राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर विपक्षी खेमे की अंदरूनी तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। लंबे समय तक असमंजस और खींचतान का शिकार रहा विपक्षी गठबंधन अब धीरे-धीरे राहुल गांधी की स्वीकार्यता की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। घटक दल अब उन्हें संयुक्त विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में आगे रखने पर राजी दिख रहे हैं। यह स्थिति 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बने शुरुआती माहौल के बिल्कुल उलट है। जब विपक्षी गठबंधन का गठन हुआ था, तब नेतृत्व और साझा चेहरे के सवाल पर कोई आम सहमति नहीं बन पाई थी और इस पेचीदा मसले को लगातार ठंडे बस्ते में डाला जाता रहा था।
ममता बनर्जी की दावेदारी और समीकरणों में फेरबदल
लोकसभा चुनाव के बाद से ही विपक्षी खेमे के भीतर एक ऐसे कद्दावर चेहरे की तलाश तेज हो गई थी, जो पूरे विपक्ष का प्रभावी नेतृत्व संभाल सके। उस शुरुआती दौर में ज्यादातर सहयोगी दलों की नजर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर टिकी हुई थी। हालांकि, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं। चुनावी नतीजों ने ममता बनर्जी की राष्ट्रीय दावेदारी को कमजोर कर दिया, जिससे राहुल गांधी के लिए विपक्षी मोर्चे की केंद्रीय भूमिका में उभरने का रास्ता साफ हो गया। इसके बावजूद गठबंधन के बाकी दल पूरी तरह निश्चिंत नहीं हैं और वे बहुत सतर्कता के साथ हालात के हर मोड़ पर नजर रख रहे हैं।
कांग्रेस की राष्ट्रीय मौजूदगी और तीसरे मोर्चे की आशंका
सहयोगी दलों के रुख में आए इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह कांग्रेस का राष्ट्रीय ढांचा है। बीजेपी की तरह कांग्रेस ही विपक्ष में एकमात्र ऐसा दल है जिसकी संगठनात्मक पकड़ और चुनावी पहुंच देश के लगभग हर राज्य में फैली हुई है। क्षेत्रीय क्षत्रपों के पास अपने-अपने राज्यों में मजबूत जनाधार तो है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का सीधा मुकाबला करने की व्यापकता केवल कांग्रेस में ही दिखती है। इसी व्यावहारिक हकीकत को ध्यान में रखकर घटक दल फिलहाल राहुल गांधी के नेतृत्व में आगे बढ़ने को तैयार हुए हैं।
लेकिन इस समर्थन के साथ एक बड़ा पेंच भी जुड़ा हुआ है। अगर कांग्रेस पंजाब और उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में संतोषजनक प्रदर्शन करने में नाकाम रहती है, तो गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेसी दलों को मिलाकर एक तीसरे मोर्चे के गठन की हलचल दोबारा तेज हो सकती है। ऐसे राजनीतिक दल जो बीजेपी और कांग्रेस दोनों से समान दूरी बनाकर चलते हैं, वे नए विकल्प की तलाश में एकजुट हो सकते हैं। इसलिए गठबंधन के सहयोगी अभी पूरी तरह समर्पण के मूड में नहीं हैं, बल्कि वे इंतज़ार करो और देखो की सोची-समझी रणनीति पर अमल कर रहे हैं।
जमीनी कार्यकर्ताओं में नया जोश और रामलीला मैदान की परीक्षा
हाल के घटनाक्रमों ने यह जरूर साबित किया है कि राहुल गांधी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा फूंकने में सफल रहे हैं। संगठन के स्तर पर उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि राज्य और जिला इकाइयां निष्क्रिय न बैठें, बल्कि हर मुद्दे पर मुखर होकर सड़कों पर उतरें। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित विशाल रैली में देखने को मिला। उस आयोजन को सफल बनाने के लिए पार्टी मशीनरी ने पूरी ताकत झोंक दी थी। रैली में उमड़ा भारी जनसैलाब और कार्यकर्ताओं की सक्रियता ने यह संदेश दिया कि कांग्रेस का कैडर अब पहले से कहीं अधिक संगठित और आक्रामक हो चुका है।
चुनावी रणभूमि की सबसे बड़ी चुनौती
भीड़ जुटाने और कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के बाद अब राहुल गांधी के सामने सबसे कठिन और निर्णायक चुनौती चुनावी जीत हासिल करने की खड़ी है। पंजाब और उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व की असली अग्निपरीक्षा साबित होने वाले हैं। चुनावी विश्लेषक और सहयोगी दल दोनों ही इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या राहुल गांधी रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ को पोलिंग बूथ तक खींचने में सक्षम हैं। विरोध प्रदर्शनों और जनसभाओं में दिखने वाला जोश अगर ईवीएम में वोटों में तब्दील नहीं हो पाया, तो इस सारी कवायद का राजनीतिक असर शून्य हो जाएगा।
इन महत्वपूर्ण चुनावों में अब लगभग तीन महीने का ही समय शेष बचा है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि कांग्रेस संगठन और राहुल गांधी को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह चुनावी मोड में उतरना होगा। बीजेपी के अलावा गठबंधन के सहयोगी भी इस चुनावी मुकाबले को बेहद पैनी नजर से देख रहे हैं। सहयोगी दलों का यह समर्थन पूरी तरह सशर्त है। चुनावी नतीजों का फैसला ही यह तय करेगा कि राहुल गांधी को गठबंधन का अगुआ बनाने का फैसला कितना दूरदर्शी था या फिर विपक्ष को दोबारा नए नेतृत्व की तलाश में जुटना पड़ेगा।


















