गिफ्ट निफ्टी के कारोबारी समय में बड़ा बदलाव, सुबह 5:15 बजे से खुलेगा सत्र और 23.5 घंटे होगी ट्रेडिंगत्योहारी सफाई में चमकेंगे गंदे बिजली के स्विच बोर्ड, रसोई की 5 चीजों से मिनटों में साफ होगी मैलझारखंड में व्यापारियों से रंगदारी मांगने वाले राहुल सिंह और राहुल दुबे पर इंटरपोल का शिकंजा, जारी हुआ रेड कॉर्नर नोटिसलक्ष्मी पूजन की थाली में नया बदलाव, उदयपुर के बाजारों में कौड़ियों और काली हल्दी की मांग में भारी उछालटनल बोरिंग मशीनों की आपूर्ति में रुकावट के बाद भारत ने उठाया घरेलू विनिर्माण का कदम, पीयूष गोयल ने दी जानकारीतुला, धनु, मकर और कुंभ पर रहती है शनि देव की विशेष कृपा, कर्म और अनुशासन से खुलते हैं तरक्की के रास्तेगोवर्धन पूजा पर छप्पन भोग का रहस्य, जानिए सात दिन और आठ पहर से जुड़ा यह धार्मिक गणितवेनेजुएला में बाकी 322 राजनीतिक कैदियों को रिहा करने की मांग, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कराकस के साथ की बातचीतठंड बढ़ते ही आगरा के जूता उद्योग में विंटर बूट्स और क्लोज्ड-टो फुटवियर का उत्पादन तेजउत्तराखंड की पारंपरिक रसोई से सीखें जाखिया के तड़के वाला पहाड़ी भुटवा बनाने का तरीका
विपक्षी मोर्चे की कमान राहुल गांधी के हाथ, पर पंजाब और यूपी की चुनावी जंग तय करेगी साखभारत
3 नव॰ 2026, 7:03 pm (15 मिनट पहले)· 0

विपक्षी मोर्चे की कमान राहुल गांधी के हाथ, पर पंजाब और यूपी की चुनावी जंग तय करेगी साख

ममता बनर्जी की दावेदारी कमजोर पड़ने के बाद सहयोगी दल राहुल गांधी को विपक्ष का मुख्य चेहरा मानने लगे हैं, लेकिन असली परीक्षा आगामी विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करने की होगी।

राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर विपक्षी खेमे की अंदरूनी तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। लंबे समय तक असमंजस और खींचतान का शिकार रहा विपक्षी गठबंधन अब धीरे-धीरे राहुल गांधी की स्वीकार्यता की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। घटक दल अब उन्हें संयुक्त विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में आगे रखने पर राजी दिख रहे हैं। यह स्थिति 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बने शुरुआती माहौल के बिल्कुल उलट है। जब विपक्षी गठबंधन का गठन हुआ था, तब नेतृत्व और साझा चेहरे के सवाल पर कोई आम सहमति नहीं बन पाई थी और इस पेचीदा मसले को लगातार ठंडे बस्ते में डाला जाता रहा था।

ममता बनर्जी की दावेदारी और समीकरणों में फेरबदल

लोकसभा चुनाव के बाद से ही विपक्षी खेमे के भीतर एक ऐसे कद्दावर चेहरे की तलाश तेज हो गई थी, जो पूरे विपक्ष का प्रभावी नेतृत्व संभाल सके। उस शुरुआती दौर में ज्यादातर सहयोगी दलों की नजर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर टिकी हुई थी। हालांकि, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं। चुनावी नतीजों ने ममता बनर्जी की राष्ट्रीय दावेदारी को कमजोर कर दिया, जिससे राहुल गांधी के लिए विपक्षी मोर्चे की केंद्रीय भूमिका में उभरने का रास्ता साफ हो गया। इसके बावजूद गठबंधन के बाकी दल पूरी तरह निश्चिंत नहीं हैं और वे बहुत सतर्कता के साथ हालात के हर मोड़ पर नजर रख रहे हैं।

ये भी पढ़ें

कांग्रेस की राष्ट्रीय मौजूदगी और तीसरे मोर्चे की आशंका

सहयोगी दलों के रुख में आए इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह कांग्रेस का राष्ट्रीय ढांचा है। बीजेपी की तरह कांग्रेस ही विपक्ष में एकमात्र ऐसा दल है जिसकी संगठनात्मक पकड़ और चुनावी पहुंच देश के लगभग हर राज्य में फैली हुई है। क्षेत्रीय क्षत्रपों के पास अपने-अपने राज्यों में मजबूत जनाधार तो है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का सीधा मुकाबला करने की व्यापकता केवल कांग्रेस में ही दिखती है। इसी व्यावहारिक हकीकत को ध्यान में रखकर घटक दल फिलहाल राहुल गांधी के नेतृत्व में आगे बढ़ने को तैयार हुए हैं।

