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पशु चिकित्सक डॉ. विनोद चौधरी ने दी सलाह, सितंबर में इस तरह रखें अपनी गाय-भैंसों को बीमारियों से सुरक्षितजीवनशैली
12 सित॰ 2026, 11:19 pm (56 मिनट पहले)· 0

पशु चिकित्सक डॉ. विनोद चौधरी ने दी सलाह, सितंबर में इस तरह रखें अपनी गाय-भैंसों को बीमारियों से सुरक्षित

सितंबर के महीने में बदलते मौसम के कारण गाय और भैंसों में पेट के कीड़े और संक्रामक बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है, जिससे दूध उत्पादन गिर सकता है। पशु चिकित्सक डॉ. विनोद चौधरी ने पशुपालकों के लिए इस नुकसान से बचने और पशुओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए कुछ बेहद जरूरी उपाय साझा किए हैं।

बदलता हुआ मौसम न केवल इंसानों की सेहत को प्रभावित करता है, बल्कि गाय और भैंस जैसे दूध देने वाले मवेशियों के लिए भी कई तरह की शारीरिक चुनौतियां लेकर आता है। सितंबर के दौरान जब मौसम में बदलाव होता है, तो पालतू पशुओं में पेट के कीड़े, चिचड़ी-किलनी जैसे परजीवी और कई तरह की संक्रामक बीमारियों के फैलने की आशंका बहुत अधिक बढ़ जाती है। इन बीमारियों का सीधा नकारात्मक प्रभाव पशुओं के स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके रोजाना के दूध उत्पादन पर भी पड़ता है। पशु चिकित्सा के विशेषज्ञ डॉ. विनोद चौधरी के मुताबिक, अगर इस संवेदनशील समय में पशुपालक थोड़ी सी सावधानी बरतें और सही कदम उठाएं, तो वे अपने पशुओं को बीमार होने से सुरक्षित रख सकते हैं और दूध की मात्रा में होने वाली कमी को भी आसानी से रोक सकते हैं।

पेट के कीड़ों को खत्म करने के लिए डीवॉर्मिंग है जरूरी

पशुओं के पेट में कीड़े होना एक ऐसी समस्या है जो उन्हें अंदर से कमजोर बना देती है। ऐसी स्थिति में गाय या भैंस चारा तो सामान्य रूप से खाती हैं, लेकिन उस चारे का पूरा पोषक तत्व उनके शरीर को नहीं मिल पाता है। इसकी वजह से पशु धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है और इसका असर सीधे तौर पर दूध के उत्पादन में गिरावट के रूप में सामने आता है। इसलिए, इस बदलते मौसम में पशुओं की डीवॉर्मिंग यानी पेट के कीड़े मारने की दवा देना बेहद आवश्यक हो जाता है। हालांकि, पशुपालकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि गाभिन यानी गर्भवती और खाली पशुओं के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाएं अलग-अलग होती हैं। ऐसी स्थिति में बिना किसी डॉक्टरी सलाह के खुद से कोई भी दवा देने के बजाय हमेशा किसी योग्य पशु चिकित्सक से परामर्श लेकर ही उचित डीवॉर्मिंग करवानी चाहिए।

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चिचड़ी-किलनी का इलाज और खतरनाक बीमारियों से बचाव

मवेशियों के शरीर पर चिपकने वाली चिचड़ी और किलनी जैसे बाहरी परजीवी उनका खून चूसते हैं, जिससे पशु लगातार कमजोर होने लगते हैं। इसके साथ ही, मानसून के बाद बाड़े में मच्छरों की तादाद बढ़ने से भी पशुओं को काफी बेचैनी और परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए पशुपालकों को अपने पशुबाड़े में नियमित रूप से कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए और पशुओं के शरीर पर मौजूद परजीवियों के खात्मे के लिए उचित इलाज करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, इस मौसम में गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और खुरपका-मुंहपका जैसी बेहद संक्रामक और घातक बीमारियों के फैलने का जोखिम भी बहुत ज्यादा रहता है। यदि मानसून की शुरुआत से पहले पशुओं का टीकाकरण नहीं कराया गया था, तो पशुपालकों को अब इस काम में बिल्कुल भी देरी नहीं करनी चाहिए। समय पर टीका लगवाने से पशुओं को इन जानलेवा संक्रामक बीमारियों से पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सकता है।

