महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चलाने वाले गैर-मराठी चालकों के लिए राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण राहत की घोषणा की है। सरकार ने अपने पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए सभी व्यावसायिक वाहन चालकों को मराठी भाषा सीखने के लिए एक वर्ष का अतिरिक्त समय प्रदान किया है। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया है कि मुंबई सहित राज्य के विभिन्न जिलों में सेवाएं देने वाले कैब और ऑटो चालकों को दैनिक कामकाज के लिए सामान्य मराठी का ज्ञान होना आवश्यक है। हालांकि, चालकों के शैक्षणिक स्तर और व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने दंडात्मक कार्रवाई के बजाय उन्हें भाषा सीखने का अवसर देने का मार्ग चुना है। इस निर्णय से लाखों प्रवासी चालकों पर मंडरा रहा आजीविका का संकट फिलहाल टल गया है।
मराठी भाषा अनिवार्य करने का नियम और सरकारी मंशा
राज्य के परिवहन विभाग ने हाल ही में 12 अगस्त 2026 को एक आधिकारिक अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना के माध्यम से महाराष्ट्र में चलने वाले सभी ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का कार्यसाधक ज्ञान होना अनिवार्य कर दिया गया था। प्रशासन का उद्देश्य था कि राज्य में आजीविका कमाने वाले सभी नागरिक स्थानीय भाषा और संस्कृति का सम्मान करें। लेकिन जमीनी स्तर पर इस नियम के लागू होते ही कई व्यावहारिक दिक्कतें सामने आने लगीं।
व्यावसायिक वाहन चलाने वाले अधिकांश प्रवासी चालक बहुत कम पढ़े-लिखे हैं। ऐसे में कम समय के भीतर एक नई भाषा में दक्षता हासिल करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए कहा कि यात्रियों के साथ सामान्य बातचीत के लिए बुनियादी मराठी आना ही पर्याप्त है। सरकार का मकसद चालकों को परेशान करना या उनके रोजगार को खतरे में डालना नहीं है। इसी सोच के तहत सरकार ने नियमों में नरमी बरतते हुए चालकों को अपनी तैयारी पूरी करने के लिए 12 महीने की मोहलत देने का फैसला किया।
बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका और कानूनी पहलू
सरकारी नीति में आए इस बदलाव के पीछे कानूनी प्रक्रियाओं की भी अहम भूमिका रही है। इस प्रशासनिक आदेश के खिलाफ एडवोकेट विवेक शुक्ला ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में 12 अगस्त 2026 को जारी की गई अधिसूचना की वैधता को चुनौती दी गई थी। चालकों की ओर से अदालत में यह पक्ष रखा गया था कि किसी विशिष्ट भाषा की अनिवार्यता तय करना उनके संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह तर्क भी प्रस्तुत किया कि मोटर व्हीकल एक्ट 1988 के प्रावधानों में व्यावसायिक ड्राइविंग लाइसेंस या परमिट हासिल करने के लिए किसी क्षेत्रीय भाषा के ज्ञान को अनिवार्य शर्त नहीं बनाया गया है। याचिका में चेतावनी दी गई थी कि यदि यह नियम तुरंत प्रभावी किया गया, तो लाखों गरीब प्रवासी चालकों के वाहन चलाने वाले बैज रद्द या निलंबित हो सकते हैं। इससे उनके और उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट पैदा हो जाता। अदालत में मामला पहुंचने और कानूनी समीक्षा के दौरान सरकार ने अपना रुख नरम किया।
राजनीतिक बहस और 85 प्रतिशत चालकों का आंकड़ा
भाषा संबंधी इस अनिवार्यता को लेकर महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में भी तीखी बहस शुरू हो गई थी। कई राजनीतिक प्रतिनिधियों ने प्रशासन के कड़े रवैये पर आपत्ति जताई थी। इसी दौरान शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक से एक विशेष बैठक की। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने चालकों की समस्याओं को रेखांकित करते हुए एक ज्ञापन सौंपा।
संजय निरुपम ने अपनी बात रखते हुए कहा कि महाराष्ट्र में मराठी भाषा का सम्मान होना बेहद जरूरी है और प्रत्येक चालक को यात्रियों के साथ बुनियादी मराठी में संवाद करना आना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भाषा सिखाने के नाम पर किसी के साथ जबर्दस्ती नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि राज्य में कार्यरत लगभग 85 प्रतिशत चालक पहले ही मराठी भाषा का जरूरी ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं। ऐसे में जो थोड़े बहुत चालक बच गए हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाय उन्हें सीखने का समय दिया जाना चाहिए।





















