पपीता एक ऐसा बारहमासी फल है जो सालों भर फलता और फूलता रहता है। स्वास्थ्य के लिहाज से यह बेहद लाभकारी माना जाता है। इसमें पाया जाने वाला पपेन नामक विशेष एंजाइम हमारे पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है और भोजन को आसानी से पचाने में मदद करता है। नियमित रूप से पपीते का सेवन करने से कब्ज जैसी गंभीर पेट की समस्याओं से राहत मिलती है। इसके अलावा इसमें प्रचुर मात्रा में मौजूद विटामिन ए, विटामिन सी और बेहतरीन एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा की खोई हुई चमक वापस लाते हैं और उसे स्वस्थ रखते हैं। अच्छी बात यह है कि इस गुणकारी फल के पौधे को आप अपने घर की छत या बालकनी में गमले में भी बहुत आसानी से उगा सकते हैं। बाजार से उच्च गुणवत्ता वाले बीज खरीदकर या नर्सरी से छोटा पौधा लाकर आप अपने घर के बगीचे को हरा-भरा कर सकते हैं। पपीते के पौधे के लिए गमले का सही आकार क्या होना चाहिए, इसके लिए मिट्टी कैसे तैयार की जाती है, कौन सी खाद कब डालनी चाहिए और फूलों को झड़ने से रोककर बंपर फल कैसे पाएं, आइए इन सभी बातों को विस्तार से समझते हैं।
पपीता लगाने का सही समय और सर्वोत्तम किस्में
पपीते के पौधे को साल के मुख्य रूप से दो सीजन में लगाया जा सकता है। पहला अनुकूल समय फरवरी से अप्रैल के बीच का होता है और दूसरा समय जून से सितंबर के महीनों का होता है। यदि आप घर पर पौधा तैयार नहीं करना चाहते हैं तो किसी भी स्थानीय सरकारी या निजी नर्सरी से पपीते का एक छोटा पौधा मात्र 30 रुपये से 50 रुपये में आसानी से खरीद सकते हैं। यदि आप खुद बीज से पौधा उगाना चाहते हैं, तो बंपर पैदावार पाने के लिए आपको बेहतरीन हाइब्रिड किस्मों का चयन करना चाहिए। पपीते की कुछ प्रमुख और अत्यधिक फल देने वाली किस्में हैं जैसे रेड लेडी, आइस बेरी, ताइवान रेड लेडी 786 F1, विनायक, ग्रीन बेरी, पूसा ड्वार्फ और पूसा नन्हा। खासकर गृह वाटिका या किचन गार्डन के लिहाज से रेड लेडी 786, ताइवान 786 और पूसा नन्हा सबसे उपयुक्त और बेहतरीन किस्में मानी जाती हैं। ये किस्में आकार में छोटी होती हैं, कम जगह घेरती हैं और बहुत ही कम समय में भारी मात्रा में फल देती हैं। इन सभी चुनिंदा वैरायटी के फल लगभग 220 दिनों के भीतर पककर पूरी तरह तैयार हो जाते हैं। सामान्य तौर पर पौधा लगाने के लगभग 8 से 9 महीने बाद आप पपीते की पहली हार्वेस्टिंग यानी फलों की तुड़ाई कर सकते हैं।
घर के पपीते से बीज तैयार करने की विधि
कई बार जब आप बाजार से पपीता खरीदकर घर लाते हैं और वह बहुत मीठा निकलता है, तो मन में यह विचार आता है कि क्यों न इसके बीजों से नया पौधा तैयार कर लिया जाए। ऐसा करना बिल्कुल संभव है, लेकिन इसके लिए एक विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। दरअसल पपीते के ताजे बीजों के ऊपर एक पतली और चिपचिपी जेली जैसी कोटिंग होती है, जिसे सार्कोटेस्टा कहा जाता है। यह प्राकृतिक कोटिंग बीजों को अंकुरित होने से रोकती है ताकि वे फल के अंदर ही न उग जाएं। इसलिए ताजे बीजों से पौधा उगाने के लिए सबसे पहले उन बीजों को एक सूती कपड़े पर रखें और हल्के हाथों से रगड़ें। रगड़ने से सार्कोटेस्टा की चिपचिपी परत पूरी तरह साफ हो जाएगी। इसके बाद इन बीजों को किसी छायादार स्थान पर 2 से 3 दिनों के लिए अच्छी तरह सुखा लें। जब बीज सूख जाएं, तब इन्हें किसी छोटे गमले या सीडलिंग ट्रे में बोएं। बीजों को मिट्टी में केवल आधा सेंटीमीटर की गहराई पर ही दबाना चाहिए और ऊपर से मिट्टी की एक पतली परत से ढक देना चाहिए। इस आसान तरीके से आप घर पर ही मजबूत पौधे तैयार कर सकते हैं।
