बांग्लादेश के अत्यंत दूरदराज और जलमग्न क्षेत्रों में रहने वाले वंचित समुदायों तक स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन यापन के साधन पहुंचाने वाली प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता रूना खान को एशिया के शीर्ष सम्मानों में से एक रैमोन मैग्सेसे अवॉर्ड 2026 से अलंकृत किया गया है। जलवायु परिवर्तन और निरंतर होने वाले नदी कटाव से प्रभावित लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने दशकों तक जमीनी स्तर पर अभूतपूर्व काम किया है। उन्होंने अपनी सामाजिक संस्था फ्रेंडशिप के माध्यम से ऐसे नाव अस्पतालों और स्थानांतरित किए जा सकने वाले स्कूलों का निर्माण किया, जो आपदा के समय बिना किसी बाधा के दूसरी सुरक्षित जगह ले जाए जा सकते हैं। इस ऐतिहासिक पहल ने उन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाईं जहां पहले पहुंचना लगभग असंभव माना जाता था।
तैरते अस्पताल और आपदा-रोधी स्कूलों की अनूठी संरचना
बांग्लादेश का एक बड़ा हिस्सा नदियों के फैलाव और तटीय कटाव से सीधे तौर पर प्रभावित रहता है। ऐसे विकट माहौल में पारंपरिक पक्के भवनों का निर्माण करना और उन्हें लंबे समय तक बनाए रखना अत्यधिक चुनौतीपूर्ण काम होता है। रूना खान ने इस भौगोलिक चुनौती का एक बेहद व्यवहारिक समाधान खोज निकाला। उन्होंने नावों को ही सर्वसुविधायुक्त अस्पतालों में तब्दील कर दिया, जो नदियों के रास्तों से होकर सीधे जरूरतमंदों के दरवाजे तक पहुंचती हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने स्कूलों की ऐसी विशेष डिजाइन तैयार करवाई, जिन्हें बाढ़ की आशंका या नदी का तट टूटने की स्थिति में महज कुछ ही घंटों के भीतर खोलकर किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जा सकता है। इस व्यवस्था के कारण आपातकालीन स्थितियों में भी बच्चों की पढ़ाई और लोगों का इलाज कभी ठप नहीं होता।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और ढाका में मिला वैश्विक परिवेश
रूना खान का जन्म 7 नवंबर 1958 को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुआ था। वह बंगाल के एक अत्यंत प्रतिष्ठित, ऐतिहासिक और संपन्न जमींदार परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके बचपन का माहौल आम लोगों से काफी अलग और वैश्विक वैचारिक गतिविधियों से समृद्ध था। उनके पिता के घर पर दुनिया के विभिन्न कोनों से आए जाने-माने विचारक, मूर्धन्य कलाकार, दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरु और अंतरराष्ट्रीय राजनयिक नियमित रूप से जुटते थे। इस विविध और विचारशील वातावरण में परवरिश पाने के कारण उन्हें कम उम्र में ही वैश्विक मामलों, सामाजिक वास्तविकताओं और मानवीय संवेदनाओं को गहराई से समझने का अवसर मिला। हालांकि उनके पास सभी प्रकार की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध थीं, फिर भी उन्होंने जीवन के उत्तरार्ध में अपना संपूर्ण समय और सामर्थ्य समाज के उन अंतिम व्यक्तियों की सेवा में लगाने का मार्ग चुना जिनके पास मूलभूत बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं।
विविध शैक्षणिक योग्यता और हार्वर्ड से प्राप्त नेतृत्व प्रशिक्षण
रूना खान की शैक्षणिक यात्रा कई प्रमुख शहरों और प्रतिष्ठित संस्थानों से होकर गुजरी। उनकी शुरुआती स्कूली शिक्षा तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान स्थित फॉर्मव्यू इंटरनेशनल स्कूल में शुरू हुई। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह पाकिस्तान के मरी में स्थित सेंट डेंस हाई स्कूल गईं। