नाश्ते में गरमा-गरम आलू की रसेदार सब्जी हो, मसालेदार छोले हों या फिर मीठा सूजी का हलवा, इनके साथ जब तक थाली में गुब्बारे की तरह फूली हुई खस्ता पूरी न परोसी जाए, तब तक खाने का असली आनंद अधूरा ही रहता है। हमारे घरों में त्योहारों के विशेष अवसर से लेकर रविवार की सुबह के खास नाश्ते और पारिवारिक आयोजनों तक पूरी हर रसोई की पहली पसंद बनी रहती है। पहली नजर में पूरी बनाना बहुत सामान्य और आसान पाक कला लग सकती है, लेकिन हर बार एक जैसी गोल, समान रूप से फूली हुई और कुरकुरी पूरी तैयार करना उतना सरल साबित नहीं होता। कई बार गृहणियों और नए रसोइयों के सामने यह उलझन आती है कि पूरी कड़ाही में जाते ही केवल एक किनारे से हल्की सी फूलती है और बाकी का हिस्सा पूरी तरह चपटा रह जाता है। कभी तलने के चंद मिनटों के भीतर ही पूरी पिचक कर मुरझा जाती है, तो कई बार यह तलते समय इतना अधिक तेल पी लेती है कि खाने का पूरा स्वाद ही भारी और चिपचिपा लगने लगता है।
असल में इस तरह की दिक्कतों के पीछे कोई बहुत बड़ी गड़बड़ी या विशेष हुनर की कमी नहीं होती, बल्कि आटा तैयार करने, लोई बेलने के तौर-तरीके और कड़ाही में तेल के सही तापमान से जुड़ी बेहद बारीक बातों की अनदेखी मुख्य कारण बनती है। यदि पूरी के लिए गूंथे जाने वाले आटे की बनावट को संतुलित रखा जाए, बेलते समय मोटाई का सटीक ध्यान दिया जाए और तलते वक्त आंच और तेल की गर्मी को नियंत्रित रखा जाए, तो घर की सामान्य कड़ाही में भी हलवाई जैसी खिली-खिली, फुदकती और बेदाग पूरियां बेहद आसानी से उतारी जा सकती हैं। आइए क्रमबद्ध तरीके से समझते हैं कि पूरी बनाने की समूची प्रक्रिया में कौन से महत्वपूर्ण चरणों पर विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।
आटे को रोटी जैसा नरम न रखें, गूंथते समय बरतें यह सख्ती
एक शानदार और लंबे समय तक फूली रहने वाली पूरी की नींव उसके आटे के गूंथने के अंदाज पर ही टिकी होती है। आमतौर पर लोग जिस तरह रोजमर्रा की चपाती या फुलके के लिए काफी नरम और लचीला आटा लगाते हैं, वही तरीका पूरी के आटे में आजमाने से सबसे बड़ी गलती हो जाती है। पूरी तैयार करने के लिए जब आप परात में गेहूं का आटा लें, तो सबसे पहले उसमें अपने स्वाद के अनुसार थोड़ा सा सादा नमक अच्छी तरह मिला लें। इसके साथ ही आटे में मोयन देने के लिए एक छोटा चम्मच रिफाइंड तेल या शुद्ध देसी घी का इस्तेमाल किया जा सकता है। मोयन को आटे में सूखी अवस्था में ही हथेलियों से रगड़कर समान रूप से मिला लेना चाहिए।
