महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की रूपरेखा तैयार करने के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति के भीतर प्रशासनिक और कानूनी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। सात सदस्यों वाले इस महत्वपूर्ण पैनल में शामिल बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सी. चव्हाण ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके पद छोड़ने की मूल वजह एक पूर्व नौकरशाह की गैर-आधिकारिक मौजूदगी रही। इस घटनाक्रम के ठीक 48 घंटे के भीतर राज्य सरकार ने उसी पूर्व आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को कमेटी में 'सदस्य व वरिष्ठ सलाहकार' के रूप में विधिवत जिम्मेदारी सौंप दी है।
अनधिकृत दखल पर उठा सवाल और जस्टिस चव्हाण का कड़ा विरोध
पूरा विवाद 19 सितंबर को आयोजित कमेटी की दूसरी औपचारिक बैठक से शुरू हुआ। उस दिन बैठक के निर्धारित एजेंडे या सदस्यों को भेजे गए आधिकारिक ईमेल में किसी भी बाहरी विशेषज्ञ या अतिथि की उपस्थिति का कोई जिक्र नहीं था। इसके बावजूद शत्रुघ्न सिंह बैठक में उपस्थित हुए और उन्हें अन्य सदस्यों से रूबरू कराकर सुझाव व दिशा-निर्देश देने के लिए कहा गया। इस पूरी प्रक्रिया पर जस्टिस आर. सी. चव्हाण ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई।
जस्टिस चव्हाण ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए सवाल उठाया कि जो व्यक्ति सात सदस्यीय पैनल का अधिकृत अंग ही नहीं है, वह किस अधिकार से कानूनी विचार-विमर्श में हस्तक्षेप कर सकता है और निर्देश दे सकता है। समिति की प्रमुख और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना देसाई ने उन्हें बतौर सलाहकार आमंत्रित किया था, लेकिन पैनल के एक वरिष्ठ सदस्य के लिए नियमों की यह अनदेखी स्वीकार्य नहीं थी। बिना किसी औपचारिक पद या अधिसूचना के किसी तीसरे व्यक्ति की ऐसी भूमिका को पूरी तरह से नियम-विरुद्ध मानते हुए जस्टिस चव्हाण ने बैठक के कुछ ही घंटों बाद अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
प्रशासनिक कदम और औपचारिक नियुक्ति का फैसला
जस्टिस चव्हाण के इस्तीफे से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। इसके बाद सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए त्वरित कदम उठाया। इस्तीफे के ठीक दो दिन बाद, यानी 21 सितंबर को महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश जारी कर पूर्व आईएएस शत्रुघ्न सिंह को आधिकारिक तौर पर समिति का सदस्य और वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त कर दिया। इस नियुक्ति के जरिए सरकार ने उस तकनीकी और कानूनी खामी को दूर करने की कोशिश की, जिसे लेकर जस्टिस चव्हाण ने कड़ा एतराज जताया था। हालांकि, जब इस पूरे प्रकरण और विवाद पर समिति की चेयरपर्सन जस्टिस रंजना देसाई और नवनियुक्त सलाहकार शत्रुघ्न सिंह से बात करने की कोशिश की गई, तो दोनों ने ही किसी भी तरह की सार्वजनिक टिप्पणी करने से साफ मना कर दिया।
सवालनामे के स्वरूप और वेबसाइट पर हुआ था गहरा मंथन
विवाद वाली 19 सितंबर की बैठक में असल में उस जन-सवालनामे की संरचना पर गहन चर्चा चल रही थी, जिसके माध्यम से राज्यभर के आम नागरिकों से प्रस्तावित कानून पर प्रतिक्रियाएं और राय जुटाई जानी हैं। इस प्रश्नावली के प्रारूप को लेकर भी सदस्यों की अलग-अलग राय सामने आई थी। जस्टिस चव्हाण का स्पष्ट सुझाव था कि जनता के सामने रखे जाने वाले सवालों में व्यक्तिगत राय और विस्तृत विचार जानने वाले सवालों की संख्या अधिक होनी चाहिए, ताकि लोग खुलकर अपनी बात रख सकें और किसी भी विषय पर गहन विश्लेषण संभव हो सके।
इसके विपरीत, समिति ने अंततः एक संतुलित रुख अपनाते हुए ऐसे मिले-जुले सवालनामे पर सहमति बनाई, जिसमें तथ्यात्मक विकल्पों के साथ-साथ व्यक्तिगत राय वाले बिंदु भी शामिल किए गए हैं। इस प्रश्नावली में करीब तीन दर्जन सवाल रखे जाने की तैयारी है, जिसे आने वाले दिनों में आम जनता के लिए सार्वजनिक किया जाएगा। इसी बैठक के दौरान शत्रुघ्न सिंह ने परामर्श के लिए बनाई जा रही आधिकारिक वेबसाइट को लेकर भी कई महत्वपूर्ण तकनीकी और व्यावहारिक बिंदु उठाए थे। उनका जोर इस बात पर था कि वेबसाइट पर शुरुआत में दिया जाने वाला परिचयात्मक टेक्स्ट ऐसा हो जो राज्य के लोगों को यूसीसी की मूल भावना आसानी से समझा सके, और सवालनामा तकनीकी रूप से इतना सुलभ हो कि आम नागरिक बिना किसी जटिलता के अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करा सकें।





















