऐसी त्रुटिहीन मतदाता सूची तैयार करना होना चाहिए, जिस पर राज्य की जनता आंख मूंदकर भरोसा कर सके। इस पूरी कवायद का मकसद केवल इतना होना चाहिए कि एक भी पात्र नागरिक पीछे न छूटे, फर्जी या अयोग्य नाम बाहर हों और किसी भी व्यक्ति को केवल जानकारी या अवसर के अभाव में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व से बाहर न होना पड़े।





