इसके बाद आटे में एक साथ ढेर सारा पानी उड़ेलने के बजाय बिल्कुल थोड़ा-थोड़ा करके पानी का छिड़काव करें और आटा बांधना शुरू करें। यहां सबसे बुनियादी नियम यही है कि पूरी का आटा रोटी के आटे की तुलना में थोड़ा सख्त, कसा हुआ लेकिन अच्छी तरह मसला हुआ चिकना होना चाहिए। यदि आटा जरूरत से ज्यादा गीला या अत्यधिक नरम हो जाएगा, तो वह चकले और बेलन पर फैल तो बहुत जल्दी जाएगा, लेकिन कड़ाही में उतरते ही स्पंज की तरह अत्यधिक तेल सोखने लगेगा। इतना ही नहीं, नरम आटे से बनी पूरी कड़ाही से बाहर आते ही बहुत जल्दी अपनी भाप खोकर चपटी हो जाती है और लंबे समय तक अपनी फूली हुई बनावट को बरकरार नहीं रख पाती। इसलिए पानी की एक-एक बूंद को मापते हुए डालें ताकि आटे का कसाव और कड़ापन पूरी तरह सुरक्षित रहे।
सूजी का संतुलन देगा मनचाहा कुरकुरापन और अजवाइन का स्वाद
यदि आप और आपके परिवार के सदस्य सामान्य मुलायम पूरी के बजाय थोड़ी कुरकुरी और करारी पूरी खाना पसंद करते हैं, तो गेहूं के आटे में थोड़ी सी बारीक सूजी मिलाना एक बेहतरीन उपाय साबित होता है। इसके सटीक अनुपात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। सामान्य तौर पर दो कप गेहूं के आटे के भीतर लगभग एक से दो बड़े चम्मच बारीक सूजी मिलाना बिल्कुल पर्याप्त और आदर्श माना जाता है। सूजी की मात्रा इससे अधिक बिल्कुल न बढ़ाएं, क्योंकि जरूरत से ज्यादा सूजी डालने पर पूरी का टेक्सचर बहुत ज्यादा कड़ा और सूखा हो सकता है, जिससे तलने के बाद वह सख्त पापड़ जैसी बन सकती है।
आटे में सूजी मिलाने के बाद पूरे मिश्रण को दोनों हाथों से खूब अच्छी तरह मसलें ताकि सूजी के दाने पूरे आटे में एकसार रम जाएं। इसके साथ ही अगर आप चाहें तो इसमें थोड़ा सा साबुत अजवाइन भी अपनी हथेलियों के बीच हल्का सा रगड़कर शामिल कर सकते हैं। विशेष रूप से जब आप पूरी को तीखी, चटपटी तरी वाली आलू की सब्जी, रसेदार कद्दू या फिर काबुली चने के छोलों के साथ परोसने जा रहे हों, तो अजवाइन की हल्की तीखी और पाचक खुशबू पूरी के स्वाद को कई गुना ज्यादा लजीज और रुचिकर बना देती है।
गूंथे हुए आटे को लंबे समय तक खुला छोड़ने से बचें
सामान्य रोटी या लच्छा परांठा बनाते समय आटे को गूंथने के बाद आधे घंटे तक आराम करने के लिए छोड़ना एक सामान्य प्रक्रिया है ताकि ग्लूटेन विकसित हो सके, परंतु पूरी के आटे के संदर्भ में यह नियम पूरी तरह उल्टा काम करता है। पूरी का सख्त आटा तैयार करने के बाद उसे बहुत लंबे समय तक यूं ही पड़ा नहीं रहने देना चाहिए। आटा गूंथ लेने के तुरंत बाद उसे अधिकतम 10 से 15 मिनट के लिए ही विश्राम देना काफी होता है।
यदि पूरी के आटे को खुली हवा में बिना ढके छोड़ दिया जाए, तो कमरे की हवा से उसकी सबसे ऊपरी परत बहुत तेजी से सूखकर कड़ी पपड़ी में बदलने लगती है। ऐसी स्थिति में जब आप उस सूखे आटे की लोइयां बनाकर बेलने की कोशिश करेंगे, तो किनारों पर भद्दे कटाव और दरारें आने लगेंगी। दरार वाली पूरियां कभी भी तेल में पूरी तरह नहीं फूल पातीं क्योंकि भाप उन्हीं छेदों से बाहर निकल जाती है। इस परेशानी से बचने के लिए आटे को किसी साफ स्टील की थाली, कटोरी या फिर हल्के गीले सूती कपड़े से ढककर ही रखें। 10 से 15 मिनट का समय पूरा होने पर आटे पर हल्का सा दबाव डालते हुए एक बार दोबारा हल्के हाथों से मसल लें और फिर बिना किसी देरी के एक बराबर आकार की छोटी-छोटी लोइयां काट लें।
