गर्मियों के मौसम में बाजार से दशहरी, लंगड़ा, चौसा, आम्रपाली और अल्फांसो जैसे स्वादिष्ट आम खाने के बाद ज्यादातर लोग उनकी गुठलियां कूड़े में फेंक देते हैं। हालांकि, जिन लोगों के पास घर में या आसपास पर्याप्त खाली जगह या बगीचा है, वे इन गुठलियों का उपयोग बहुत ही शानदार तरीके से नए पौधे उगाने के लिए कर सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि आप अच्छी और स्वस्थ गुठलियों को चुनें। आम खाने के बाद बची हुई गुठली को पानी से अच्छी तरह साफ कर लें और कुछ समय के लिए छाया में सूखने के लिए रख दें। जब गुठली की ऊपरी सतह सूख जाए, तब उसे तुरंत मिट्टी में दबाया जा सकता है।
किशन मलड़ा की सलाह और गुठलियों का सही चयन
बागेश्वर के रहने वाले किशन मलड़ा बताते हैं कि यदि आपके पास घर में पर्याप्त जगह वाला बगीचा मौजूद है, तो आप अलग-अलग किस्मों के आम की गुठलियों को संभालकर इकट्ठा कर सकते हैं। दशहरी, लंगड़ा, चौसा, आम्रपाली या फिर किसी भी स्थानीय और बेहद स्वादिष्ट आम की गुठलियों को आपस में मिलने से बचाने के लिए अलग-अलग रखना चाहिए। हर गुठली पर उसका नाम या उसकी किस्म लिखकर या पहचान कर रखना बेहद समझदारी का काम है, ताकि जब पौधा बड़ा हो जाए तो आपको उसकी किस्म समझने में कोई दुविधा न हो। इसके अलावा, गुठलियों को लंबे समय तक पुराना होने या खराब अवस्था में छोड़ने के बजाय उन्हें ताजा रूप में ही जमीन या गमले में बो देना अधिक फायदेमंद साबित होता है।
पौधा लगाने की सही जगह और मिट्टी की बनावट
आम की गुठली को जमीन में रोपते समय इस बात का खास ख्याल रखना चाहिए कि उस स्थान पर बारिश या सिंचाई का पानी लंबे समय तक जमा न हो सके और पौधे को पर्याप्त धूप मिलती रहे। इसके लिए मिट्टी हमेशा भुरभुरी, उपजाऊ और बेहतरीन जल निकासी वाली होनी चाहिए, ताकि जड़ें सड़ने न पाएं। गुठली को मिट्टी में स्थापित करने के बाद उसमें नमी बनाए रखना बहुत जरूरी होता है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखें कि जरूरत से ज्यादा पानी देने से बीज सड़ सकता है। जैसे ही जमीन से नन्हा पौधा बाहर निकले, उसके आसपास उगने वाली अनावश्यक घास और खरपतवार को समय-समय पर हटाते रहें। आम की नर्सरी तैयार करने के दौरान गुठली का मुख्य रूप से रूटस्टॉक तैयार करने में इस्तेमाल किया जाता है।
देखभाल और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के निर्देश
जब एक अच्छी क्वालिटी की गुठली को मनमुताबिक मिट्टी, सही नमी और उचित तापमान मिलता है, तो उसमें से अंकुर निकलना शुरू हो जाते हैं। धीरे-धीरे यही छोटा सा अंकुर एक मजबूत तने और हरी-भरी पत्तियों वाले पौधे का रूप ले लेता है। शुरुआती अवस्था में इस पौधे को तेज हवाओं के झोंके, पालतू या आवारा पशुओं और जरूरत से ज्यादा पानी के बहाव से बचाकर रखना बहुत जरूरी होता है। अगर आप अपने घरेलू बगीचे में एक साथ कई पौधे तैयार करने की सोच रहे हैं, तो उन्हें बहुत पास-पास बिल्कुल न रोपें। बड़े होने पर आम के पेड़ काफी बड़ी जगह घेरते हैं और उनकी जड़ें फैलती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी आम के पौधों के रोपण के दौरान पर्याप्त दूरी रखने और खेत या बगीचे में अच्छी जल निकासी की व्यवस्था करने पर विशेष जोर दिया है।