हरे चारे की कमी को दूर करने के लिए साइलेज का निर्माण

सितंबर का महीना खत्म होने के साथ ही ज्वार, बाजरा और मक्का जैसे खरीफ सीजन के हरे चारे की उपलब्धता खेतों में धीरे-धीरे कम होने लगती है। दूसरी ओर, सर्दियों के मुख्य चारे जैसे बरसीम और जई की फसल तैयार होने में अभी काफी समय बाकी रहता है। इन दोनों सीजन के बीच के समय में चारे की भारी कमी हो सकती है, जिससे पशुओं का दूध उत्पादन काफी घट जाता है। इस समस्या का समाधान यह है कि यदि आपके खेत में ज्वार, बाजरा या मक्का की फसल खड़ी है, तो उसे समय रहते काटकर उसका साइलेज बनाकर सुरक्षित रख लें। यह साइलेज सर्दियों के दिनों में हरे चारे की कमी के दौरान आपके पशुओं के लिए एक बेहतरीन और पौष्टिक भोजन साबित होगा। इसके साथ ही, इसी महीने के आखिरी सप्ताह तक पशुपालकों को बरसीम, जई और रिजका की बुवाई के लिए अपने खेतों को पूरी तरह तैयार कर लेना चाहिए।

पशुओं का प्रजनन काल और थनैला रोग से सुरक्षा के उपाय

पशु चिकित्सक डॉ. विनोद चौधरी के अनुसार, सर्दियों का सुहावना मौसम गाय और भैंसों में गर्भधारण और प्रजनन के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। ऐसे में पशुपालकों को अपने पशुओं के हीट में आने वाले लक्षणों पर लगातार और पैनी नजर रखनी चाहिए। जब भी कोई पशु हीट में आता है, तो उसके अगले 12 से 18 घंटे का समय कृत्रिम गर्भाधान कराने के लिए सबसे अनुकूल और महत्वपूर्ण होता है। इसके अलावा, पशुपालक चाहें तो उन्नत और बेहतरीन नस्ल के झोटे या सांड से भी अपने पशुओं का क्रॉस करवा सकते हैं। इसके साथ ही, दुधारू पशुओं को थनैला जैसी गंभीर और दर्दनाक बीमारी से बचाने के लिए उनके रहने के स्थान यानी पशुशाला की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। बाड़े का फर्श कभी भी गीला या कीचड़युक्त नहीं होना चाहिए और नमी को सुखाने के लिए नियमित रूप से चूने के पाउडर का छिड़काव करना चाहिए। इसके अलावा, पशुशाला में ताजी हवा के आने-जाने की भी पूरी और उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

सवाल-जवाब

सितंबर का महीना दुधारू पशुओं के लिए अधिक जोखिम भरा क्यों होता है?
सितंबर में बदलते मौसम के कारण पेट के कीड़े, चिचड़ी-किलनी जैसे परजीवी और कई संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, जिससे पशुओं की सेहत खराब होती है और दूध उत्पादन घट सकता है।
पशुओं की डीवॉर्मिंग से पहले क्या सावधानी रखनी चाहिए?
पशुपालकों को हमेशा पशु चिकित्सक की सलाह पर ही दवा देनी चाहिए, क्योंकि गर्भवती (गाभिन) और खाली पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाएं अलग-अलग होती हैं।
सर्दियों में हरे चारे की कमी से निपटने के लिए पशुपालक क्या कर सकते हैं?
खेतों में खड़ी ज्वार, बाजरा या मक्का जैसी फसलों को काटकर उनका साइलेज बनाकर सुरक्षित रख लेना चाहिए, जो सर्दियों में हरे चारे की कमी के समय काम आता है।
पशु के हीट में आने पर कृत्रिम गर्भाधान के लिए सबसे सही समय क्या है?
गाय या भैंस के हीट में आने के बाद लगभग 12 से 18 घंटे के भीतर कृत्रिम गर्भाधान कराना या उन्नत नस्ल के सांड से क्रॉस कराना सबसे सही माना जाता है।
मवेशियों को थनैला रोग से बचाने के लिए क्या उपाय करने चाहिए?
पशुशाला को हमेशा साफ और सूखा रखना चाहिए, फर्श पर चूने के पाउडर का छिड़काव करना चाहिए और हवा के आने-जाने की सही व्यवस्था रखनी चाहिए।
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