मध्य प्रदेश में कांग्रेस की युवा इकाई के भीतर संगठनात्मक अनुशासन और पदाधिकारियों की जवाबदेही को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 1 नवंबर को राहुल गांधी के मुख्य आतिथ्य में आयोजित एक बड़े राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल न होने वाले पदाधिकारियों पर संगठन ने अप्रत्याशित कड़ा रुख अपनाया है। इस कार्यक्रम में उपस्थिति दर्ज न करा पाने वाले मध्य प्रदेश यूथ कांग्रेस के लगभग 60 पदाधिकारियों को सीधे तौर पर संगठन से निलंबित कर दिया गया है। इस कड़े फैसले के सार्वजनिक होते ही संगठन के भीतर तीव्र असंतोष की लहर फैल गई है, क्योंकि प्रभावित पदाधिकारियों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना, कारण बताओ नोटिस या व्यक्तिगत सफाई का अवसर दिए बिना ही एकतरफा फैसला सुना दिया गया।
संगठन के इस अनुशासनात्मक कदम से नाराज नेताओं का कहना है कि वे वर्षों से पार्टी की विचारधारा और कार्यक्रमों के लिए जमीनी स्तर पर संघर्ष करते रहे हैं। विभिन्न आंदोलनों के दौरान पुलिस लाठियों और मुकदमों का सामना करने के साथ-साथ कई नेता जेल तक जा चुके हैं। ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं का तर्क है कि गंभीर पारिवारिक संकट और अपरिहार्य परिस्थितियों की अनदेखी करते हुए इस तरह की सामूहिक दंडात्मक कार्रवाई करना जमीनी कार्यकर्ताओं के वर्षों के समर्पण का अनादर है। इस निलंबन के बाद अब कई वरिष्ठ पदाधिकारी राष्ट्रीय नेतृत्व और हाईकमान के समक्ष अपनी गुहार लगाने की तैयारी में जुट गए हैं।
पारिवारिक त्रासदी के बीच सोशल मीडिया से मिली कार्रवाई की खबर
कार्रवाई की जद में आए पदाधिकारियों में मध्य प्रदेश यूथ कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी रोहित राजोरिया भी शामिल हैं, जिन्होंने संगठन के इस फैसले पर गहरी निराशा और क्षोभ व्यक्त किया है। राजोरिया ने बताया कि उन्होंने संगठन के विस्तार और मजबूती के लिए कई वर्षों तक दिन-रात पसीना बहाया है, लेकिन कठिन समय में संगठन ने उनकी व्यक्तिगत मजबूरी को समझने की रत्ती भर भी कोशिश नहीं की। उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि वह 15 अक्टूबर को दिल्ली से अपने गृह क्षेत्र लौटे थे, जिसके ठीक अगले दिन यानी 16 अक्टूबर को उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा जब उनके सगे चाचा का अचानक देहांत हो गया।
चाचा के आकस्मिक निधन के बाद उनका पूरा परिवार गहरे शोक और मानसिक तनाव के दौर से गुजर रहा था। पारिवारिक रीति-रिवाजों और शोक संतप्त परिजनों को संभालने की जिम्मेदारी के चलते वह 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित राहुल गांधी के कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके थे। राजोरिया का गंभीर आरोप है कि इस दौरान संगठन के किसी भी वरिष्ठ पदाधिकारी ने उनसे संपर्क साधने या उनकी अनुपस्थिति की वजह जानने की कोशिश नहीं की। उन्हें अपने खिलाफ हुए इस बड़े फैसले की जानकारी किसी आधिकारिक पत्र या फोन से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से मिली। पारिवारिक शोक के बीच इस प्रकार की अचानक और सार्वजनिक कार्रवाई ने उनकी मानसिक व्यथा को कई गुना बढ़ा दिया।
कारण बताओ नोटिस और प्राकृतिक न्याय की अनदेखी का आरोप
रोहित राजोरिया ने संगठन द्वारा अपनाई गई पूरी अनुशासनात्मक प्रक्रिया की निष्पक्षता और वैधानिकता पर सीधे सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक राजनीतिक दल या संस्था में अनुशासन की कार्रवाई के तय नियम होते हैं। किसी भी सक्रिय सदस्य के खिलाफ कोई कदम उठाने से पहले उसे विधिवत कारण बताओ नोटिस जारी किया जाना अनिवार्य होता है, ताकि वह अपना पक्ष और कारण स्पष्ट कर सके। यदि संबंधित पदाधिकारी संतोषजनक जवाब न दे पाए या बार-बार चेतावनी के बावजूद संगठनात्मक गतिविधियों से जानबूझकर दूर रहे, तब निष्कासन या निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई का औचित्य बनता है।
उन्होंने इस बात पर गहरा आश्चर्य जताया कि बिना किसी नोटिस, बिना जवाब मांगे और बिना किसी आंतरिक जांच के सीधे 60 लोगों को एक ही झटके में निलंबित करने का निर्णय कैसे ले लिया गया। राजोरिया के अनुसार, यह केवल उनके व्यक्तिगत सम्मान का मामला नहीं है, बल्कि उन सभी 60 साथियों के साथ घोर अन्याय है जिन्होंने पार्टी के बैनर तले अपनी जवानी के कई वर्ष समर्पित किए हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि वह इस अन्यायपूर्ण प्रक्रिया के खिलाफ कांग्रेस हाईकमान और यूथ कांग्रेस के शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष पूरे साक्ष्य और अपनी बात मजबूती से रखेंगे।