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च अध्ययन के लिए भारत का रुख किया, जहां उन्होंने कोलकाता के विख्यात लेडी ब्राबौन कॉलेज से भूगोल विषय में ऑनर्स के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की। भूगोल में डिग्री लेने के उपरांत उन्होंने ढाका के इडेन मोहिला कॉलेज से मानविकी (ह्यूमैनिटीज) विषय में अपनी दूसरी स्नातक की उपाधि सफलतापूर्वक पूरी की। अपनी शिक्षा को व्यावहारिक नेतृत्व में बदलने के लिए उन्होंने बाद में वैश्विक मंचों का रुख किया। वर्ष 2013 में उन्होंने प्रतिष्ठित हॉवर्ड बिजनेस स्कूल के स्ट्रैटजिक प्रॉस्पेक्टिव्स इन नॉन प्रॉफिट मैनेजमेंट कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इसके पश्चात वर्ष 2018 में उन्होंने हॉवर्ड कैनेडी स्कूल से लीडरशिप फॉर सिस्टम चेंज नामक विशेष पाठ्यक्रम भी पूरा किया, जिसने उनकी संस्थागत दृष्टि को और अधिक परिपक्व बनाया।
शिक्षण अनुभव से बुटीक और प्रकाशन व्यवसाय तक का सफर
सामाजिक क्षेत्र में पूर्णकालिक रूप से उतरने से पहले रूना खान का करियर विविध व्यावसायिक और शैक्षणिक अनुभवों से होकर गुजरा। उन्होंने वर्ष 1979 में चटगांव में छोटे बच्चों को पढ़ाने वाले किंडरगार्टन शिक्षक के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की थी। अध्यापन के दौरान उन्होंने गौर किया कि उस दौर की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली बच्चों में रटने की प्रवृत्ति पर बहुत अधिक बल देती थी, जबकि बच्चों के भीतर सवाल पूछने और विषय की गहरी समझ विकसित करने के अवसर बेहद सीमित थे। इस अनुभव ने उन्हें शिक्षा पद्धति में संरचनात्मक बदलाव करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने बच्चों के लिए रोचक कहानियां, सचित्र पुस्तकें और शिक्षकों के लिए उपयोगी शैक्षणिक सामग्री तैयार की। शिक्षा के अलावा उन्होंने आजीविका संवर्धन के क्षेत्र में भी कदम रखा। स्थानीय कारीगरों और हस्तशिल्पियों को स्थायी रोजगार देने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 1988 में एक विशेष बुटीक की नींव रखी। आगे चलकर वह अपने परिवार के स्थापित प्रिंटिंग और पब्लिशिंग व्यवसाय से जुड़ीं और इडेन प्रेस के प्रशासनिक एवं प्रबंधकीय कामकाज की कमान संभाली।
1997 की ब्रह्मपुत्र यात्रा और जीवन की दिशा बदलने वाला विचार
रूना खान के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ वर्ष 1997 में आया, जब उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के तटीय इलाकों में स्थित 'चार' क्षेत्रों का दौरा किया। बांग्लादेश में 'चार' उन अस्थाई रेतीले द्वीपों को कहा जाता है जो नदियों के तीव्र बहाव, गाद और कटाव के कारण बनते और बदलते रहते हैं। इन द्वीपों पर रहने वाली विशाल आबादी पूरी तरह से मुख्यधारा से कटी होती है, जहां न तो पक्के अस्पताल होते हैं और न ही स्थायी स्कूल। जब भी नदी का जलस्तर बढ़ता है, इन लोगों का सब कुछ बह जाता है। इस जमीनी हकीकत को देखकर रूना खान को यह अहसास हुआ कि यदि ये असहाय लोग अस्पतालों तक नहीं पहुंच सकते, तो अस्पताल को स्वयं तैरकर उन तक पहुंचना होगा। इसी क्रांतिकारी विचार ने उनके भावी सामाजिक मॉडल की मजबूत नींव रखी।
2002 में फ्रेंडशिप की स्थापना और बहुआयामी विकास मॉडल
अपने विचार को यथार्थ में बदलने के लिए रूना खान ने वर्ष 2002 में फ्रेंडशिप नाम की गैर-सरकारी संस्था की स्थापना की। शुरुआत में इस संगठन ने एक तैरते हुए अस्पताल के जरिए नदी द्वीपों के लोगों को चिकित्सा सेवाएं देना शुरू किया। नाव पर बने इस अस्पताल में डॉक्टरों की टीम, दवाइयां और बुनियादी शल्य चिकित्सा तक की सुविधाएं मौजूद थीं। समय के साथ फ्रेंडशिप का दायरा केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं रहा। रूना खान के नेतृत्व में इस संस्था ने अपने कार्यों का विस्तार करते हुए प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, आपदा राहत प्रबंधन, टिकाऊ रोजगार, नागरिक अधिकार और स्थानीय सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण जैसे विषयों को भी अपने अभियान में शामिल किया। आज यह संस्था बांग्लादेश के सबसे कठिन और दुर्गम इलाकों में लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनी हुई है।



















