महाराष्ट्र में सार्वजनिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों और लोककला आयोजनों को लेकर प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। आगामी त्योहारी सीजन को ध्यान में रखते हुए राज्य में तेजी से लोकप्रिय हो रहे 'डीजे लावणी' शो के आयोजकों के लिए नए नियम लागू किए गए हैं। अब किसी भी सार्वजनिक स्थान पर बिना 'सूटेबिलिटी सर्टिफिकेट' के डीजे लावणी या उससे जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन नहीं किया जा सकेगा। राज्य स्टेज परफॉर्मेंस सेंसरशिप बोर्ड ने पुलिस प्रशासन को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि जब तक आयोजक कार्यक्रम की पूरी पटकथा, घोषणा पत्र या संक्षिप्त विवरण बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करके अनुमति पत्र न दिखाएं, तब तक आयोजनों को मंजूरी न दी जाए।
डीजे लावणी कार्यक्रमों पर क्यों कड़े किए गए नियम
प्रशासन की ओर से यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब पारंपरिक लावणी के नाम पर फूहड़ता और अश्लीलता परोसने की शिकायतें लगातार बढ़ रही थीं। 14 अगस्त को जारी एक विशेष परिपत्र में, जिसे पुलिस महानिदेशक, राज्य के सभी पुलिस आयुक्तों और पुलिस अधीक्षकों को भेजा गया है, सेंसरशिप बोर्ड ने गंभीर चिंता व्यक्त की। बोर्ड ने पाया कि कई आयोजक पारंपरिक लावणी के लिए जारी किए गए प्रमाण पत्रों का दुरुपयोग कर रहे हैं। इन प्रमाण पत्रों की आड़ में बिना किसी पूर्व मंजूरी के तेज डीजे संगीत के साथ अश्लील नृत्य प्रस्तुत किए जा रहे हैं। बोर्ड ने पुलिस को चेतावनी दी है कि इस प्रकार के आयोजनों से सांस्कृतिक गरिमा को नुकसान पहुंच रहा है।
आयोजकों और आयोजनों के लिए नए पुलिस निर्देश
सेंसरशिप बोर्ड ने राज्य के पुलिस तंत्र को कड़े निर्देश देते हुए कहा है कि किसी भी सार्वजनिक मनोरंजन कार्यक्रम को अनुमति देने से पहले दस्तावेजों की गहन जांच की जाए। इस दायरे में केवल लावणी ही नहीं, बल्कि नाटक, एकांकी, लोकनाट्य, तमाशा, लोक संगीत और विभिन्न मेलों में होने वाले सांस्कृतिक मंच शामिल हैं। पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आयोजकों के पास सरकार द्वारा निर्धारित रंगभूमी प्रयोग परिनिरीक्षण मंडळ से प्राप्त वैध सूटेबिलिटी सर्टिफिकेट उपलब्ध हो। इसके अतिरिक्त, बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल प्रमाण पत्र होना ही आयोजकों को कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा नहीं देता। यदि कलाकार मंच पर स्वीकृत सामग्री की सीमा लांघकर प्रस्तुति देते हैं, तो आयोजकों और कलाकारों दोनों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
पारंपरिक लावणी बनाम आधुनिक डीजे लावणी
लावणी महाराष्ट्र की एक बेहद समृद्ध और ऐतिहासिक लोक परंपरा है, जिसमें संगीत, काव्य, नृत्य और नाट्य अभिनय का अनूठा संगम देखने को मिलता है। 'लावण्य' शब्द से निकले इस लोकनृत्य की जड़ें पेशवा काल से जुड़ी हैं, जहाँ यह वीरता, भक्ति, सामाजिक विषयों और शृंगार रस को अभिव्यक्त करने का प्रमुख माध्यम था। पारंपरिक लावणी में महिला कलाकार नौवारी साड़ी पहनकर, पांवों में घुंघरू बांधकर ढोलकी और तुणतुणे जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर प्रदर्शन करती हैं।
इसके विपरीत, हाल के वर्षों में 'डीजे लावणी' का एक व्यावसायिक और आधुनिक रूप उभरा है। इसमें पारंपरिक ढोलकी के स्थान पर तेज ध्वनि वाले डीजे साउंड सिस्टम का उपयोग किया जाता है और मराठी तथा हिंदी फिल्मों के गानों पर नृत्यांगनाएं प्रस्तुति देती हैं। कई अवसरों पर पोशाक पारंपरिक नौवारी साड़ी के बजाय घाघरा-चोली जैसी आधुनिक वेशभूषा में बदल जाती है। पारंपरिक कला से जुड़े वरिष्ठ कलाकारों का मानना है कि इस तरह के आयोजनों से लावणी की मूल आत्मा और सांस्कृतिक विरासत को गहरा आघात पहुँच रहा है, जिससे असली तमाशा और लावणी कलाकारों की रोजी-रोटी पर भी संकट मंडराने लगा है। राज्य सरकार के इन सख्त कदमों का उद्देश्य इसी सांस्कृतिक गिरावट को रोकना और मंच कला की पवित्रता को बनाए रखना है।



