लेकिन इस समर्थन के साथ एक बड़ा पेंच भी जुड़ा हुआ है। अगर कांग्रेस पंजाब और उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में संतोषजनक प्रदर्शन करने में नाकाम रहती है, तो गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेसी दलों को मिलाकर एक तीसरे मोर्चे के गठन की हलचल दोबारा तेज हो सकती है। ऐसे राजनीतिक दल जो बीजेपी और कांग्रेस दोनों से समान दूरी बनाकर चलते हैं, वे नए विकल्प की तलाश में एकजुट हो सकते हैं। इसलिए गठबंधन के सहयोगी अभी पूरी तरह समर्पण के मूड में नहीं हैं, बल्कि वे इंतज़ार करो और देखो की सोची-समझी रणनीति पर अमल कर रहे हैं।

जमीनी कार्यकर्ताओं में नया जोश और रामलीला मैदान की परीक्षा

हाल के घटनाक्रमों ने यह जरूर साबित किया है कि राहुल गांधी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा फूंकने में सफल रहे हैं। संगठन के स्तर पर उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि राज्य और जिला इकाइयां निष्क्रिय न बैठें, बल्कि हर मुद्दे पर मुखर होकर सड़कों पर उतरें। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित विशाल रैली में देखने को मिला। उस आयोजन को सफल बनाने के लिए पार्टी मशीनरी ने पूरी ताकत झोंक दी थी। रैली में उमड़ा भारी जनसैलाब और कार्यकर्ताओं की सक्रियता ने यह संदेश दिया कि कांग्रेस का कैडर अब पहले से कहीं अधिक संगठित और आक्रामक हो चुका है।

चुनावी रणभूमि की सबसे बड़ी चुनौती

भीड़ जुटाने और कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के बाद अब राहुल गांधी के सामने सबसे कठिन और निर्णायक चुनौती चुनावी जीत हासिल करने की खड़ी है। पंजाब और उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व की असली अग्निपरीक्षा साबित होने वाले हैं। चुनावी विश्लेषक और सहयोगी दल दोनों ही इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या राहुल गांधी रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ को पोलिंग बूथ तक खींचने में सक्षम हैं। विरोध प्रदर्शनों और जनसभाओं में दिखने वाला जोश अगर ईवीएम में वोटों में तब्दील नहीं हो पाया, तो इस सारी कवायद का राजनीतिक असर शून्य हो जाएगा।

इन महत्वपूर्ण चुनावों में अब लगभग तीन महीने का ही समय शेष बचा है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि कांग्रेस संगठन और राहुल गांधी को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह चुनावी मोड में उतरना होगा। बीजेपी के अलावा गठबंधन के सहयोगी भी इस चुनावी मुकाबले को बेहद पैनी नजर से देख रहे हैं। सहयोगी दलों का यह समर्थन पूरी तरह सशर्त है। चुनावी नतीजों का फैसला ही यह तय करेगा कि राहुल गांधी को गठबंधन का अगुआ बनाने का फैसला कितना दूरदर्शी था या फिर विपक्ष को दोबारा नए नेतृत्व की तलाश में जुटना पड़ेगा।

सवाल-जवाब

इंडिया गठबंधन में नेतृत्व को लेकर पहले क्या स्थिति थी?
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले जब विपक्षी गठबंधन का गठन हुआ था, तब नेतृत्व और चेहरे के चयन को लगातार टाल दिया गया था।
ममता बनर्जी की दावेदारी पर क्या असर पड़ा?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद ममता बनर्जी की राष्ट्रीय दावेदारी कमजोर पड़ गई और राहुल गांधी मुख्य चेहरे के रूप में उभरे।
सहयोगी दल राहुल गांधी को आगे रखने के लिए क्यों सहमत हुए?
कांग्रेस ही विपक्ष की एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसकी मौजूदगी और संगठनात्मक पहुंच कई राज्यों में फैली हुई है।
अगर आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर रहा तो क्या होगा?
यदि पंजाब और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस असफल रही, तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों का विरोध करने वाले दलों का तीसरा मोर्चा बनने की संभावना है।
राहुल गांधी के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती रैलियों और प्रदर्शनों में जुटने वाली भीड़ को चुनावी जीत और वोटों में बदलने की है।
विधानसभा चुनावों के लिए कितना समय बाकी है?
विधानसभा चुनावों में अब लगभग तीन महीने का ही समय बचा है, जिससे पार्टी को चुनावी मोड में आना होगा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp