महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की दुर्गापुर पुलिस ने प्रसिद्ध और नामी विश्वविद्यालयों की बोगस डिग्रियां और मार्कशीट तैयार कर लाखों रुपये ऐंठने वाले एक बड़े रैकेट का भंडाफोड़ किया है। पुलिस की विशेष टीम ने कार्रवाई करते हुए इस फर्जीवाड़ा गिरोह के मुख्य सरगना परिमल बाबूराव गौरकर और उसके प्रमुख सहयोगी अक्षय खोब्रागडे को नागपुर स्थित एक होटल से धर दबोचा। इस सनसनीखेज मामले में अब तक गिरफ्तार किए गए आरोपियों की कुल संख्या बढ़कर तीन हो गई है। पुलिस फिलहाल पकड़े गए दोनों आरोपियों से सघन पूछताछ कर रही है ताकि इस अवैध नेटवर्क से जुड़े अन्य दलालों और फर्जी दस्तावेज खरीदने वालों का पता लगाया जा सके।
नागपुर के होटल से पकड़े गए मुख्य आरोपी
पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे फर्जीवाड़ा मामले का सूत्रपात दो दिन पहले हुआ था जब पुलिस ने गिरोह के एक अन्य सदस्य और कथित एजेंट वैभव सोनुले को गिरफ्तार किया था। वैभव सोनुले से पुलिस कस्टडी के दौरान हुई कड़ी पूछताछ में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए, जिसके आधार पर मुख्य सरगना परिमल बाबूराव गौरकर और उसके साथी अक्षय खोब्रागडे की नागपुर में मौजूदगी का पता चला। दुर्गापुर पुलिस ने तुरंत नागपुर के संबंधित होटल में दबिश देकर दोनों को हिरासत में ले लिया। इस बीच, पहले गिरफ्तार किए गए एजेंट वैभव सोनुले की पुलिस रिमांड शुक्रवार को समाप्त हो गई, जिसके बाद उसे स्थानीय अदालत में पेश किया गया। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए वैभव सोनुले को न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दे दिया है।
5 से 10 लाख रुपये में फर्जी डिग्रियों का सौदा
जांच अधिकारियों ने इस गिरोह के काम करने के तरीके का खुलासा करते हुए बताया कि नेटवर्क के एजेंट संभावित ग्राहकों की तलाश करते थे। नौकरी की तलाश कर रहे या शैक्षणिक दाखिला पाने की होड़ में लगे लोगों को निशाना बनाकर उन्हें मुख्य आरोपी परिमल गौरकर तक पहुंचाया जाता था। ग्राहक की जरूरत और मांग के अनुसार, नागपुर विश्वविद्यालय, अमरावती विश्वविद्यालय और गोंडवाना विश्वविद्यालय जैसे महाराष्ट्र के प्रमुख संस्थानों के अलावा कर्नाटक, राजस्थान तथा देश के अन्य राज्यों के नामी विश्वविद्यालयों के नाम से जाली डिग्रियां, मार्कशीट और शैक्षणिक प्रमाण पत्र तैयार किए जाते थे। इन नकली और अवैध दस्तावेजों को उपलब्ध कराने के एवज में गिरोह के सदस्य प्रत्येक ग्राहक से 5 से 10 लाख रुपये तक की भारी-भरकम राशि वसूलते थे।
नौकरी, दाखिले और पदोन्नति में इस्तेमाल का अंदेशा
चंद्रपुर पुलिस को गंभीर आशंका है कि इस गिरोह से खरीदी गई बोगस डिग्रियों और मार्कशीट का इस्तेमाल कई लोगों द्वारा विभिन्न संस्थानों में नौकरियां हासिल करने, उच्च शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला लेने और सरकारी या निजी क्षेत्रों में पदोन्नति पाने के लिए किया जा चुका है। अब पुलिस जांच का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय बिंदु यही है कि आखिर इस विशाल नेटवर्क से किन-किन लोगों ने फर्जी दस्तावेज खरीदे हैं। पुलिस प्रशासन उन तमाम संस्थानों और विभागों की सूची तैयार करने में जुटा है जहां इन बोगस प्रमाणपत्रों को जमा कर अनुचित लाभ उठाया गया हो सकता है।
दलालों के तंत्र और अन्य राज्यों तक जांच का दायरा
मास्टरमाइंड परिमल बाबूराव गौरकर की गिरफ्तारी के बाद पुलिस उससे सिलसिलेवार पूछताछ कर रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश में हैं कि नकली डिग्रियों और मार्कशीट की छपाई कहां की जाती थी और इसके लिए किन तकनीकी साधनों या प्रिंटिंग प्रेसों का इस्तेमाल होता था। इसके साथ ही, गिरोह से जुड़े अन्य दलालों, बिचौलियों, खरीदारों और अन्य मददगारों के नेटवर्क को खंगाला जा रहा है। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि जैसे-जैसे जांच का दायरा बढ़ेगा और आरोपियों से राज उगलवाए जाएंगे, इस शैक्षणिक फर्जीवाड़े में शामिल कई अन्य बड़े चेहरे बेनकाब होंगे। जांच टीम इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि इस बोगस शैक्षणिक रैकेट के तार महाराष्ट्र के बाहर किन-किन राज्यों और शहरों तक फैले हुए हैं।





















