फ्रेंच डोर्स और बड़ी क्षमता: क्या मीडिया फ्लेक्सिफाई प्रो एयर फ्रायर आपकी रसोई के लिए सही विकल्प है?मांग के दबाव से बढ़ी महंगाई बनी अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती, फेडरल रिजर्व अधिकारी ऑस्टिन गुल्सबी ने चेतायायूरोपीय अर्थव्यवस्था में तेजी के बीच महंगाई की चुनौती पर मार्टिन कोचर की चेतावनीफरीदाबाद के शिव एन्क्लेव में मां ने 2 साल के मासूम की गर्दन पर चलाया पेपर कटर, पुलिस ने भेजा जेलशास्त्री नगर में 44 लाख की लूट का पर्दाफाश, कारोबारी के बेटे ने ही रची थी साजिशबिहार के मधुबनी में सिंघाड़े के पत्तों से बनता है खास काढ़ा, मौसमी सर्दी और बुखार से मिलेगी राहतकार में अलॉय व्हील लगवाने से पहले समझें इसके फायदे और नुकसान, क्या स्टील व्हील से बेहतर है यह ऑप्शनअनुच्छेद 370 पर नेशनल कॉन्फ्रेंस से मतभेद के बाद सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने दिया इस्तीफे का ऐलानराजस्थान में शहरी स्थानीय निकायों की जंग के लिए बीजेपी और कांग्रेस की बिसात, टिकट मंथन के बीच उभरी बगावतलॉर्ड्स टेस्ट में इतिहास: रिकी पोंटिंग को पीछे छोड़ होम ग्राउंड पर टेस्ट क्रिकेट के सबसे सफल बल्लेबाज बने जो रूट
तिब्बत सीमा पर नई झील बनने से नेपाल में थमा रेस्क्यू: 580 मौतों के बीच बालेन शाह सरकार ने क्यों ठुकराई विदेशी मदद?एशिया
28 अग॰ 2026, 11:19 pm (1 घंटे पहले)· 2

तिब्बत सीमा पर नई झील बनने से नेपाल में थमा रेस्क्यू: 580 मौतों के बीच बालेन शाह सरकार ने क्यों ठुकराई विदेशी मदद?

नेपाल में आई भीषण आपदा में अब तक 580 लोगों की मौत हो चुकी है और 1000 से अधिक लापता हैं। तिब्बत सीमा पर मलबे से नई कृत्रिम झील बनने और चीन में आए भूकंप के खतरे के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन रोककर निचले इलाकों से लोगों को निकाला जा रहा है।

नेपाल में प्राकृतिक आपदा के बाद तबाही का मंजर लगातार गंभीर रूप धारण करता जा रहा है। पहाड़ी इलाकों में हुए भीषण भूस्खलन और बाढ़ की चपेट में आने से आधिकारिक तौर पर अब तक 580 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 1000 से अधिक लोग अभी भी बेअता-पता हैं। नेपाली सेना और सशस्त्र प्रहरी बल द्वारा चलाए जा रहे व्यापक राहत और बचाव अभियान को फिलहाल अस्थायी रूप से रोक दिया गया है। रसुवा और नुवाकोट जिलों पर दोबारा भीषण तबाही का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि तिब्बत सीमा पर मलबे के कारण एक विशाल कृत्रिम झील का निर्माण हो गया है। प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता अब बचाव कार्य के बजाय निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना बन गई है, जिससे किसी भी संभावित हादसे में जानमाल के नुकसान को कम किया जा सके।

