उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले किसान अब अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत करने के लिए सहायक व्यवसायों का रुख कर रहे हैं। ग्रामीण अंचलों में आम तौर पर गाय, भैंस और बकरियां पालने का चलन रहा है, लेकिन अब भेड़ पालन भी कमाई के एक मजबूत और टिकाऊ माध्यम के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। खासतौर पर पाल समुदाय से ताल्लुक रखने वाले ग्रामीण परिवार इस काम को पीढ़ियों से संजोए हुए हैं। बेहद कम लागत से शुरू हो सकने वाला यह उद्यम सीमित संसाधनों वाले किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का भरोसेमंद जरिया साबित हो रहा है।
पड़रिया तुला के साहेब लाल की प्रेरणादायक मेहनत
जिले के पड़रिया तुला गांव में रहने वाले 65 वर्षीय साहेब लाल ग्रामीण आत्मनिर्भरता की जीवंत मिसाल बन चुके हैं। जीवन के इस पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद उनके उत्साह और परिश्रम में कोई कमी नहीं आई है। वह अपने पूरे रेवड़ की देखभाल खुद अपने हाथों से करते हैं। साहेब लाल अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने इस सफर की नींव केवल पांच भेड़ों के साथ रखी थी। शुरुआत में संख्या बहुत सीमित थी, लेकिन उन्होंने धैर्यपूर्वक देखभाल की और धीरे-धीरे अपने झुंड का विस्तार करते गए। आज उनके पास लगभग 150 भेड़ें मौजूद हैं।
साहेब लाल का कहना है कि पशुपालन के इस काम में निरंतर शारीरिक परिश्रम और नियमित निगरानी की जरूरत पड़ती है, मगर इससे मिलने वाला आर्थिक संबल पूरे परिवार के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है। भेड़ों के आहार प्रबंधन के लिए उन्हें गांव के आसपास मौजूद खाली मैदानों और खेतों में चराया जाता है। मौसम के बदलाव और चारे की स्थानीय उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए उनके खान-पान की दैनिक व्यवस्था की जाती है, जिससे चारे की लागत लगभग नगण्य रहती है और घर की अर्थव्यवस्था को सीधा सहारा मिलता है।
वजन और शारीरिक बनावट के आधार पर तय होती है कीमत
पशु बाजार में भेड़ों की बिक्री का एक व्यवस्थित और सीधा नियम चलता है। साहेब लाल के मुताबिक, भेड़ों का मूल्य मुख्य रूप से उनके कुल वजन और शारीरिक कद-काठी के आधार पर तय किया जाता है। स्थानीय व्यापारियों को जब मवेशी खरीदने होते हैं, तो वे सीधे गांव में पशुपालकों के घर तक पहुंच जाते हैं, जिससे किसानों को ढुलाई या मंडी ले जाने का अतिरिक्त खर्च नहीं उठाना पड़ता। एक स्वस्थ और अच्छे वजन वाली भेड़ के लिए व्यापारी आसानी से 5,000 रुपये से लेकर 7,000 रुपये तक का भाव दे देते हैं।
जैविक खाद से खेती की लागत में कमी और अतिरिक्त मुनाफा
भेड़ पालन केवल मवेशियों की सीधी बिक्री तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे मिलने वाला उप-उत्पाद यानी जैविक खाद भी किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। भेड़ों के बाड़े और विश्राम स्थल से भारी मात्रा में प्राकृतिक खाद एकत्रित होती है। किसान इस खाद को अपने खेतों में डालते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता सुधरती है और बाजार से खरीदी जाने वाली महंगी रासायनिक खाद पर होने वाला खर्च काफी हद तक घट जाता है। वहीं कुछ पशुपालक अपने पास जरूरत से ज्यादा बची खाद को आसपास के जरूरतमंद किसानों को बेचकर सीधा नकद मुनाफा कमाते हैं। इस तरह भेड़ पालन से एक ओर पशु बिक्री का पैसा मिलता है, तो दूसरी ओर खेतों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद भी मुफ्त में हासिल हो जाती है।
पाल समाज का पारंपरिक आधार और आधुनिक संभावनाएं
लखीमपुर खीरी के ग्रामीण इलाकों में पाल समाज के कई परिवार पीढ़ियों से इस व्यवसाय को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाते रहे हैं। यह उनके पारंपरिक काम का अभिन्न हिस्सा रहा है, हालांकि आधुनिक दौर में पशुओं के प्रबंधन और रख-रखाव के तौर-तरीकों में सकारात्मक बदलाव जरूर आए हैं। साहेब लाल अपनी यात्रा के आधार पर बताते हैं कि उन्होंने भी बहुत छोटे स्तर से शुरुआत की थी। पांच भेड़ों से आरंभ हुआ यह छोटा प्रयास वक्त के साथ करीब डेढ़ सौ पशुओं के बड़े रेवड़ में तब्दील हो गया। उनके दशकों के तजुर्बे से यह बात साफ होती है कि यदि पशुओं के स्वास्थ्य की उचित देखभाल की जाए और उन्हें बाजार में सही दाम पर बेचा जाए, तो भेड़ पालन ग्रामीण परिवारों को आर्थिक तंगी से उबारने का एक मजबूत साधन बन सकता है।



















