हर साल दो अक्टूबर के दिन देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के योगदान को नमन करता है। समाधि स्थलों पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं, और उनके सत्य, अहिंसा तथा स्वच्छता से जुड़े विचारों का स्मरण किया जाता है। हालांकि औपचारिक आयोजनों से परे हटकर यदि वर्तमान सामाजिक परिवेश पर नजर डाली जाए, तो आज की पीढ़ी के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी दिखाई देती है। देश में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट और संयुक्त प्रवेश परीक्षा यानी जेईई जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र लगातार गंभीर मानसिक तनाव और निराशा का सामना कर रहे हैं। कई मामलों में अंकों की इस भीषण होड़ में छात्र अपना जीवन तक गंवा बैठते हैं। यह स्थिति इस बात पर विचार करने के लिए विवश करती है कि महात्मा गांधी का शिक्षा दर्शन आज के समय में कितना महत्वपूर्ण हो चुका है।
वर्तमान भारतीय शैक्षिक ढांचा कई स्तरों पर एक अंतहीन और अंधी प्रतिस्पर्धा में बदल चुका है। बहुत छोटी उम्र से ही बच्चों के कंधों पर भारी भरकम बस्ते लाद दिए जाते हैं और उन्हें स्कूल से लेकर कोचिंग सेंटरों की दौड़ में झोंक दिया जाता है। बोर्ड परीक्षाओं के अंक, कोचिंग संस्थानों के नियमित टेस्ट और ऑल इंडिया रैंक की चक्की में पिसते हुए युवा विद्यार्थी शिक्षा के मूल उद्देश्य से पूरी तरह भटक जाते हैं। किसी भी शिक्षण व्यवस्था का ध्येय केवल बड़ी सैलरी वाले पदों पर नौकरी हासिल करना नहीं हो सकता, बल्कि उसका मुख्य लक्ष्य एक संवेदनशील, विवेकशील और बेहतर इंसान तैयार करना है। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता से काफी पहले ही यह स्पष्ट समझ लिया था कि यदि शिक्षा केवल किताबों को कंठस्थ करने और रटने तक सीमित रह गई, तो समाज भीतर से खोखला हो जाएगा। इसी चिंतन के आधार पर उन्होंने वर्ष 1937 में वर्धा सम्मेलन के दौरान नई तालीम अर्थात बेसिक एजुकेशन की संकल्पना प्रस्तुत की थी। इस दर्शन की नींव करके सीखने के सिद्धांत, शारीरिक श्रम, हाथों के व्यावहारिक हुनर और मातृभाषा के सम्मान पर टिकी थी।
डिग्रियों के अंबार के बीच नैतिक मूल्यों का संकट
मौजूदा समय में समाज के भीतर डिग्रियों और प्रमाणपत्रों की संख्या तो लगातार बढ़ रही है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर स्थिति बेहद चिंताजनक है। आधुनिक शैक्षिक तंत्र से निकलने वाले बहुत से युवाओं के भीतर न तो आवश्यक नैतिक मूल्य विकसित हो पा रहे हैं और न ही जीवन के संघर्षों तथा अप्रत्याशित मुश्किलों का सामना करने का हुनर। जब किसी परीक्षा में थोड़े कम अंक आने पर बच्चे अवसाद के गहरे भंवर में डूब जाते हैं, तब बापू के विचारों की सख्त जरूरत महसूस होती है। महात्मा गांधी का स्पष्ट मानना था कि केवल साक्षर हो जाना या अक्षर ज्ञान हासिल कर लेना शिक्षा का अंतिम पड़ाव नहीं है, बल्कि वह तो ज्ञानार्जन का महज एक जरिया भर है। उनके अनुसार वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा का संतुलित विकास करे और उसके भीतर छिपी श्रेष्ठतम मानवीय क्षमताओं को बाहर लेकर आए।
चरित्र निर्माण बनाम अंकों का संकीर्ण ढांचा
गांधीवादी शिक्षा चिंतन का मूल केंद्र बिंदु हमेशा चरित्र निर्माण रहा है। इसके विपरीत आज की व्यवस्था पूरी तरह से प्राप्तांकों और परसेंटाइल की संकीर्ण नींव पर टिकी हुई है। नीट, संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी या जेईई जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में एक-एक अंक की बढ़त हासिल करने के लिए छात्र कई वर्षों तक छोटे-छोटे कमरों में खुद को बंद कर लेते हैं और दिन-रात केवल रट्टा लगाने में जुटे रहते हैं। इस तनावपूर्ण प्रक्रिया के चलते विद्यार्थियों की मौलिक सोच, रचनात्मकता, मानसिक शांति और सामाजिक संवेदनाएं बहुत पीछे छूट जाती हैं। बापू का दृष्टिकोण आधुनिक समाज को स्पष्ट आईना दिखाता है कि यदि व्यवस्था केवल कागजी डिग्रियां बांटती रही और इंसानियत के बुनियादी उसूलों को पीछे छोड़ दिया, तो यह समूची सभ्यता की सबसे बड़ी नाकामी साबित होगी।
नई तालीम और आधुनिक राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समानताएं
भारत की आजादी से पूर्व महात्मा गांधी ने जिस दूरदर्शी मॉडल की रूपरेखा रखी थी, उसकी उपयोगिता आधुनिक युग में भी पूरी तरह बरकरार है। वर्तमान समय की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 यानी एनईपी 2020 में जिस वोकेशनल ट्रेनिंग, कौशल विकास और बैगलेस डे जैसे प्रयोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसकी वैचारिक नींव बापू ने अपनी नई तालीम के माध्यम से दशकों पहले रख दी थी। महात्मा गांधी चाहते थे कि विद्यार्थी केवल सैद्धांतिक पाठ पढ़ने तक सीमित न रहें, बल्कि वे पढ़ाई के साथ-साथ किसी न किसी दस्तकारी या व्यावहारिक कौशल में निपुण बनें, ताकि वे पूरी आत्मनिर्भरता के साथ अपने पैरों पर खड़े हो सकें। आज जब देश भर में डिग्री धारकों की बेरोजगारी और किताबी पाठ्यक्रम तथा वास्तविक कार्यक्षेत्र की जरूरतों के बीच बढ़ते अंतर पर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं, तब बापू की यह दृष्टि एक ठोस समाधान पेश करती है। शिक्षा का सीधा सरोकार समाज की जमीनी सच्चाइयों से होना चाहिए, न कि केवल वातानुकूलित कोचिंग संस्थानों की चारदीवारी तक।
अंकों के मानसिक दबाव से मुक्ति की आवश्यकता
गांधी जयंती के अवसर पर केवल रस्मी औपचारिकताएं निभाने के बजाय यह जरूरी है कि शिक्षण व्यवस्था और अभिभावक मिलकर बच्चों के मन से असफलता के खौफ को दूर करें। माता-पिता और समाज दोनों को यह स्वीकार करना होगा कि किसी परीक्षा में वांछित परिणाम न मिलना जीवन की समाप्ति नहीं है। बापू के संपूर्ण जीवन दर्शन से यह स्पष्ट सीख मिलती है कि इंसान अपने अनुभवों और गलतियों से सीखकर ही व्यक्तित्व का निर्माण करता है, केवल किसी सूची में शीर्ष स्थान पाने से जीवन की सार्थकता तय नहीं होती। वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली को अधिक लचीला और मानवीय बनाने की आवश्यकता है, जिससे विद्यार्थी किसी आंतरिक भय या सामाजिक दबाव के बिना सहजता और उत्साह के साथ ज्ञान अर्जित करने के लिए शिक्षण संस्थानों की ओर कदम बढ़ाएं।



















