मानसून का मौसम पौधों के विकास के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही यह अपने साथ कई तरह की चुनौतियां भी लेकर आता है। बारिश से चारों तरफ हरियाली तो छा जाती है, मगर लगातार बनी रहने वाली नमी और उमस के कारण कीट-पतंगों का खतरा भी काफी ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसे में सिर्फ नियमित रूप से पानी देना, खाद डालना या मिट्टी की गुड़ाई करना ही काफी नहीं होता है। यदि समय रहते कीटों की सही पहचान करके उनका उचित प्रबंधन नहीं किया जाए, तो पेड़-पौधों की नई कोंपलें, फल और सब्जियां पूरी तरह से बर्बाद हो सकती हैं।
जल निकासी और साफ-सफाई है सबसे पहला नियम
बरसात के दिनों में घरेलू बगिया की देखभाल का सबसे बुनियादी नियम यह सुनिश्चित करना है कि गमलों और क्यारियों में किसी भी स्थिति में पानी जमा न हो पाए। लगातार जलभराव की स्थिति बने रहने से पौधों की जड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है, जिसके चलते जड़ें धीरे-धीरे सड़ने लगती हैं। इसके लिए हमेशा ध्यान रखें कि गमलों के तल में पर्याप्त जल निकासी वाले छेद जरूर हों और उनके नीचे रखी प्लेट या ट्रे में इकट्ठा होने वाले पानी को तुरंत बाहर निकाल दें। क्यारियों में भी पानी की सुगम निकासी के लिए छोटी-छोटी नालियां बनाई जानी चाहिए और साथ ही समय-समय पर सूखी या संक्रमित पत्तियों की छंटाई करते रहना बेहद जरूरी होता है।
फ्रूट फ्लाई और रस चूसने वाले कीटों से बचाव
मानसून के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले कीटों में फ्रूट फ्लाई यानी फल मक्खी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह कीट आम और अमरूद जैसे फलों के साथ-साथ लौकी, तोरई, करेला, खीरा और कद्दू जैसी गूदेदार सब्जियों को अपना निशाना बनाता है। इसकी मादा कीट फल की बाहरी त्वचा के भीतर अपने अंडे देती है, जिससे कुछ दिनों बाद फल अंदर से सड़ने लगता है और समय से पहले ही जमीन पर गिरकर खराब हो जाता है। इस समस्या से निजात पाने के लिए मेथिल यूजेनॉल फेरोमोन ट्रैप का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, माहू यानी एफिड्स और सफेद मक्खी आकार में बहुत छोटे होने के बावजूद पौधों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। ये जीव मिर्च, बैंगन, भिंडी और गोभी वर्गीय फसलों की पत्तियों का रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देते हैं, जिससे पत्तियां सूखने लगती हैं और कई बार ये कीट पौधों में वायरस जनित बीमारियों को भी फैला देते हैं। इनकी निगरानी और रोकथाम के लिए पीले स्टिकी ट्रैप बेहद मददगार साबित होते हैं।
थ्रिप्स, छेदक कीट और इल्लियों का प्रबंधन
बारिश के मौसम में उमस बढ़ने के साथ ही थ्रिप्स जैसे बेहद बारीक कीट भी सब्जियों के लिए मुसीबत बन जाते हैं। ये कीट प्याज, लहसुन, मिर्च और टमाटर के पत्तों तथा फूलों की सतह को खुरचकर उनका रस चूसते हैं, जिसके कारण पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़ने लगती हैं और पौधे की整體 बढ़वार रुक जाती है। थ्रिप्स की समय रहते पहचान के लिए नीले रंग के चिपचिपे ट्रैप काफी उपयोगी होते हैं, जिन्हें पौधों के पास लगाने से उनकी संख्या को कम करने में मदद मिलती है। दूसरी तरफ, तना और फल छेदक कीट बैंगन, टमाटर और भिंडी जैसी फसलों को अंदर से खोखला कर देते हैं। इनके लार्वा पौधों के अंदर छिपकर नुकसान पहुंचाते हैं जिससे पौधा बाहर से तो सामान्य नजर आता है, लेकिन भीतर से कमजोर हो चुका होता है। इसी प्रकार इल्लियां गोभी, टमाटर और चने की पत्तियों को तेजी से कुतरकर पौधों को भारी क्षति पहुंचाती हैं। वयस्क पतंगों की संख्या पर लगाम लगाने के लिए ल्यूर आधारित फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल किया जा सकता है।
सोलर लाइट ट्रैप और नीम के तेल का उपयोग
मानसून के मौसम में सक्रिय रहने वाले कई हानिकारक कीट रात के समय ज्यादा हमलावर होते हैं। तना छेदक के पतंगे, कुछ खास भृंग और कटवॉर्म जैसे कीट अंधेरा होते ही पौधों पर धावा बोलते हैं। ऐसी स्थिति में सोलर लाइट ट्रैप लगाना एक बेहतरीन उपाय साबित हो सकता है। रोशनी से आकर्षित होकर ये कीट ट्रैप की तरफ खिंचे चले आते हैं और नीचे रखे पानी या जाल में गिरकर नियंत्रित हो जाते हैं। चूंकि यह ट्रैप सौर ऊर्जा से संचालित होता है, इसलिए इसके इस्तेमाल से बिजली के खर्च की कोई चिंता नहीं रहती है। इसके अलावा, तेज हवा और भारी बारिश के दौरान कमजोर तनों वाले पौधों के टूटने का खतरा रहता है, जिन्हें बांस या लकड़ी के सहारे बांध देना चाहिए। हर पंद्रह दिन के अंतराल पर नीम के तेल का छिड़काव करने से पौधों को कीड़ों और फंगस के संक्रमण से सुरक्षित रखने में बहुत मदद मिलती है। पौधों को केवल बारिश के भरोसे न छोड़कर नियमित देखरेख, साफ-सफाई और सही सुरक्षा उपायों से अपनी बगिया को हरा-भरा बनाए रखा जा सकता है।



