बेलते समय मोटाई और सूखे आटे का संतुलन
पूरी के कड़ाही में पूरी तरह फूलने और उसके दोनों पल्लों के अलग होने में उसकी मोटाई का सबसे निर्णायक योगदान होता है। लोई को बेलते समय इस बात का खास ख्याल रखें कि वह न तो किसी भारी परांठे की तरह बहुत मोटी रह जाए और न ही किसी पतली रुमाली रोटी की भांति अत्यधिक महीन हो जाए। पूरी को हमेशा केंद्र से लेकर बाहरी किनारों तक बिल्कुल एक समान मोटाई में बेलना चाहिए। यदि पूरी का बीच का हिस्सा मोटा रह जाएगा और उसके किनारे बहुत पतले बेल दिए जाएंगे, तो तलते समय भाप का दबाव एक तरफा हो जाएगा और पूरी कभी भी चारों तरफ से एकसार गुब्बारे जैसी नहीं फूल पाएगी।
लोई बेलते समय एक और आम गलती सूखे परथन यानी सूखे आटे का अत्यधिक इस्तेमाल करना है। चकला-बेलन पर लोई को चिपकने से बचाने के लिए यदि आप बार-बार सूखा आटा लगाएंगे, तो वह अतिरिक्त सूखा आटा पूरी के साथ चिपककर गर्म तेल की कड़ाही में चला जाएगा। वहां पहुंचकर यह सूखा आटा तुरंत जलकर काला पड़ जाएगा, जिससे पूरी कड़ाही का तेल मैला, गंदा और कड़वा हो जाता है और पूरियों की बाहरी सतह पर भी जले हुए काले धब्बे चिपक जाते हैं। इस समस्या से बचने का सबसे मुफीद तरीका यह है कि आप सूखे आटे का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दें और लोई पर तथा चकले पर मात्र एक-दो बूंद हल्का सा कुकिंग तेल लगाकर चिकना कर लें और फिर हल्के हाथ से पूरी को बेलें।
कड़ाही में तेल का सही तापमान तय करेगा पूरी का रूप-रंग
पूरी के तलने की प्रक्रिया में सबसे नाजुक और महत्वपूर्ण मोड़ तेल के तापमान का प्रबंधन होता है। यदि कड़ाही में भरा तेल पर्याप्त रूप से गर्म नहीं होगा और ठंडा या गुनगुना रह जाएगा, तो पूरी तेल की तली में काफी देर तक डूबी रहेगी, धीरे-धीरे पकेगी और भीतर तक बहुत ज्यादा तेल पीकर चिपचिपी और भारी हो जाएगी। इसके विपरीत, यदि तेल जरूरत से ज्यादा खौल रहा होगा और उससे गहरा धुआं उठ रहा होगा, तो पूरी कड़ाही में गिरते ही चंद पलों में बाहर से जलकर गहरी भूरी या काली पड़ जाएगी, जबकि उसका भीतरी हिस्सा बिल्कुल कच्चा रह जाएगा और उसे समय से पहले ही बाहर निकालना पड़ जाएगा।
तेल पूरी तलने के लिए एकदम सही गर्म हुआ है या नहीं, इसकी जांच करने के लिए गूंथे हुए आटे का एक बहुत छोटा सा नन्हा टुकड़ा कड़ाही में डालकर देखें। यदि वह आटे की गोली कड़ाही के पेंदे को छूते ही तुरंत बिना जले तेजी से तैरकर सतह पर ऊपर आ जाए और उसके चारों तरफ बारीक-बारीक बुलबुले फूटते दिखाई दें, तो समझ लें कि तेल पूरी तलने के लिए बिल्कुल मुफीद स्थिति में आ चुका है। इसके बाद गैस चूल्हे की आंच को हमेशा मध्यम से लेकर मध्यम-तेज के बीच ही स्थिर रखें और अत्यधिक धीमी आंच पर पूरियां तलने की भूल कभी न करें।
