घर के रोजमर्रा के कामकाज में व्यस्त रहने वाले लोगों, खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों और घरेलू महिलाओं के साथ पैरों में पानी लगने की समस्या अक्सर देखने को मिलती है। पानी में लंबे समय तक काम करने की वजह से पैरों की त्वचा खराब होने लगती है, जिसे आम बोलचाल में पैर बीमाय होना यानी त्वचा का फटना या गहरी दरारें आना भी कहा जाता है। इन दरारों और खुरदरेपन की वजह से चलने-फिरने में तेज दर्द और असहजता का सामना करना पड़ता है।
पारंपरिक तरीकों से पाएं दर्द भरी दरारों से मुक्ति
इस तकलीफ से निपटने के लिए बीना देवी ने कुछ बेहद आसान और सदियों पुराने पारंपरिक तरीके साझा किए हैं। पुराने समय से लोग बिना पैसे खर्च किए घर और आसपास मिलने वाली प्राकृतिक चीजों से इस समस्या का समाधान करते आए हैं। खासकर ग्रामीण परिवेश में रहने वाले लोगों के लिए यह उपाय बहुत सुलभ और असरदार साबित होते हैं, जहां प्राथमिक स्तर पर प्राकृतिक वनस्पतियों का सहारा लिया जाता रहा है।
तुलसी, मेहंदी और सरसों के तेल का सरल प्रयोग
अगर आसपास मेहंदी उपलब्ध हो, तो इसके ताजे पत्तों को पीसकर पैरों के प्रभावित हिस्से पर लगाने से ठंडक और बड़ा आराम मिलता है। इसके साथ ही आंगन में मिलने वाली तुलसी के पत्तों का लेप बनाकर भी फटी त्वचा और पानी लगे हिस्सों पर लगाया जाता है। नियमित रूप से सरसों का तेल लगाना भी त्वचा की नमी लौटाने और खुरदरापन मिटाने का एक जाना-माना घरेलू तरीका रहा है। इसके अलावा एक दिलचस्प पारंपरिक उपाय यह भी है कि होली खेलने वाले सूखे या पक्के रंग को पानी में घोलकर पैरों पर लगाया जाता है, जिसे लोग राहत पाने के लिए आजमाते रहे हैं।
महावर या आलता का इस्तेमाल और आधुनिक विकल्प
पैरों की इस समस्या से राहत पाने का सबसे प्रचलित और आसान उपाय महावर या आलता है, जो अमूमन अधिकांश परिवारों में आसानी से मिल जाता है। महिलाएं इसे पारंपरिक रूप से पैरों के श्रृंगार के लिए लगाती हैं, मगर इसका उपयोग त्वचा की दरारों, खुरदरेपन और पानी लगने की परेशानी से बचाव में भी किया जाता है। हालांकि वर्तमान दौर में मेडिकल स्टोर्स पर फटी एड़ियों और संक्रमण के लिए कई तरह की आधुनिक दवाइयां और क्रीम मौजूद हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग इन पारंपरिक घरेलू उपायों पर पूरा भरोसा जताते हैं।

















