मणिपुर में कुकी-जो काउंसिल ने राज्य सरकार को चेतावनी दी है कि यदि सुरक्षा सुनिश्चित करने और एक सार्थक राजनीतिक समाधान तक पहुंचने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वह समुदाय के निर्वाचित विधायकों को सरकार से वापस बुलाने पर विचार कर सकती है। इसके साथ ही संगठन ने कुकी-जो विद्रोही समूहों से भी सरकार के साथ अपने सहयोग की समीक्षा करने का आह्वान करने की बात कही है। साठ सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में कुकी-जो समुदाय के दस विधायक प्रतिनिधित्व करते हैं।
हिंसा के आंकड़े और चुनिंदा न्याय का गंभीर आरोप
बुधवार को जारी एक आधिकारिक बयान में काउंसिल ने कहा कि तीन मई दो हजार तेईस को राज्य में जातीय हिंसा भड़कने के बाद से अब तक दो सौ पचास से अधिक कुकी-जो नागरिकों की जान जा चुकी है। इस संघर्ष के कारण चालीस हजार से ज्यादा लोग विस्थापित होकर बेघर हो चुके हैं। काउंसिल ने प्रशासन पर भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जब भी मैतेई या नागा नागरिकों को कोई नुकसान पहुंचता है तो त्वरित और सख्त कार्रवाई की जाती है, जबकि कुकी-जो नागरिकों की मौतों से जुड़े मामलों में ऐसी तत्परता पूरी तरह गायब रहती है।
अलग प्रशासन की मांग और कड़े कदमों का अल्टीमेटम
काउंसिल ने अलग प्रशासनिक व्यवस्था की अपनी पुरानी मांग को फिर दोहराया और स्पष्ट किया कि कुकी-जो समुदाय विधानसभा सहित एक अलग केंद्र शासित प्रदेश की स्थापना चाहता है। संगठन ने जोर देकर कहा कि यदि प्रशासन समुदाय के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, पीड़ितों को न्याय दिलाने और एक सार्थक राजनीतिक समाधान को आगे बढ़ाने में विफल रहता है, तो अधिक कड़े राजनीतिक कदम उठाए जाएंगे।
सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस समझौते पर असर की आशंका
इन कड़े कदमों के तहत राज्य विधानसभा में मौजूद दस विधायकों को सरकारी कामकाज और भागीदारी से अलग होने को कहा जा सकता है। इसके अलावा, सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस समझौते के तहत सक्रिय कुकी-जो सशस्त्र समूहों से भी सरकार के साथ जारी अपने तालमेल और सहयोग पर दोबारा विचार करने का अनुरोध किया जा सकता है। यह समझौता केंद्र सरकार, मणिपुर राज्य प्रशासन और कई कुकी तथा जोमी विद्रोही संगठनों के बीच हुआ एक त्रिपक्षीय प्रबंध है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में शांति बनाए रखना रहा है।



