आपदा की मुख्य जड़ तिब्बत के उस पर्वतीय इलाके में है जहां दो दिन पहले यानी 26 अगस्त 2026 को एक बड़ा ग्लेशियर टूट गया था। इस ग्लेशियर के फटने के बाद गिरोंग क्षेत्र में बनी एक प्राकृतिक झील अचानक फूट गई, जिससे बहे मलबे ने नेपाल के दोभान इलाके में नदियों के स्वाभाविक बहाव को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया। यह रुकावट छोचेन और पुरेपु सांगपो नदी के संगम स्थल के समीप उत्पन्न हुई है। चट्टानों, मिट्टी और उखड़े पेड़ों के हजारों टन मलबे के एकत्रित हो जाने से नदियों के मुहाने पर पानी का दबाव तेजी से बढ़ रहा है और एक विशाल कृत्रिम जलाशय आकार ले चुका है। यदि यह मलबे का बांध टूटता है, तो निचले इलाकों में विनाशकारी फ्लैश फ्लड आने की पूरी आशंका है।

ये भी पढ़ें

सिचुआन में आए भूकंप ने बढ़ाई दोभान झील टूटने की आशंका

भौगोलिक दृष्टि से दोभान स्थित यह कृत्रिम झील गिरोंग से लगभग 6 किलोमीटर नीचे की ओर नदी के प्राकृतिक बहाव मार्ग (डाउनस्ट्रीम) पर बनी है। चिंता की बात यह है कि इस संवेदनशील क्षेत्र में मौसम के साथ-साथ भूगर्भीय हलचलें भी तेज हो गई हैं। शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 को पड़ोसी देश चीन के सिचुआन प्रांत में भूकंप का तेज झटका महसूस किया गया, जिसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 5.1 मापी गई। इससे ठीक दो दिन पहले 26 अगस्त को भी इसी क्षेत्र में 5.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था। संपूर्ण हिमालयी बेल्ट पहले से ही अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र में आता है। लगातार आ रहे इन झटकों के कारण दोभान में बने अस्थायी मलबे के बांध के ढहने की संभावना काफी बढ़ गई है, जिसे देखते हुए नेपाली प्राधिकारियों ने रेस्क्यू टीमों को पीछे हटने और निकासी कार्य पर ध्यान केंद्रित करने के निर्देश दिए हैं।

नदियों के तटीय इलाकों में खाली कराए जा रहे गांव

नेपाली सेना के आधिकारिक प्रवक्ता के अनुसार, वर्तमान में कृत्रिम झील में जलस्तर अभी अत्यधिक खतरे के निशान तक नहीं पहुंचा है, लेकिन 26 अगस्त की भयानक तबाही से सबक लेते हुए प्रशासन कोई भी जोखिम उठाने के मूड में नहीं है। एहतियात के तौर पर भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी नदी के तटीय क्षेत्रों में स्थित कई गांवों को तत्काल खाली कराने का काम शुरू कर दिया गया है। सेना के जवान लाउडस्पीकर के माध्यम से लगातार घोषणाएं कर रहे हैं और नागरिकों से अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर जाने की अपील कर रहे हैं। पिछली आपदा का भयंकर रूप देख चुके स्थानीय निवासी भी बिना किसी देरी के शांतिपूर्वक स्थान छोड़ रहे हैं। उधर, चीनी अधिकारियों ने भी तिब्बत सीमा क्षेत्र में जारी राहत कार्यों को रोकते हुए लेवल-4 का अलर्ट जारी किया है और लोगों को नदी तटों से कम से कम 1 किलोमीटर दूर रहने की हिदायत दी है। दोनों देशों के प्रशासनिक तंत्र स्थिति पर निरंतर संपर्क बनाए हुए हैं।

