दीपावली की आहट के साथ ही बाजारों में त्योहार की हलचल तेज हो चुकी है, और इसी माहौल के बीच बालोद जिले के ग्रामीण अंचल की महिलाएं अपनी मेहनत से आत्मनिर्भरता की अनूठी कहानी लिख रही हैं। चाहत बिहान स्व-सहायता समूह से जुड़ी ग्रामीण महिलाएं इस त्योहारी सीजन को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक मजबूती का जरिया बना रही हैं। अपने हाथों से तैयार किए गए मिट्टी के पारंपरिक दीयों, गाय के गोबर से बने इको-फ्रेंडली दीयों और घर पर बनी विशेष मोमबत्तियों के जरिए इन महिलाओं ने रोशनी के पर्व को एक नया आयाम दिया है। इन उत्पादों को और भी लुभावना बनाने के लिए महिलाओं ने उन्हें चटख और सुंदर रंगों से सजाया है, जिससे बाजार में इनकी मांग लगातार बढ़ रही है।
नवरात्रि से ही शुरू हो गया था निर्माण कार्य
त्योहारी सीजन में मांग को पूरा करने के लिए समूह से जुड़ी महिलाओं ने काफी पहले ही अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। समूह की सक्रिय सदस्य रवीना साहू ने जानकारी दी कि दीयों के निर्माण की रूपरेखा और काम नवरात्रि के समय से ही आरंभ कर दिया गया था। इस पूरे उपक्रम में लगभग 30 महिलाएं एक साथ मिलकर काम कर रही हैं। वे मिट्टी को गूंधने, दीयों को आकार देने, गोबर से पर्यावरण-अनुकूल दीये तैयार करने और घर में मोमबत्तियां ढालने के काम में जुटी हुई हैं। यह कोई पहला अवसर नहीं है, बल्कि यह दल पिछले तीन वर्षों से लगातार हर दीवाली पर यह काम कर रहा है। हर वर्ष जैसे ही त्योहार नजदीक आता है, इन हस्तनिर्मित सामग्रियों की मांग तेजी से बढ़ने लगती है, जो इन ग्रामीण महिलाओं को घर के कामकाज के साथ एक बेहतर अतिरिक्त आमदनी जुटाने का मजबूत अवसर देती है।
किफायती दाम और पर्यावरण संरक्षण का तालमेल
समूह ने अपने उत्पादों का मूल्य निर्धारण करते समय सामान्य परिवारों के बजट का विशेष ध्यान रखा है, ताकि हर तबके का खरीदार आसानी से इन्हें अपना सके। बिक्री मूल्य के अनुसार मिट्टी से बने 5 खूबसूरत दीयों का सेट 50 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है। वहीं गाय के गोबर से तैयार किए गए 4 सजे-धजे दीयों की कीमत भी 50 रुपये रखी गई है। इसके अलावा महिलाओं द्वारा तैयार की गई आकर्षक होममेड कैंडल्स और मोमबत्तियों की श्रृंखला 100 रुपये से लेकर 120 रुपये के दायरे में बेची जा रही है। गोबर के दीयों को खास तौर पर विविध रंगों से सजाया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को रासायनिक और प्लास्टिक कचरे से दूर कर पारंपरिक और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की ओर प्रेरित करना है।
कलेक्ट्रेट और सरकारी परिसरों तक सीधी बिक्री
अपने उत्पादों की बिक्री के लिए यह महिला समूह केवल सामान्य स्थानीय दुकानों या फुटपाथ बाजार पर आश्रित नहीं है। बाजार की पहुंच बढ़ाने के लिए महिलाओं ने एक सुविचारित रणनीति अपनाई है। वे बालोद के सामान्य बाजार के साथ-साथ कलेक्ट्रेट परिसर, जिला कार्यालय, तहसील कार्यालय और जनपद पंचायत कार्यालय जैसे प्रमुख प्रशासनिक भवनों में भी स्टॉल लगाकर सीधी बिक्री कर रही हैं। सरकारी दफ्तरों में आने-जाने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और आम नागरिकों तक सीधे पहुंचने से बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है। इससे महिलाओं को अपनी बनाई वस्तुओं का पूरा मूल्य मिल रहा है और उनके काम को जिले भर में एक नई पहचान भी हासिल हो रही है।
त्योहारी सीजन में 40 हजार रुपये तक की अतिरिक्त कमाई
दीपावली के इस छोटे से कारोबारी सीजन में समूह की मेहनत बड़े वित्तीय लाभ में बदलती है। रवीना साहू के अनुसार, त्योहार के कुछ ही दिनों के भीतर समूह को लगभग 40 हजार रुपये तक की अतिरिक्त शुद्ध आय हो जाती है। यह आमदनी ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक तौर पर सशक्त और अपने पैरों पर खड़े होने में बड़ा संबल प्रदान कर रही है। स्थानीय स्तर पर सुलभ संसाधनों, गाय के गोबर और पारंपरिक मिट्टी की बदौलत महिलाएं ऐसे उत्पाद बना रही हैं, जो न सिर्फ बाजार की मांग पूरी करते हैं बल्कि पर्यावरण को भी सुरक्षित रखते हैं। इस प्रकार चाहत बिहान समूह की महिलाएं दीवाली पर केवल दूसरों के घरों को रोशन करने का साधन नहीं दे रहीं, बल्कि अपने परिवारों के जीवन में भी आर्थिक आत्मनिर्भरता का नया उजाला फैला रही हैं।

