मिट्टी का सही मिश्रण और बीजों का अंकुरण
पपीते के पौधे के लिए मिट्टी तैयार करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि मिट्टी ऐसी हो जिसमें पानी बिल्कुल न ठहरे, क्योंकि पपीते की जड़ों में पानी रुकने से वे बहुत जल्दी सड़ने लगती हैं। एक आदर्श पॉटिंग मिक्स बनाने के लिए 50 प्रतिशत बगीचे की सामान्य साफ मिट्टी लें। इसमें 30 प्रतिशत अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की पुरानी खाद या केंचुआ खाद यानी वर्मीकंपोस्ट मिलाएं। बाकी बचे 20 प्रतिशत हिस्से में कोकोपीट या साफ बालू रेत मिला लें ताकि मिट्टी भुरभुरी और हवादार बनी रहे। अब छोटे-छोटे मिट्टी के कुल्हड़ या डिस्पोजेबल कप लें और इस तैयार मिट्टी को भरें। मिट्टी में आधा सेंटीमीटर अंदर बीज को दबाकर ऊपर से हल्की मिट्टी डाल दें। बीजों को कभी भी खुले में न छोड़ें। बीजों से छोटे पौधे बाहर आने में मौसम के हिसाब से 10 से 12 दिनों का समय लगता है। अगर आपके इलाके का तापमान 15 डिग्री सेल्सियस से कम है, तो अंकुरण में 20 दिन तक का समय लग सकता है। पपीते के अच्छे अंकुरण के लिए सबसे अनुकूल तापमान 20 से 30 डिग्री Celsius के बीच माना जाता है। जब पौधे लगभग 6 इंच के हो जाएं, तो उन्हें कम से कम 24 इंच के बड़े गमले या बड़े ग्रो बैग में स्थानांतरित कर दें। इस दौरान मिट्टी तैयार करते समय उसमें दो मुट्ठी नीम की खली जरूर मिला दें, जो जड़ों को फंगस से बचाएगी।
धूप, सिंचाई और प्रारंभिक विकास के लिए जरूरी खाद
पपीते के पौधे को अच्छी बढ़त और मीठे फल देने के लिए रोजाना कम से कम 4 से 6 घंटे की सीधी और तेज धूप की जरूरत होती है। पर्याप्त धूप मिलने से पौधे का तना मजबूत बनता है और फलों में मिठास आती है। अगर पौधे को छाया में रखा जाएगा, तो वह केवल लंबाई में बढ़ता चला जाएगा और कमजोर होकर टूट सकता है। पपीते को नियमित लेकिन संतुलित पानी की आवश्यकता होती है। जब पौधा अपनी विकास की प्रारंभिक अवस्था में हो, तो प्रत्येक 15 से 20 दिनों के अंतराल पर मिट्टी की हल्की गुड़ाई जरूर करें। गुड़ाई करने के बाद पौधे के चारों तरफ वर्मीकंपोस्ट या सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ दो चम्मच पिसी हुई सरसों की खली डालें। खाद डालने के बाद मिट्टी को अच्छी तरह ऊपर-नीचे कर दें ताकि पोषक तत्व जड़ों तक पहुंच सकें। खाद देने के तुरंत बाद पौधे में हल्का पानी जरूर डालें। यह पोषण प्रक्रिया आपको शुरुआती तीन महीनों तक लगातार अपनानी है।
फूल आने पर खाद में बदलाव और फोलियर स्प्रे का महत्व
