अक्सर लोग जब नया फ्लैट या जमीन खरीदने का विचार बनाते हैं, तो वे केवल प्रॉपर्टी की मांग राशि और रजिस्ट्री में लगने वाले खर्च का ही बजट तैयार करते हैं। हकीकत यह है कि किसी अचल संपत्ति के सौदे में कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर नियम सीधे तौर पर जुड़े होते हैं। अगर समय रहते इन कर प्रावधानों पर गौर न किया जाए, तो खरीदार को अचानक भारी अतिरिक्त खर्च और कानूनी उलझनों का सामना करना पड़ सकता है। कर विशेषज्ञ सीए अभिषेक मिश्रा के अनुसार, चाहे मकान 1 करोड़ रुपये का हो या किसी अन्य बजट का, सौदे की शुरुआत से लेकर चाबी मिलने तक टैक्स का पूरा गणित समझना बेहद जरूरी है। इसमें टीडीएस, जीएसटी और भविष्य में बनने वाले कैपिटल गेन टैक्स जैसे अहम पहलू शामिल हैं।
पचास लाख से ऊपर के सौदे पर टीडीएस की जिम्मेदारी
आयकर नियमों के तहत जब भी कोई व्यक्ति 50 लाख रुपये से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति खरीदता है, तो खरीदार के ऊपर टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स यानी टीडीएस काटने की कानूनी बाध्यता आ जाती है। यह नियम स्पष्ट करता है कि खरीदार सीधे पूरी राशि विक्रेता को नहीं सौंप सकता। विक्रेता को भुगतान करते समय कुल तय राशि में से 1 प्रतिशत की कटौती करनी अनिवार्य होती है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी फ्लैट या प्लॉट का सौदा 1 करोड़ रुपये में तय हुआ है, तो खरीदार को 1 प्रतिशत यानी ठीक 1 लाख रुपये काटकर सरकारी खाते में जमा कराने होंगे।
यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से खरीदार के कंधों पर होती है। टीडीएस काटने के बाद तय समय सीमा के भीतर निर्धारित सरकारी प्रक्रिया का पालन करते हुए चालान के जरिए इसे जमा करना होता है। इसके साथ ही, विक्रेता को इस कटौती का वैधानिक प्रमाण पत्र भी सौंपना जरूरी है ताकि उनके खाते में यह राशि दर्ज हो सके। यदि प्रॉपर्टी का कुल सौदा 50 लाख रुपये से कम का है, तो यह टीडीएस नियम लागू नहीं होता। हालांकि, 50 लाख से ऊपर के मामलों में तय तारीख तक टीडीएस जमा करने में की गई देरी खरीदार पर भारी पड़ सकती है, क्योंकि विभाग इसके लिए ब्याज और लेट फीस वसूलता है।
निर्माणाधीन फ्लैट्स पर जीएसटी की श्रेणियां और दरें
अंडर-कंस्ट्रक्शन यानी निर्माणाधीन फ्लैट्स के मामले में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) का भुगतान खरीदार के लिए एक बड़ा वित्तीय घटक बन जाता है। यदि प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य चल रहा है या भविष्य में पूरा होना है, तो उस पर जीएसटी की दरें फ्लैट की श्रेणी के आधार पर तय होती हैं। नियमों के मुताबिक, 45 लाख रुपये तक की कीमत वाले और निर्धारित क्षेत्रफल के भीतर आने वाले मकान अफोर्डेबल श्रेणी में गिने जाते हैं। मेट्रो शहरों के लिए यह आकार 60 वर्ग मीटर तक और गैर-मेट्रो शहरों के लिए 90 वर्ग मीटर तक निर्धारित है। इस अफोर्डेबल दायरे में आने वाले फ्लैट्स पर खरीदार को केवल 1 प्रतिशत जीएसटी चुकाना पड़ता है।
दूसरी ओर, यदि फ्लैट की कीमत 45 लाख रुपये की सीमा को पार कर जाती है, या उसका कारपेट एरिया मेट्रो शहरों में 60 वर्ग मीटर और अन्य शहरों में 90 वर्ग मीटर से अधिक होता है, तो उसे नॉन-अफोर्डेबल वर्ग में रखा जाता है। ऐसे लग्जरी या बड़े फ्लैट्स की खरीद पर खरीदार को सीधे 5 प्रतिशत की दर से जीएसटी अदा करना होता है। 1 करोड़ रुपये के फ्लैट के मामले में यह अंतर लाखों रुपये की अतिरिक्त देनदारी में बदल जाता है, इसलिए बुकिंग से पहले ही बिल्डर से जीएसटी की श्रेणी लिखित में स्पष्ट कर लेनी चाहिए।
रेडी-टू-मूव संपत्ति में सीसी और ओसी का महत्व
तैयार फ्लैट यानी रेडी-टू-मूव संपत्ति के मामले में जीएसटी के नियम पूरी तरह बदल जाते हैं। किसी भी तैयार इमारत में फ्लैट लेने से पहले यह देखना सबसे आवश्यक है कि सक्षम प्राधिकरण द्वारा उस प्रोजेक्ट को कंप्लीशन सर्टिफिकेट (सीसी) या ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) मिला है या नहीं। कर नियमों के अनुसार, जिस परियोजना को निर्माण कार्य पूरा होने के बाद सक्षम सरकारी प्राधिकारी से पूर्णता प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुका है, उसके लिए जीएसटी का आकलन बिल्कुल अलग तरीके से किया जाता है। केवल विक्रेता या बिल्डर के मौखिक दावों पर भरोसा करने के बजाय संबंधित दस्तावेजों की आधिकारिक जांच करना समझदारी का कदम माना जाता है।
प्रॉपर्टी बिक्री के समय सामने आता है कैपिटल गेन टैक्स
प्रॉपर्टी की खरीद के वक्त खरीदार पर कैपिटल गेन टैक्स लागू नहीं होता, लेकिन भविष्य में जब उसी संपत्ति को किसी अन्य व्यक्ति को बेचा जाता है, तब आयकर का यह महत्वपूर्ण नियम प्रभाव में आता है। यहां सबसे पहले यह पड़ताल की जाती है कि बेची जाने वाली जमीन किस श्रेणी की है। यदि जमीन कृषि भूमि के दायरे में आती है और उससे संबंधित सभी कानूनी शर्तों को पूरा करती है, तो उसके लिए कर नियम बिल्कुल भिन्न होते हैं। इसके विपरीत, गैर-कृषि भूमि, व्यावसायिक संपत्ति या रिहायशी फ्लैट को बेचने पर शुद्ध मुनाफे की गणना की जाती है और उसी लाभ के आधार पर कैपिटल गेन टैक्स की देयता बनती है। कानून में तय नियमों के तहत कुछ मामलों में कर छूट और राहत के कानूनी प्रावधान भी मौजूद हैं।

