सोलह साल का लंबा राजनीतिक सफर, दर्जनों मुकदमे और तीन बार जेल
अपने राजनीतिक अतीत और पार्टी के प्रति निष्ठा का ब्यौरा देते हुए रोहित राजोरिया ने साझा किया कि वह वर्ष 2010 से लगातार यूथ कांग्रेस की राजनीति में पूरी सक्रियता से काम कर रहे हैं। इस 16 वर्ष के लंबे सफर में संगठन द्वारा निर्देशित जन आंदोलनों, प्रदर्शनों और राजनीतिक संघर्षों के दौरान उन पर पुलिस प्रशासन द्वारा 12 से 13 आपराधिक और राजनीतिक मुकदमे दर्ज किए गए। पार्टी के संघर्ष के सिलसिले में उन्हें तीन अलग-अलग अवसरों पर सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा।
उन्होंने बताया कि इन आंदोलनों के चलते उन्हें एक मामले में तीन दिन, दूसरे में एक दिन और एक अन्य गंभीर आंदोलन के दौरान करीब 13 दिनों तक जेल की कालकोठरी में रहना पड़ा था। राजोरिया का कहना है कि जिस कार्यकर्ता ने दल के लिए लाठियां खाईं, मुकदमे झेले और जेल की सजा काटी, उसे एक पारिवारिक शोक के कारण कार्यक्रम में न पहुंचने पर सीधे बाहर का रास्ता दिखा देना बेहद पीड़ादायक और दिल तोड़ने वाला अनुभव है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अपनी बात सार्वजनिक रूप से बगावत के तौर पर नहीं, बल्कि संगठन के आंतरिक मंचों और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के समक्ष रखेंगे क्योंकि वे सभी को अपना मानते हैं और उम्मीद करते हैं कि हाईकमान उनके साथ न्याय करेगा ताकि आगे किसी निष्ठावान कार्यकर्ता के साथ ऐसा दोहरा व्यवहार न हो।
निष्ठावान कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान और मंच देने की आवाज
इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद संगठन के भीतर कार्यकर्ताओं के सम्मान और उन्हें मिलने वाले अवसरों को लेकर एक व्यापक बहस छिड़ गई है। यूथ कांग्रेस की सक्रिय महिला नेता नेहा बोरा ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा कि संगठन के भीतर जमीनी कार्यकर्ताओं को उचित मान-सम्मान और शीर्ष नेतृत्व के करीब काम करने के समान अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके जैसे सैकड़ों युवा कार्यकर्ता दिन-रात जमीनी स्तर पर संघर्ष करते हैं और उनकी यह स्वाभाविक आकांक्षा होती है कि उन्हें भी बड़े राजनीतिक मंचों पर स्थान मिले, राहुल गांधी के साथ संवाद करने का अवसर प्राप्त हो और महत्वपूर्ण रणनीतिक कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
नेहा बोरा ने रेखांकित किया कि मध्य प्रदेश में ऐसे कई समर्पित कार्यकर्ता हैं जो पिछले 15 से 16 वर्षों से बिना किसी स्वार्थ के पार्टी का झंडा उठाए हुए हैं, लेकिन उन्हें आज तक केंद्रीय और वरिष्ठ नेतृत्व के साथ सीधे संवाद या उनके करीब रहकर कार्य करने का उचित अवसर नहीं मिल सका है। उन्होंने कहा कि यह केवल उनकी अकेले की पीड़ा नहीं है, बल्कि संगठन के एक बड़े समर्पित वर्ग की सामूहिक भावना है। उनका मानना है कि जो लोग डेढ़ दशक से संगठन की रीढ़ बने हुए हैं, उन्हें शीर्ष नेतृत्व से जोड़ने के लिए एक पारदर्शी और सम्मानजनक प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।
संगठनात्मक चुनाव प्रणाली बनाम मनोनयन पर भी हुई चर्चा
विवाद के बीच यूथ कांग्रेस में संगठनात्मक नियुक्तियों, आंतरिक चुनाव प्रणाली और परिवारवाद को लेकर भी चर्चाएं हुईं। इस विषय पर रोहित राजोरिया ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यूथ कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष का चयन सीधे मनोनयन के आधार पर नहीं, बल्कि बाकायदा चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से संपन्न हुआ है। इस प्रक्रिया में सघन सदस्यता अभियान चलाया गया था और वोटिंग के आधार पर ही नेताओं का फैसला हुआ। उन्होंने कहा कि जिस नेता ने सबसे ज्यादा सदस्यों को जोड़ा और अपने पक्ष में व्यापक समर्थन जुटाया, उसे चुनावी प्रक्रिया का स्वाभाविक लाभ मिला।
फिलहाल 1 नवंबर के दिल्ली कार्यक्रम में शामिल न होने पर करीब 60 पदाधिकारियों के निलंबन ने मध्य प्रदेश यूथ कांग्रेस के भीतर हलचल तेज कर दी है। जमीनी नेताओं के इस मुखर विरोध और हाईकमान का दरवाजा खटखटाने के ऐलान के बाद अब निगाहें राष्ट्रीय नेतृत्व पर टिकी हैं कि क्या वह इस सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की समीक्षा कर पदाधिकारियों को राहत देता है या फिर यह अंदरूनी खींचतान आने वाले दिनों में और विकराल रूप लेगी।



