चौथे महीने से पपीते के पौधे में फूल आने की शुरुआत हो जाती है। जैसे ही पौधे पर फूल दिखाई देने लगें, आपको नाइट्रोजन युक्त भारी खाद जैसे वर्मीकंपोस्ट देना तुरंत बंद कर देना चाहिए। इस समय पौधे को पोटैशियम और फास्फोरस की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इसलिए फूलों को झड़ने से बचाने और उन्हें फल में बदलने के लिए पौधे की मिट्टी में दो चम्मच सूखे केले के छिलके का पाउडर डालें। इसके साथ ही पौधे पर सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए सीविड लिक्विड फर्टिलाइजर का फोलियर स्प्रे करें। इस स्प्रे को तैयार करने के लिए 1 लीटर साफ पानी लें और उसमें 5 मिलीलीटर सीविड लिक्विड मिलाएं। इस मिश्रण को एक स्प्रे बोतल में भरकर सुबह या शाम के समय पूरे पौधे की पत्तियों और फूलों पर अच्छी तरह छिड़काव करें। इससे फूलों का गिरना बंद होगा और फल तेजी से बढ़ेंगे।
फूल झड़ने की समस्या और पपीते के पौधे के लिंग का रहस्य
पपीते के बागवानों के सामने अक्सर यह समस्या आती है कि पौधे में फूल तो बहुत आते हैं लेकिन वे फल बनने से पहले ही झड़ जाते हैं। इस समस्या के पीछे पपीते के पौधों की आनुवंशिक संरचना होती है। दरअसल, पपीते के पौधे तीन अलग-अलग प्रकार के होते हैं जिनमें नर, मादा और उभयलिंगी यानी हर्मेफ्रोडाइट शामिल हैं। नर पौधों में केवल नर फूल आते हैं जो परागण के बाद अपने आप झड़ जाते हैं और इनमें कभी फल नहीं लगते। हालांकि, मादा फूलों में फल आने के लिए इन नर फूलों का होना और परागण होना आवश्यक है। यदि आपके घर के आसपास अन्य फूलों के पौधे लगे हैं, तो तितलियां और मधुमक्खियां आसानी से परागण का काम कर देती हैं। वहीं उभयलिंगी पौधों में नर और मादा दोनों हिस्से एक ही फूल में मौजूद होते हैं, जिससे इनमें बिना किसी बाहरी मदद के आसानी से स्व-परागण हो जाता है और बंपर फल लगते हैं। जब आप घर के साधारण पपीते के बीज से पौधा उगाते हैं, तो यह पहचानना नामुमकिन होता है कि पौधा नर निकलेगा या मादा। इसी असुविधा से बचने के लिए हमेशा बाजार से प्रमाणित हाइब्रिड बीज या नर्सरी से ग्राफ्टेड पौधे ही खरीदने की सलाह दी जाती है।
सर्दियों में पौधे का बचाव और कीट नियंत्रण
पपीता मूल रूप से एक उष्णकटिबंधीय पौधा है, इसलिए यह अत्यधिक ठंड और पाले को सहन नहीं कर पाता। सर्दियों का मौसम शुरू होने से ठीक पहले यानी नवंबर के महीने में अपने गमले की मिट्टी में एक बड़ा चम्मच एप्सम सॉल्ट और एक मुट्ठी नीम की खली मिलाकर गुड़ाई कर दें। सर्दियों के दौरान पौधे में पानी तभी डालें जब ऊपर की मिट्टी पूरी तरह सूखी हुई दिखाई दे। कड़ाके की ठंड और ओस से बचाने के लिए गमले के चारों तरफ बांस की चार-पांच खप्पचियां गाड़कर एक छोटा मंडप जैसी संरचना बना लें और उसे पारदर्शी प्लास्टिक से ढक दें। इसके साथ ही गमले की मिट्टी की सतह पर धान का पुआल या सूखी पत्तियां बिछा दें, जिससे जड़ों के आसपास गर्माहट बनी रहे। पपीते के पौधे में अक्सर लीफ कर्ल वायरस का हमला होता है, जिससे पत्तियां मुड़कर सिकुड़ जाती हैं और पौधे का विकास रुक जाता है। इस वायरस और अन्य कीटों से सुरक्षा के लिए हर 15 दिन में एक बार नीम के तेल का स्प्रे करें। इसके अतिरिक्त जैविक नियंत्रण के लिए आप ब्यूवेरिया बेसियाना नामक मित्र कवक के घोल का छिड़काव भी कर सकते हैं, जिससे पौधा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।



