फल आने में लगने वाला समय और बीज बनाम ग्राफ्टिंग
यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि सिर्फ गुठली से तैयार किया गया आम का पौधा महज तीन साल के भीतर फल देने लगेगा, ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। बीज से सीधे तैयार किए गए पौधों को पूरी तरह विकसित होकर फल देने में कई लंबे साल लग सकते हैं। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक, आम के बीज से उगाए गए पौधों में फल आने की प्रक्रिया में सात से आठ साल तक का लंबा समय लग सकता है, जबकि इसके विपरीत ग्राफ्ट किए गए यानी कलम वाले पौधों में अपेक्षाकृत बहुत जल्दी फल आने की शुरुआत हो जाती है।
ग्राफ्टिंग तकनीक का इस्तेमाल और उसके फायदे
यदि आपका मुख्य लक्ष्य यह है कि आपके छोटे से बगीचे में ही अलग-अलग स्वादों और किस्मों के बेहतरीन आम मिल जाएं, तो गुठली से तैयार पौधों पर ग्राफ्टिंग करना बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में एक मजबूत पौधे को रूटस्टॉक की तरह इस्तेमाल करते हैं और अपनी मनपसंद आम की प्रजाति की स्वस्थ टहनी यानी सायन को आपस में जोड़ दिया जाता है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के अनुसार, स्टोन या एपिकोटाइल ग्राफ्टिंग आम के नए पौधे तैयार करने की सबसे तेज और कम खर्च वाली बेहतरीन विधि मानी जाती है। कई आधुनिक कृषि तकनीकों में यह बात सामने आई है कि ग्राफ्ट किए गए पौधों से बिना ग्राफ्ट किए पौधों की तुलना में काफी कम समय में फल प्राप्त किए जा सकते हैं।
एक ही पेड़ पर कई किस्में उगाने का प्रयोग
बड़े बगीचे में बागवानी के नए प्रयोग करने वाले शौकीन लोग केवल अलग-अलग पेड़ उगाने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे कृषि विशेषज्ञों की सलाह से उचित तकनीक अपनाकर एक ही पेड़ पर अलग-अलग किस्मों की कलम लगाने का हुनर भी सीख सकते हैं। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की रिपोर्ट में कुछ ऐसी आम की किस्मों का उदाहरण दिया गया है जिनकी वृद्धि की दर लगभग समान होती है और उन्हें एक ही पेड़ पर सफलतापूप्रवक ग्राफ्ट किया जा सकता है। हालांकि, यह पेचीदा काम अनुभव और बेहद सटीक तकनीकी कौशल की मांग करता है। यदि कलम लगाने का तरीका गलत हो जाए, तो पूरा पौधा कमजोर पड़ सकता है या फिर ग्राफ्टिंग की यह प्रक्रिया असफल हो सकती है।
आम की बची हुई गुठलियों को बेकार समझकर फेंकने के बजाय उन्हें सहेजकर नए पौधे तैयार करना घरेलू बागवानी से जुड़े लोगों के लिए एक बहुत ही रोचक और उपयोगी प्रयोग हो सकता है। इससे कचरे में जाने वाली गुठली का सदुपयोग पर्यावरण को हरा-भरा बनाने में हो जाता है। हालांकि, यह समझना भी बहुत जरूरी है कि बीज से उगने वाला हर पौधा मूल आम की हूबहू किस्म और बिल्कुल वही स्वाद वाला फल देगा, इसकी कोई पक्की गारंटी नहीं होती है। यदि आपको अपनी पसंद के खास स्वाद वाला आम ही चाहिए, तो पौधे पर उसी विशेष किस्म की कलम लगाना ही सबसे बेहतर और समझदारी भरा विकल्प माना जाता है।



