कैलाश मानसरोवर यात्री और भारतीय मजदूर समेत 300 से अधिक भारतीय लापता

नेपाल में आई इस भीषण आपदा का असर भारतीय परिवारों पर भी बेहद गहराई से पड़ा है। अब तक मिली जानकारी के मुताबिक 300 से ज्यादा भारतीय नागरिक इस तबाही के बाद से लापता हैं। इनमें एक बड़ी संख्या उन तीर्थयात्रियों की है जो कैलाश मानसरोवर की पवित्र यात्रा पर निकले थे। इसके अतिरिक्त, नेपाल की विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले कई भारतीय मजदूर भी आपदा के बाद से संपर्क से बाहर हैं। चूंकि नेपाल की सीमा बिहार राज्य से सटी हुई है, इसलिए मोतिहारी और आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में लोग वहां मजदूरी करने जाते हैं। मोतिहारी के निवासी सुकुल सहनी अपने लापता रिश्तेदार की तलाश में पिछले तीन दिनों से आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भटक रहे हैं। प्रशासनिक बदहाली और सूचना के अभाव के कारण परिजनों में भारी निराशा और चिंता का माहौल है। पहाड़ी दुर्गम रास्तों और मलबे के कारण राहत टीमों को दूरदराज के हिस्सों तक पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

त्रिशूली में सबसे भीषण तबाही और सेना का मुख्य बेस केंद्र

बाढ़ और भूस्खलन का सबसे घातक प्रहार त्रिशूली नदी घाटी के आसपास के इलाकों पर हुआ है। आपदा में जान गंवाने वाले 580 लोगों में से सर्वाधिक मौतें इसी क्षेत्र से दर्ज की गई हैं। तबाही की विभीषिका को देखते हुए नेपाल सरकार ने अपनी थलसेना को मुख्य रूप से त्रिशूली क्षेत्र में ही केंद्रित रहने के निर्देश दिए हैं। सेना ने यहां अपना एक केंद्रीय ऑपरेशन बेस स्थापित किया है, जहां प्रभावितों को रेस्क्यू कर लाया जा रहा है। इस केंद्र पर प्राथमिक चिकित्सा, रहने और भोजन का प्रबंध किया गया है। रोजाना सैकड़ों की संख्या में लोग अपने गुमशुदा परिजनों की जानकारी हासिल करने के उद्देश्य से इस सैन्य बेस पर पहुंच रहे हैं।

रसुआ हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की सुरंग में फंसे मजदूरों की आपबीती

जलप्रलय के कारण नेपाल के ऊर्जा क्षेत्र को भी भारी क्षति पहुंची है। 111 मेगावाट क्षमता वाले रसुआ हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को बाढ़ ने व्यापक नुकसान पहुंचाया है। इस पावर प्लांट में कार्यरत 70 से अधिक कर्मचारी आपदा के बाद से लापता हैं और समय बीतने के साथ उनके सुरक्षित मिलने की उम्मीदें धूमिल होती जा रही हैं। बाढ़ के दौरान पहाड़ों से बहे भारी-भरकम मलबे के कारण प्रोजेक्ट की सुरंग का मुख्य दरवाजा पूरी तरह बंद हो गया था, जिससे कई मजदूर अंदर ही फंस गए थे। बाद में बचाव दल ने भारी मशीनों की मदद से सुरंग के मुहाने से चट्टानों को हटाकर उन मजदूरों को जीवित बाहर निकाला। आपदा का सामना कर बचे लोगों का कहना है कि उन्होंने मौत को बेहद करीब से देखा है, हालांकि उनके कई साथी अभी भी मलबे के नीचे दबे या लापता हैं।

नेपाल सरकार ने विदेशी राहत सहायता लेने से क्यों किया इनकार?

संकट की इस अभूतपूर्व घड़ी के बीच नेपाल की बालेन शाह सरकार ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक फैसला लिया है। नेपाल ने बाहरी देशों से मिलने वाली प्रत्यक्ष राहत और बचाव सहायता को लेने से साफ इनकार कर दिया है। सरकार का तर्क है कि नेपाल की अपनी सुरक्षा एजेंसियां, जिनमें सेना और पुलिस शामिल हैं, इस आपदा से निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं। विदेशी नागरिकों की खोजबीन के लिए काठमांडू में एक केंद्रीय नियंत्रण कक्ष बनाया गया है। नेपाल सरकार के अधिकारियों के मुताबिक, यह फैसला 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के अनुभवों से सीख लेते हुए लिया गया है। 2015 के भूकंप के समय दुनिया भर से आई राहत टीमों के बीच आपसी समन्वय की भारी कमी देखी गई थी। स्थानीय और विदेशी टीमों के बीच रेस्क्यू का श्रेय लेने की होड़ मच जाती थी, जबकि आपदा के समय हवाई अड्डे, सड़कें और संचार तंत्र पहले से ही अत्यधिक दबाव में होते हैं। ऐसे में विदेशी टीमों के रसद और उपकरणों से लॉजिस्टिक्स पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, जिससे राहत कार्य बाधित होता है।

