पुणे ग्रामीण पुलिस ने पुणे-सतारा हाईवे पर शिंदेवाड़ी इलाके में हुई एक चौंकाने वाली हत्या के पीछे की पूरी कहानी सुलझा ली है। जांच में सामने आया कि यह वारदात किसी ताजा झगड़े का नतीजा नहीं बल्कि दो दशक से भी पुरानी रंजिश का नतीजा थी। पुलिस ने इस सिलसिले में मुख्य साजिशकर्ता समेत चार लोगों को हिरासत में लिया है।
पुरानी कटराज सुरंग के पास वारदात
11 जुलाई को शिंदेवाड़ी इलाके में 40 वर्षीय संजय बाबूराव कडू-देशमुख की धारदार हथियार से बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। संजय मूल रूप से वेल्हे तालुका के कुरन गांव के रहने वाले थे, लेकिन फिलहाल मुंधवा में रह रहे थे। घटना पुरानी कटराज सुरंग के आसपास हुई, जिसके बाद राजगढ़ पुलिस स्टेशन में हत्या का केस दर्ज कर जांच शुरू हुई।
पूछताछ में खुला 23 साल पुराने बदले का राज
पुणे ग्रामीण पुलिस की स्थानीय अपराध शाखा और राजगढ़ थाने की टीम ने मिलकर जांच आगे बढ़ाई। शुरुआती जांच में दो युवकों, मंथन वैद्य और सौरभ परदेशी पर शक गहराया और दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू हुई। सख्ती से सवाल-जवाब के दौरान मुख्य आरोपी मंथन दिनेश वैद्य टूट गया और उसने जुर्म कबूल कर लिया। उसने पुलिस को बताया कि जब वह सिर्फ छह महीने का था, तभी संजय देशमुख ने उसके पिता की जान ले ली थी। तभी से उसके मन में बदले की आग सुलग रही थी, जिसे उसने आखिरकार साथियों की मदद से साजिश रचकर अंजाम दे दिया।
चार आरोपी गिरफ्तार, हथियार बरामद
पुलिस ने इस मामले में जिन चार लोगों को गिरफ्तार किया है उनमें मुख्य आरोपी मंथन दिनेश वैद्य के अलावा सौरभ सागर परदेशी, मिजान गौसुद्दीन शेख और संदीप बाबूलाल कोरी शामिल हैं। आरोपियों के कब्जे से एक देसी पिस्तौल और तीन जिंदा कारतूस भी बरामद किए गए हैं। पुलिस अब हथियार की खरीद-फरोख्त की कड़ी खंगालने के साथ ही आगे की कानूनी कार्रवाई में जुटी है।
वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रमोद क्षीरसागर ने सोमवार को इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए बताया कि मंथन वैद्य और सौरभ परदेशी को 14 जुलाई को हिरासत में लिया गया था।
पूछताछ में दोनों ने कबूल किया कि उन्होंने मिजान शेख और संदीप कोरी की मदद से संजय बाबूराव कडू-देशमुख की हत्या को अंजाम दिया।
2003 की वह घटना, जिसने बदल दी मंथन की जिंदगी
पुलिस के मुताबिक इस हत्याकांड की जड़ें साल 2003 में दबी थीं। उस दौर में एक मामूली विवाद के बाद कडू-देशमुख ने मंथन के पिता दिनेश वैद्य की हत्या कर दी थी। उस वक्त मंथन की उम्र सिर्फ छह महीने थी, यानी उसने अपने पिता को खोते हुए देखा भी नहीं। यही घटना आगे चलकर उसके मन में जिस बदले की चिंगारी को जन्म देती है, वह 23 साल बाद एक हिंसक वारदात के रूप में सामने आती है।
हत्या के वक्त जमानत पर था कडू-देशमुख
सहायक पुलिस निरीक्षक चेतन माचले ने बताया कि मंथन वर्षों से अपने पिता की मौत का बदला लेने की भावना दिल में दबाए हुए था और आखिरकार उसने बाकी आरोपियों के साथ मिलकर पूरी साजिश रच डाली। उन्होंने यह भी बताया कि जिस समय कडू-देशमुख की हत्या हुई, वह उस वक्त एक अलग आपराधिक मामले में जमानत पर बाहर थे। पुलिस अब इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या इस साजिश में और लोग भी शामिल थे।




















