मध्य प्रदेश में धान की रोपाई का काम समाप्त होने के बाद किसान अब फसल की देखरेख और पोषक तत्वों के प्रबंधन में जुट गए हैं। इस समय धान के पौधों को सही समय पर और उचित मात्रा में पोषण देना एक बड़ी चुनौती होती है। कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि रासायनिक खादों, विशेष रूप से यूरिया का इस्तेमाल वैज्ञानिक और संतुलित तरीके से न किया जाए, तो इसका सीधा असर धान की पैदावार और गुणवत्ता पर पड़ता है। कई बार किसान ज्यादा पैदावार हासिल करने की चाहत में खेतों में जरूरत से ज्यादा यूरिया डाल देते हैं, जिससे फसल को फायदा होने के बजाय गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन और यूरिया का सही छिड़काव
हर्दी के एक प्रगतिशील किसान चंद्रभूषण पांडेय का कहना है कि धान की बंपर पैदावार प्राप्त करने का सबसे महत्वपूर्ण मंत्र संतुलित खाद प्रबंधन ही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फसल के लिए नाइट्रोजन यानी यूरिया की सही खुराक और उसका सही समय तय करना बेहद जरूरी होता है। अक्सर देखा जाता है कि किसान पानी से लबालब भरे खेतों में ही यूरिया का छिड़काव कर देते हैं। ऐसा करने से खाद का एक बहुत बड़ा हिस्सा पानी के साथ बहकर बर्बाद हो जाता है या फिर रिसकर मिट्टी की इतनी गहराई में चला जाता है जहां पौधों की जड़ें पहुंच ही नहीं पातीं। इसके परिणामस्वरूप, कीमती खाद डालने के बाद भी पौधों को उसका पूरा पोषण नहीं मिल पाता और निवेश बेकार चला जाता है।
यूरिया के इस्तेमाल से पहले इन बातों का रखें विशेष ध्यान
चंद्रभूषण पांडेय के अनुसार, यूरिया की पूरी मात्रा को कभी भी एक ही बार में खेत में नहीं डालना चाहिए। इसके बजाय, यूरिया को तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटकर देना सबसे अधिक वैज्ञानिक और लाभकारी तरीका माना जाता है। खाद के इस विभाजन से पौधों को उनकी जरूरत के अनुसार समय-समय पर पोषण मिलता रहता है। पहली खुराक धान की रोपाई के तुरंत बाद दी जानी चाहिए। दूसरी खुराक तब दी जाती है जब पौधे में कल्ले फूटने यानी टिलरिंग की अवस्था होती है, और तीसरी खुराक बालियां बनने की शुरुआती अवस्था में देना आवश्यक होता है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि खेत में खाद डालने से पहले वहां जमा अतिरिक्त पानी को बाहर निकाल देना चाहिए। जब खेत में केवल हल्की नमी बची हो, तभी यूरिया का छिड़काव करना चाहिए। इससे यूरिया सीधे पौधों की जड़ों के संपर्क में आता है, जिससे फसल मजबूत होती है और उसमें बीमारियों तथा कीटों का प्रकोप भी काफी कम हो जाता है।
कृषि सलाहकार के अनुसार खाद की पहली खुराक का गणित
कृषि सलाहकार अवनीश पटेल ने इस विषय पर तकनीकी जानकारी साझा की है। उनके अनुसार, धान की रोपाई के समय या उसके बाद 7 से 10 दिनों के भीतर नाइट्रोजन की पहली खुराक पौधों को दी जानी चाहिए। इस शुरुआती चरण में यूरिया की कुल निर्धारित मात्रा का केवल 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा ही इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ ही, फास्फोरस और पोटाश की पूरी खुराक भी इसी समय खेत में डाल देनी चाहिए। ऐसा करने से धान के पौधों की जड़ों का विकास बहुत तेजी से होता है और पौधे को शुरुआती अवस्था से ही पर्याप्त मजबूती और पोषण मिलने लगता है।
दूसरी और तीसरी खुराक देने का सही समय
अवनीश पटेल ने आगे बताया कि यूरिया की दूसरी खुराक रोपाई के लगभग 20 से 25 दिनों के बाद दी जानी चाहिए, क्योंकि यह वह समय होता है जब पौधे में कल्ले निकलने शुरू होते हैं। इसके बाद, तीसरी और अंतिम खुराक रोपाई के 40 से 45 दिनों के बाद दी जानी चाहिए। यह वह अवधि होती है जब पौधे के तने के भीतर बालियां बनने की प्रक्रिया शुरू हो रही होती है। इस समय यूरिया देने से न केवल कल्लों की संख्या में भारी वृद्धि होती है, बल्कि बालियां भी लंबी और घनी बनती हैं, जिससे दानों का भराव बेहद शानदार और ठोस होता है।
अमोनिया गैस के नुकसान से बचाव और आधुनिक तकनीक
वैज्ञानिक तौर पर यूरिया के छिड़काव के समय का भी बहुत महत्व है। अवनीश पटेल के मुताबिक, किसानों को यूरिया का छिड़काव हमेशा शाम के समय ही करना चाहिए। तेज धूप के समय यूरिया डालने से रासायनिक प्रतिक्रिया के कारण अमोनिया गैस बनती है, जिससे नाइट्रोजन उड़कर हवा में विलीन हो जाती है और खाद बेकार हो जाती है। इसके अलावा, किसानों को साधारण यूरिया के स्थान पर नीम लेपित यूरिया का उपयोग करना चाहिए। नीम कोटेड यूरिया पानी में धीरे-धीरे घुलता है, जिससे पौधों को लंबे समय तक लगातार पोषण मिलता रहता है। इसके साथ ही, किसान लीफ कलर चार्ट यानी LCC तकनीक का उपयोग भी कर सकते हैं। इस चार्ट की मदद से धान की पत्तियों के रंग को देखकर यह सटीक अंदाजा लगाया जा सकता है कि फसल को यूरिया की जरूरत है या नहीं। इससे न केवल खाद की भारी बचत होती है, बल्कि मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनी रहती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचता है।



















