दीपावली के त्योहारी मौसम में राजस्थान के पारंपरिक हथकरघा उद्योग में नई जान आ गई है। कैथून कस्बे में तैयार होने वाली ऐतिहासिक और बारीक बुनाई वाली कोटा डोरिया साड़ियों की मांग इस समय देश के प्रमुख महानगरों के साथ-साथ विदेशों में भी जबरदस्त तरीके से बढ़ रही है। त्योहार पर पारंपरिक परिधान पहनने के बढ़ते रुझान के कारण स्थानीय बुनकरों को लगातार ऑनलाइन मंचों और सीधे संपर्कों के माध्यम से बड़े पैमाने पर ऑर्डर मिल रहे हैं। मांग को समय रहते पूरा करने के लिए कारीगर अपने हथकरघों पर लगातार काम में लगे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बना हुआ है।
कैथून में महीन बुनाई और महीनों की कड़ी मेहनत
कोटा जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर बसा कैथून कस्बा इस पारंपरिक बुनाई शैली का मुख्य केंद्र है। यहां साड़ियों का निर्माण मशीनों के बजाय बुनकरों की व्यक्तिगत कारीगरी, धैर्य और पारंपरिक तकनीकों से होता है। बुनाई प्रक्रिया इतनी जटिल और श्रमसाध्य है कि एक साधारण कोटा डोरिया साड़ी को पूरा करने में 15 से 20 दिन का समय लग जाता है। यदि साड़ी में सामान्य डिजाइनर पैटर्न शामिल हो, तो इसे बनाने में कारीगरों को 20 से 25 दिन लग जाते हैं।
विशेष अवसरों के लिए तैयार की जाने वाली शाही साड़ियों में असली सोने और चांदी के तारों वाली जरी का काम किया जाता है। ऐसी एक विशेष शाही साड़ी को तैयार करने में पूरे तीन महीने का समय लगता है। इस तरह के भारी और बेहद बारीक काम के लिए तीन से चार कुशल बुनकर एक साथ मिलकर एक ही साड़ी पर कई हफ्तों तक काम करते हैं, ताकि हर धागे का खिंचाव और पैटर्न बिल्कुल सटीक रहे।
हल्कापन, खट पैटर्न और जीआई टैग की वैश्विक साख
कोटा डोरिया वस्त्र की मुख्य पहचान इसका बेहद हल्का वजन और इसकी अनोखी चौकोर जालीदार संरचना है, जिसे स्थानीय भाषा में 'खट' कहा जाता है। इसमें शुद्ध रेशम और कपास के धागों को एक विशेष अनुपात में मिलाकर बुना जाता है, जिससे कपड़े में मजबूती के साथ-साथ कोमलता और चमक आती है। जब इन कपड़ों में सोने और चांदी के धागों से जरी का काम जोड़ा जाता है, तो परिधान की भव्यता काफी बढ़ जाती है।
कारीगरी और इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री के आधार पर बाजार में इन साड़ियों की कीमत 10 हजार रुपये से शुरू होकर 3 लाख रुपये तक जाती है। विदेशी बाजारों में रहने वाले भारतीय समुदाय और अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) सीधे कैथून के बुनकरों से संपर्क करके या अपने रिश्तेदारों के माध्यम से इन साड़ियों की विशेष खरीदारी कर रहे हैं। सौ साल से भी अधिक पुरानी इस बुनाई कला को ऐतिहासिक रूप से कोटा के राजपरिवार से संरक्षण प्राप्त हुआ था। बाद में इसकी प्रामाणिकता और विरासत को देखते हुए भारत सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग भी प्रदान किया।
70 से 80 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार और 9 हजार हथकरघे
इस पारंपरिक उद्योग का दायरा केवल एक कस्बे तक सीमित नहीं है। कैथून कस्बे में लगभग 6 हजार हथकरघे संचालित हैं, जबकि इसके आसपास के 12 ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 3 हजार हथकरघों पर यह काम लगातार चल रहा है। इस तरह समूचे क्षेत्र में कुल मिलाकर लगभग 9 हजार हथकरघों के जरिए प्रतिदिन 400 से 500 साड़ियों का उत्पादन किया जाता है।
आंकड़ों के अनुसार, कोटा डोरिया वस्त्र उद्योग का कुल वार्षिक कारोबार लगभग 70 से 80 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका है। मौजूदा त्योहारी सीजन में मिले भारी ऑर्डरों ने स्थानीय कारीगरों, रंगरेजों और बुनकरों की आमदनी और भविष्य की उम्मीदों को काफी मजबूत किया है। यह पारंपरिक कला आज न केवल एक पहनावे के रूप में पसंद की जा रही है, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर और कुशल श्रम के मेल के रूप में अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान को भी लगातार मजबूत कर रही है।


