कड़ाही में पूरी फुलाने की अचूक तकनीक और परोसने का तरीका
चकले से पूरी को उठाकर बेहद सावधानी के साथ गर्म तेल की कड़ाही के किनारे से भीतर सरकाएं ताकि तेल के छींटे बाहर न छलकें। जैसे ही पूरी तेल के ऊपर तैरने लगे, तुरंत छेद वाली कलछी या झारे की मदद से कड़ाही का खौलता हुआ गर्म तेल उठाकर पूरी की ऊपरी सूखी सतह पर लगातार हल्का-हल्का डालते रहें या फिर कलछी के पिछले हिस्से से पूरी के केंद्र को बहुत हल्के हाथ से नीचे की ओर दबाएं। इस प्रक्रिया से पूरी के भीतर तुरंत तेज भाप का निर्माण होता है और पूरी के ऊपर और नीचे के दोनों स्तर तत्काल अलग होकर गुब्बारे की तरह फूल उठते हैं।
पूरी के एक तरफ हल्का सुनहरा और बादामी रंग उभरते ही उसे तुरंत दूसरी तरफ पलट दें और दूसरी सतह को भी समान रूप से हल्का सा सेंक लें। इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि कड़ाही के घेरे और तेल की मात्रा के हिसाब से एक बार में गिनी-चुनी पूरियां ही तलने के लिए डालें। कड़ाही को जरूरत से ज्यादा पूरियों से ठसाठस भर देने पर तेल का तापमान एकाएक नीचे गिर जाता है, जिससे कोई भी पूरी ठीक तरह से नहीं फूल पाती। पूरी तलकर निकालते वक्त उसे कड़ाही के किनारे पर कलछी को कुछ पलों के लिए तिरछा करके रोकें ताकि अतिरिक्त तेल वापस कड़ाही में टपक जाए। इसके बाद इसे किसी जालीदार छलनी वाले बर्तन या खुली थाली में रखें। गर्म पूरियों को तुरंत किसी बंद कैसरोल या ढक्कनदार डिब्बे में कसकर बंद करने से बचें, क्योंकि अंदर बनने वाली भाप पानी बनकर पूरियों पर टपकेगी जिससे उनकी कुरकुरी परत नरम और सौगी हो जाएगी।
पहले से बेलकर रखने की आदत से बचें
जब घर में कई मेहमान आए हों या त्योहार पर ढेर सारी पूरियां एक साथ बनानी हों, तो समय बचाने के चक्कर में अक्सर लोग सारी पूरियों को एक साथ पहले से ही बेलकर थालियों में सजाकर रख देते हैं। यह तरीका पूरी के टेक्सचर को पूरी तरह खराब कर देता है। लंबे समय तक खुली हवा में बेली हुई पूरियां रखने से उनकी बाहरी नमी पूरी तरह उड़ जाती है और वे सूखकर कड़ी होने लगती हैं। इसके अलावा यदि उन्हें एक के ऊपर एक तह बनाकर रख दिया जाए तो वे आपस में चिपक जाती हैं और उठाते समय फट जाती हैं। सबसे बेहतर व्यवस्था यही होती है कि आप लोइयां पहले से तैयार करके ढककर रख लें और जैसे-जैसे कड़ाही में तलने की बारी आए, साथ के साथ तीन-चार पूरियां बेलते जाएं और कड़ाही में तलते जाएं। इन सरल और बुनियादी नियमों का पालन करने से आपकी हर पूरी हमेशा गोल, सुनहरी, फूली हुई और कुरकुरी बनकर तैयार होगी।



















