ब्रिटिश पाउंड यानी GBP इन दिनों कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रहा है। हाल ही में आए आर्थिक आंकड़ों के अनुसार यूके में हेडलाइन सीपीआई सालाना आधार पर घटकर 2.6% पर आ गई है। इस नरमी के बाद बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा निकट भविष्य में ब्याज दरें बढ़ाने की संभावनाओं पर विराम सा लगता नजर आ रहा है। हालांकि, बाजार अभी भी अप्रैल 2027 तक नीतिगत कसावट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इसके बावजूद, पिछले एक महीने के दौरान पाउंड ने ऊंची पैदावार के सहारे अपनी स्थिति को काफी हद तक संभाले रखा है, लेकिन आगे का रास्ता आसान नहीं दिखाई दे रहा है।
भू-राजनीतिक तनाव और नीतिगत विश्वसनीयता पर सवाल
विशेषज्ञों के मुताबिक इस पूरी स्थिति में सबसे बड़ा जोखिम भू-राजनीतिक उथल-पुथल बना हुआ है। हालिया तेजी अब पीछे छूट चुकी है और यह चुनौतीपूर्ण मिश्रण पाउंड को बेहद संवेदनशील बना रहा है। ऊर्जा बाजार से जुड़े जोखिम यदि लगातार बने रहते हैं और नीतिगत विश्वसनीयता को लेकर किसी तरह का संदेह पैदा होता है, तो पाउंड की मुश्किलें और अधिक बढ़ सकती हैं। ऐसे में निवेशकों को बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है क्योंकि जरा सी चूक मुद्रा बाजार में बड़ी हलचल पैदा कर सकती है।
सोमवार के कारोबार में GBP/USD और EUR/USD का हाल
सप्ताह की शुरुआत सकारात्मक और तेजी के रुख के साथ करने के बाद, GBP/USD जोड़ी ने सोमवार के उत्तरार्ध में अपनी दिशा बदल ली और यह 1.3300 के आसपास लाल निशान में कारोबार करती नजर आई। दूसरी ओर, मध्य पूर्व के संघर्ष में अस्थायी विराम के चलते कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। इस गिरावट ने अमेरिकी डॉलर की बढ़त को सीमित करने का काम किया है, जिसकी वजह से पाउंड फिलहाल किसी तरह बाजार में अपनी जमीन बचाए रखने में कामयाब रहा है।
यूरो और मध्य पूर्व की कूटनीति का असर
इसी प्रकार, EUR/USD की चाल पर भी नजर डालें तो इस मुद्रा ने भी अपनी तेजी की गति खो दी है और सोमवार के दूसरे पहर में यह 1.1400 के नीचे मामूली बढ़त के साथ कारोबार कर रही थी। मध्य पूर्व में हमलों के रुकने के बाद से बाजार के तमाम प्रतिभागी वहां तनाव कम होने की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद अनिश्चितता का माहौल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि क्या अमेरिका और ईरान अंततः किसी स्थायी कूटनीतिक समाधान तक पहुंच पाएंगे या नहीं।

















