भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मणिपुर में जारी तनाव के बीच अवरुद्ध पड़े राष्ट्रीय राजमार्गों को फिर से खोलने के लिए सभी प्रतिद्वंद्वी पक्षों से एक व्यापक संयुक्त कार्ययोजना तैयार करने को कहा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि लंबे समय से जारी नाकाबंदी के कारण आम जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो रही है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि सड़कों को बंद रखने से किसी भी पक्ष का भला नहीं होता, क्योंकि ये मार्ग आम लोगों के जीवन के लिए बेहद जरूरी हैं।
एकतरफा समाधान पर शीर्ष अदालत की चेतावनी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता की मांगों पर विचार करते हुए सतर्कता बरतने पर जोर दिया। अदालत ने माना कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर नाकाबंदी को लेकर उठाई गई चिंता पूरी तरह जायज है, लेकिन केवल सरकारी हस्तक्षेप का आदेश देने वाले व्यापक न्यायिक निर्देश निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा को भड़का सकते हैं। पीठ ने रेखांकित किया कि इस मामले का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्ग 2 (NH-2) पर से रुकावटें हटाना तथा आवश्यक सेवाओं और खाद्य सामग्री की आवाजाही को तुरंत बहाल करना है, जो व्यापक जनहित से जुड़ा हुआ है।
किसी भी मार्ग-विशेष दृष्टिकोण को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि केवल एक नाकाबंदी को हटाना और बाकी सड़कों को बंद छोड़ना समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसके साथ ही अदालत ने नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) को इस मामले में एक पक्ष के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया। पीठ ने याचिकाकर्ता और नव-नामित प्रतिवादियों से प्रभावित राजमार्गों और सड़कों का पूरा विवरण प्रस्तुत करने तथा उन्हें पुनः चालू करने का ठोस प्रस्ताव देने को कहा है।
आर्थिक नाकाबंदी और मानवीय संकट के आरोप
यह कानूनी याचिका कुकी विमेन ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (KWOHR) द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई थी। संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय से तत्काल हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई, ताकि कांगपोकपी जिले के कुकी-ज़ो आबादी वाले क्षेत्रों में भोजन, ईंधन और दवाओं जैसी आवश्यक वस्तुओं की सुगम आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। संगठन ने आरोप लगाया कि लंबे समय से जारी यह नाकाबंदी एक तरह की सामूहिक सजा है, जिसने क्षेत्र में एक गंभीर मानवीय संकट खड़ा कर दिया है।
याचिकाकर्ता संगठन के 28 जुलाई के बयान के अनुसार, मणिपुर के नागा नागरिक समाज समूहों ने 17 मई के आसपास से राजमार्गों पर नाकाबंदी लागू कर रखी है। अदालत में याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने बताया कि इस रुकावट के कारण कांगपोकपी जिले में आवश्यक खाद्य पदार्थों की भारी कमी हो गई है और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पूरी तरह से प्रभावित हुई है।
अदालत में विरोधी पक्ष की दलीलें और आरोप
दूसरी तरफ, इंटरनेशनल मैतेई ऑर्गनाइजेशन का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ङांगोम जूनियर ने इन आरोपों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने याचिका को दुर्भावनापूर्ण करार देते हुए दावा किया कि याचिकाकर्ता से जुड़े समूह भी राज्य के वैकल्पिक मार्गों को अवरुद्ध कर रहे हैं।
दोनों पक्षों की परस्पर विरोधी दलीलों को सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह इस संकट से आंशिक रूप से नहीं निपटेगा। पीठ ने दोनों पक्षों को बंद पड़े सभी रास्तों की सूची सौंपने और एक तटस्थ एजेंसी की देखरेख में यातायात की सुगम आवाजाही शुरू करने के लिए आपसी सहमति से एक योजना तैयार करने का निर्देश दिया है।
राजमार्गों की जमीनी स्थिति और हिंसक घटनाओं का घटनाक्रम
मणिपुर में जारी नाकाबंदी ने राज्य की प्रमुख परिवहन व्यवस्था को ठप कर दिया है। इसमें राष्ट्रीय राजमार्ग 2 (NH-2) शामिल है, जो इंफाल को नागालैंड के दीमापुर से जोड़ता है। NH-2 पर आवाजाही ठप होने के बाद कुकी समूहों ने इसके जवाब में राष्ट्रीय राजमार्ग 202 (NH-202) पर जवाबी नाकाबंदी शुरू कर दी, जिससे संकट और गहरा गया।
राजमार्गों पर बने इस गतिरोध की मुख्य वजह मई 2026 में हुई हिंसक घटनाएं थीं। 13 मई को कांगपोकपी जिले में शांति कार्यक्रम से लौट रहे ताडो बैपटिस्ट पादरियों सहित कुकी-ज़ो चर्च नेताओं पर संदिग्ध हथियारबंद हमलावरों ने हमला कर दिया था। उस घातक हमले में 3 लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हो गए थे, जिसके बाद से क्षेत्र में नाकाबंदी का दौर शुरू हुआ।
















