कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की ओर से धर्मग्रंथ मनुस्मृति को लेकर दी गई विवादित टिप्पणी पर धार्मिक संतों का आक्रोश तेजी से बढ़ रहा है। महाराष्ट्र के पुणे शहर में आयोजित एक छात्र संवाद कार्यक्रम के दौरान मनुस्मृति पर की गई आलोचना के बाद अब साधु-संतों ने राजनीतिक मोर्चे पर कड़ा रुख अपना लिया है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गुरुवार को इस बयान पर गहरी आपत्ति जताते हुए स्पष्ट किया कि सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथों का लगातार अपमान किसी भी सूरत में सहन नहीं किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि कांग्रेस नेता अपने इस वक्तव्य के लिए सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना नहीं करते हैं, तो हिंदू समाज को एकजुट कर कांग्रेस पार्टी के पूर्ण बहिष्कार की मुहीम चलाई जाएगी।
धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या और क्षमा की स्पष्ट मांग
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने राहुल गांधी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नेताओं को अपने राजनीतिक लाभ और हानि के दृष्टिकोण से धार्मिक शास्त्रों का आंकलन या व्याख्या नहीं करनी चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि यदि किसी जनप्रतिनिधि या व्यक्ति को किसी शास्त्र की बातों पर कोई संदेह अथवा आपत्ति है, तो उसे पहले विद्वान धर्माचार्यों के पास जाना चाहिए। वहां शास्त्रों का सही और प्रामाणिक अर्थ समझने के पश्चात ही कोई बात सार्वजनिक मंच पर रखनी चाहिए। शंकराचार्य ने कड़े शब्दों में कहा, "राहुल गांधी बार-बार हमारे धर्म ग्रंथ का अपमान कर रहे हैं जो कि बहुत गलत बात है।"
उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस, अथवा देश या विदेश का कोई भी व्यक्ति, किसी को भी सनातन धर्मग्रंथों का अनादर करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि पवित्र शास्त्र करोड़ों लोगों की आस्था, श्रद्धा और आदर के केंद्र हैं। जो लोग धर्म की मूल भावना और सिद्धांतों से जुड़े नहीं हैं, वे उसकी व्याख्या करने के योग्य नहीं हो सकते। शंकराचार्य ने दो टूक शब्दों में चेतावनी जारी की कि यदि राहुल गांधी इस मामले में अपनी गलती स्वीकार कर माफी नहीं मांगते हैं, तो संतों का समाज आम हिंदू मतदाताओं से कांग्रेस पार्टी के खिलाफ मतदान करने और उसका संपूर्ण बहिष्कार करने की अपील करेगा।
मनुस्मृति की प्रासंगिकता और महिला सुरक्षा का विषय
कार्यक्रम के दौरान उठाए गए नारी स्वतंत्रता के मुद्दों पर बात करते हुए शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने व्यावहारिक सुरक्षा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि केवल स्वतंत्रता की बातें करना वास्तविक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं है जब तक कि सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था न हो। उन्होंने उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि किसी नवजात शिशु को उसका पिता बिना संरक्षण के अकेला कैसे छोड़ सकता है। इसी तरह यदि कोई विवाहित महिला किसी कठिन परिस्थिति या विपत्ति में फंसती है, तो क्या उसका पति उसे अपनी रक्षा स्वयं करने की बात कहकर असहाय छोड़ देगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन में सबसे पहला और प्राथमिक प्रश्न सुरक्षा का होता है।
मनुस्मृति के संदर्भ को स्पष्ट करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि यदि महर्षि मनु ने समाज व्यवस्था में पुत्र को वृद्धावस्था में अपनी माता की देखभाल और रक्षा करने का निर्देश दिया है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। उन्होंने कहा कि बेटे द्वारा मां के भरण-पोषण और सुरक्षा का दायित्व निभाना एक पवित्र सामाजिक और पारिवारिक कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त, राजनीतिक बयानों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि विपक्षी दल लंबे समय से यह सवाल उठाते रहे हैं कि रक्षाबंधन के पावन पर्व पर राहुल गांधी को अपनी बहन से राखी बंधवाकर रक्षा का वचन निभाते हुए क्यों नहीं देखा जाता। उनका तर्क था कि पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने में सुरक्षा की भावना अत्यंत आवश्यक है।
पुणे संवाद का संदर्भ और व्यापक राजनीतिक घमासान
यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब राहुल गांधी ने पुणे में आयोजित 'छात्रों की गूंज' नामक संवाद कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। इस आयोजन में केवल छात्राएं शामिल हुई थीं, जहां राहुल गांधी ने मनुस्मृति की तीखी आलोचना की थी। इस बयान के सार्वजनिक होते ही राजनीतिक और धार्मिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राहुल गांधी पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि छात्राओं से संवाद करने वाले कांग्रेस नेता की कथनी और करनी में कोई मेल दिखाई नहीं देता है।
वहीं दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रायबरेली में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी की टिप्पणियों की कड़ी निंदा की। सीएम योगी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की प्राचीन परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और जीवन मूल्यों को लगातार कोसना या उन पर सवाल उठाना पूरी तरह से अनुचित है। धार्मिक गुरुओं और वरिष्ठ नेताओं के इन हमलों से साफ है कि मनुस्मृति पर दिया गया बयान अब कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक संकट बनता जा रहा है।
























