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पुरानी बाल्टियों और डिब्बों में उगा डाली पूरे परिवार की सब्जियां, पलामू की गृहिणी की छत बनी ऑर्गेनिक फार्मजीवनशैली
1 दिन पहले· 3

पुरानी बाल्टियों और डिब्बों में उगा डाली पूरे परिवार की सब्जियां, पलामू की गृहिणी की छत बनी ऑर्गेनिक फार्म

पलामू के मेदिनीनगर में रहने वाली अनु दुबे ने पुराने डिब्बों, बाल्टियों और कार्टन का इस्तेमाल कर अपनी छत पर ऑर्गेनिक किचन गार्डन तैयार किया है, जहां बैंगन, टमाटर, लौकी और करेला जैसी दर्जनभर सब्जियां बिना किसी रासायनिक खाद के उगाई जा रही हैं।

झारखंड के पलामू जिले में रहने वाली एक गृहिणी ने घर की छत को ही अपना खेत बना डाला है। मेदिनीनगर के हमीदगंज मोहल्ले में रहने वाली अनु दुबे ने पुराने डिब्बों, टूटी बाल्टियों और बेकार कार्टन जैसी कबाड़ की चीजों का इस्तेमाल करके छत पर हरा-भरा किचन गार्डन तैयार किया है। आज उनके घर की ज्यादातर सब्जियां इसी छत से निकलती हैं और वह भी पूरी तरह रसायनमुक्त। शहरों में बढ़ती आबादी और जमीन की कमी के बीच जहां ज्यादातर परिवार खेती से दूर होते जा रहे हैं, वहीं अनु दुबे की यह पहल यह दिखाती है कि थोड़ी सी जगह और मेहनत से भी घर पर ताजा और सेहतमंद सब्जियां उगाई जा सकती हैं।

बचपन का शौक, लॉकडाउन में मिला मौका

अनु दुबे पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर के हमीदगंज इलाके में रहने वाले आनंद दुबे की पत्नी हैं। उनका कहना है कि गार्डनिंग का शौक उन्हें बचपन से ही था, लेकिन घर-गृहस्थी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वह कभी इसके लिए ठीक से समय नहीं निकाल पाईं। कोविड-19 महामारी के दौरान जब लॉकडाउन लगा और घर में रहने के अलावा कोई चारा नहीं था, तब उन्होंने इस पुराने शौक को फिर से जिंदा किया। घर में पड़े बेकार डिब्बे, बाल्टी और कार्टन उठाकर उन्होंने सबसे पहले उनमें फूलों के पौधे लगाए, ताकि पूजा-पाठ के लिए बाजार से फूल खरीदने की जरूरत न पड़े। गुड़हल, गुलदाउदी और कनेर जैसे पौधों से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे बड़ा होता गया और देखते ही देखते पूरी छत एक भरे-पूरे किचन गार्डन में बदल गई।

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छत पर उग रही हैं दर्जनभर सब्जियां

फूलों की खेती में मिली कामयाबी के बाद अनु दुबे का हौसला बढ़ा और उन्होंने सब्जियां उगाने का फैसला किया। आज उनकी छत पर बैंगन, मिर्च, धनिया, टमाटर, पालक और लाल-हरे साग जैसी सब्जियां लहलहा रही हैं। इसके अलावा बेल पर चढ़ने वाली सब्जियां जैसे लौकी, कद्दू, नेनुआ और करेला भी आसानी से उगाई जा रही हैं। वह मौसम के हिसाब से हर बार नई-नई सब्जियां लगाती रहती हैं, जिससे परिवार को साल के बारह महीने ताजी सब्जियां मिलती रहती हैं। इसका सीधा फायदा यह हुआ है कि सब्जी के लिए बाजार पर उनकी निर्भरता काफी हद तक कम हो गई है और घर के खाने में मिलावट या रसायन की चिंता भी खत्म हो गई है।

घर पर बनाती हैं जैविक खाद, नहीं करतीं केमिकल का इस्तेमाल

अनु दुबे अपने किचन गार्डन में किसी भी तरह की रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करतीं। इसके बदले वह गोबर की खाद, सब्जियों के छिलके, चावल की भूसी और अन्य जैविक कचरे से घर पर ही खाद तैयार करती हैं। पौधों के लिए उपजाऊ मिट्टी बनाने के लिए वह साधारण मिट्टी में बालू और यही जैविक खाद मिलाती हैं। पौधों की देखभाल के लिए वह रोजाना सुबह एक से दो घंटे का समय निकालती हैं, जबकि गर्मी के मौसम में सिंचाई और निगरानी के लिए इससे भी ज्यादा वक्त देना पड़ता है क्योंकि तेज धूप में पौधों को ज्यादा पानी और ध्यान की जरूरत होती है।

हर परिवार के लिए एक सीख

अनु दुबे का मानना है कि शहर में रहने वाला कोई भी परिवार अगर थोड़ी सी जगह और लगन दिखाए तो अपनी छत पर ही ऑर्गेनिक सब्जियां उगाकर स्वस्थ जीवन की तरफ बढ़ सकता है। उनका यह रूफटॉप किचन गार्डन अब मोहल्ले में भी चर्चा का विषय बन गया है और कई लोग उनसे सलाह लेने पहुंचते हैं कि कबाड़ की चीजों से इतना खूबसूरत और उपयोगी बगीचा कैसे तैयार किया जाए।

सवाल-जवाब

अनु दुबे कौन हैं और कहां रहती हैं?
अनु दुबे पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर के हमीदगंज इलाके में रहने वाले आनंद दुबे की पत्नी हैं और वहीं अपनी छत पर किचन गार्डन चलाती हैं।
उन्होंने अपना किचन गार्डन किन चीजों से बनाया?
उन्होंने पुराने डिब्बों, बाल्टियों, कार्टन और अन्य कबाड़ के सामान का इस्तेमाल कर पौधे लगाने के गमले तैयार किए।
उनकी छत पर कौन-कौन सी सब्जियां उगती हैं?
उनकी छत पर बैंगन, मिर्च, धनिया, टमाटर, पालक, लाल और हरा साग के साथ लौकी, कद्दू, नेनुआ और करेला जैसी बेल वाली सब्जियां उगती हैं।
वह खाद कैसे तैयार करती हैं?
वह गोबर की खाद, सब्जियों के छिलकों, चावल की भूसी और अन्य जैविक सामग्री से घर पर ही खाद बनाती हैं और किसी रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करतीं।
वह पौधों की देखभाल में रोज कितना समय देती हैं?
वह रोजाना सुबह एक से दो घंटे पौधों की देखभाल करती हैं, जबकि गर्मी के मौसम में सिंचाई और देखरेख के लिए इससे ज्यादा समय देना पड़ता है।
उन्हें गार्डनिंग का शौक कब से है?
उन्हें बचपन से ही गार्डनिंग का शौक था, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वह पहले इसके लिए समय नहीं निकाल पाती थीं और कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान उन्होंने इसे फिर शुरू किया।
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