भारत द्वारा 50 टन राहत सामग्री का प्रेषण और विदेश मंत्रालय का प्रयास

नेपाल सरकार द्वारा विदेशी मदद न लेने की घोषणा से पूर्व ही भारत सरकार ने अपने पड़ोसी मित्र देश के लिए लगभग 50 टन आपातकालीन राहत सामग्री रवाना कर दी थी। भारत का मुख्य ध्यान अपने लापता 300 से अधिक नागरिकों की जल्द से जल्द खोज करने पर केंद्रित है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दिल्ली हवाई अड्डे पर कैलाश मानसरोवर यात्रा से सकुशल वापस लौटे भारतीय श्रद्धालुओं के एक दल से मुलाकात की और उनका हालचाल जाना। विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारी प्रभावित पहाड़ी इलाकों में फंसे प्रत्येक भारतीय से संपर्क स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब तक 80 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालकर वापस लाया जा चुका है। विदेश मंत्री ने भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी और सहायता में सहयोग के लिए नेपाली सेना का भी आभार व्यक्त किया।

सवाल-जवाब

नेपाल में आई आपदा में अब तक कितने लोगों की मौत हो चुकी है?
नेपाल सरकार की आधिकारिक पुष्टि के अनुसार अब तक 580 लोगों की मौत हो चुकी है और 1000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं।
नेपाल और चीन की पुलिस तथा सेना ने रेस्क्यू क्यों रोक दिया है?
तिब्बत सीमा के पास दोभान में मलबे के कारण एक कृत्रिम झील बन गई है और चीन में आए भूकंप के झटकों के कारण झील के टूटने का खतरा बढ़ गया है, जिससे एहतियातन रेस्क्यू रोककर इलाके खाली कराए जा रहे हैं।
इस प्राकृतिक आपदा में कितने भारतीय लापता बताए जा रहे हैं?
आपदा में 300 से अधिक भारतीय नागरिक लापता हैं, जिनमें मुख्य रूप से कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालु और नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं में कार्यरत मजदूर शामिल हैं।
नेपाल की बालेन शाह सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मदद लेने से मना क्यों किया?
सरकार का कहना है कि 2015 के भूकंप के दौरान विदेशी और स्थानीय टीमों के बीच तालमेल की कमी और एयरपोर्ट तथा सड़कों पर अत्यधिक दबाव की समस्या हुई थी, इसलिए इस बार आंतरिक एजेंसियों पर भरोसा जताया गया है।
भारत सरकार ने फंसे नागरिकों के लिए क्या कदम उठाए हैं?
भारत ने नेपाल को 50 टन राहत सामग्री भेजी है। विदेश मंत्री एस जयशंकर के अनुसार भारतीय दूतावास काठमांडू में सक्रिय है और अब तक 80 भारतीयों को सुरक्षित रेस्क्यू किया जा चुका है।
रसुआ हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट में क्या घटना घटी है?
111 मेगावाट क्षमता के रसुआ जलविद्युत प्रोजेक्ट में बाढ़ के मलबे से सुरंग का गेट बंद हो गया था। रेस्क्यू टीमों ने मलबा हटाकर फंसे मजदूरों को बाहर निकाला, हालांकि प्रोजेक्ट के 70 से अधिक कर्मचारी अभी भी लापता हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR