चीन के केंद्रीय बैंक द्वारा अपनी प्रमुख बेंचमार्क ऋण दरों को यथावत रखने के फैसले के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव देखने को मिला। पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने मंगलवार को अपनी एक साल और पांच साल की लोन प्राइम रेट में कोई बदलाव नहीं किया, जिससे ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, इस कमजोरी के बीच रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के एक शीर्ष अधिकारी के सख्त बयानों ने मुद्रा को नीचे के स्तरों पर सहारा देने का काम किया। केंद्रीय बैंक के अधिकारियों की ओर से आ रहे संकेतों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश में आने वाले दिनों में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की संभावनाएं अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। वैश्विक स्तर पर वित्तीय बाजार एक तरफ चीन की मौद्रिक नीति और दूसरी तरफ अमेरिकी फेडरल रिज़र्व के अगले कदमों का बारीकी से आकलन कर रहे हैं।
चीन के नीतिगत फैसले और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर असर
पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने मंगलवार को अपनी वित्तीय समीक्षा में एक साल और पांच साल की लोन प्राइम रेट को मौजूदा स्तरों पर ही बनाए रखने का निर्णय लिया। इस घोषणा के सामने आते ही ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में नरमी देखी गई, क्योंकि चीनी मौद्रिक नीति में किसी भी तरह के बदलाव का सीधा असर ऑस्ट्रेलियाई बाजार पर पड़ता है। चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और वहां की आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार सीधे तौर पर ऑस्ट्रेलिया की आर्थिक सेहत से जुड़ी होती है। जब चीनी अर्थव्यवस्था में विस्तार होता है और वहां मांग मजबूत रहती है, तब ऑस्ट्रेलिया से कच्चे माल, वस्तुओं और सेवाओं का आयात बड़े पैमाने पर बढ़ता है। इससे विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा की मांग तेज होती है और उसके मूल्य में इजाफा होता है। इसके विपरीत, जब चीनी अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ती है या विकास दर उम्मीद के मुताबिक नहीं रहती, तो ऑस्ट्रेलिया से होने वाले निर्यात पर असर पड़ता है और मुद्रा कमजोर होती है। यही वजह है कि चीनी आर्थिक आंकड़ों, चाहे वह सकल घरेलू उत्पाद हो या खुदरा बिक्री, में आने वाले किसी भी सकारात्मक या नकारात्मक बदलाव का सीधा असर ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और उससे जुड़े मुद्रा जोड़ों पर पड़ता है।
रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया का रुख और ब्याज दरों का समीकरण
इस गिरावट के बावजूद ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को घरेलू मोर्चे से समर्थन मिलने की उम्मीद बनी हुई है। रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के असिस्टेंट गवर्नर क्रिस्टोफर केंट ने हाल ही में सख्त टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया कि क्या मौजूदा ब्याज दरें वास्तव में अर्थव्यवस्था को सीमित करने के लिए पर्याप्त हैं। उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि ऑस्ट्रेलिया के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यूट्रल ब्याज दरों में बढ़ोतरी के प्रमाण मिल रहे हैं। इस बयान से वित्तीय बाजारों में यह संदेश गया कि रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया भविष्य में ब्याज दरों को और बढ़ाने के विकल्प पर विचार कर सकता है। किसी भी देश की मुद्रा के लिए उसके केंद्रीय बैंक की ब्याज दर नीति एक बेहद महत्वपूर्ण कारक होती है। रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया वह ब्याज दर तय करता है जिस पर वाणिज्यिक बैंक आपस में नकदी का लेन देन करते हैं, और इसी दर के आधार पर पूरी अर्थव्यवस्था में उधारी की दरें निर्धारित होती हैं। केंद्रीय बैंक का प्राथमिक लक्ष्य मुद्रास्फीति को दो से तीन प्रतिशत के दायरे में स्थिर रखना होता है। जब अन्य प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों की तुलना में ऑस्ट्रेलिया की ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को मजबूती मिलती है, जबकि दरें कम रहने पर मुद्रा पर नकारात्मक दबाव बनता है। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय बैंक क्रेडिट स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए क्वांटिटेटिव ईजिंग और क्वांटिटेटिव टाइटनिंग जैसे उपकरणों का भी उपयोग करता है, जहां क्वांटिटेटिव ईजिंग से मुद्रा कमजोर होती है और क्वांटिटेटिव टाइटनिंग से उसे बल मिलता है।
लौह अयस्क निर्यात और व्यापार संतुलन का प्रभाव
ऑस्ट्रेलिया प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश है और उसके आर्थिक ढांचे में निर्यात की भूमिका केंद्रीय है। देश का सबसे प्रमुख निर्यात उत्पाद लौह अयस्क है, जो वर्ष 2021 के आंकड़ों के अनुसार प्रति वर्ष 118 अरब डॉलर का योगदान देता है। इस भारी भरकम निर्यात का सबसे बड़ा गंतव्य चीन ही है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय जिंस बाजार में लौह अयस्क की कीमतों में होने वाला उतार चढ़ाव सीधे तौर पर ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा की दिशा तय करता है। सामान्य तौर पर जब वैश्विक बाजार में लौह अयस्क के दाम चढ़ते हैं, तो ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा की मांग में व्यापक इजाफा होता है और उसका मूल्य बढ़ता है। इसके विपरीत लौह अयस्क की कीमतें टूटने पर ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में भी गिरावट दर्ज की जाती है। लौह अयस्क के ऊंचे दाम देश के व्यापार संतुलन को भी सकारात्मक बनाए रखने में मदद करते हैं। व्यापार संतुलन किसी देश द्वारा किए गए कुल निर्यात की कमाई और आयात पर किए गए खर्च के बीच का अंतर होता है। जब विदेशी खरीदार ऑस्ट्रेलिया के सामानों को खरीदने के लिए भारी मात्रा में भुगतान करते हैं, तो आयात खर्च की तुलना में निर्यात अधिशेष तैयार होता है, जिससे मुद्रा मजबूत होती है। यदि व्यापार संतुलन नकारात्मक हो जाता है, तो मुद्रा के मूल्य पर दबाव बढ़ जाता है।
अमेरिकी मुद्रा और ब्याज दरों पर टिकी बाजार की निगाहें
वैश्विक वित्तीय बाजार में एक और बड़ा कारक अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की मौद्रिक नीति का भविष्य है। शिकागो मर्केंटाइल एक्सचेंज के फेडवॉच टूल के आंकड़े दर्शाते हैं कि बाजार प्रतिभागी अक्टूबर की बैठक में फेडरल रिज़र्व द्वारा ब्याज दरों को स्थिर रखने की उम्मीद कर रहे हैं। वहीं दिसंबर की बैठक में दरों में वृद्धि की संभावना 82.8 प्रतिशत आंकी जा रही है। हाल के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और उत्पादक मूल्य सूचकांक के आंकड़ों ने मूल्य दबावों में उल्लेखनीय तेजी की पुष्टि की है, जिससे अमेरिका में मुद्रास्फीति का मुद्दा दोबारा केंद्र में आ गया है। इस तेज मुद्रास्फीति के आंकड़ों ने निवेशकों में यह चिंता बढ़ा दी है कि फेडरल रिज़र्व को सख्त मौद्रिक नीति अधिक लंबे समय तक बनाए रखनी पड़ सकती है। इस दृष्टिकोण ने बॉन्ड प्रतिफल को सहारा दिया है और शेयर बाजार के साथ साथ सोने जैसी संपत्तियों पर दबाव बनाया है। हालांकि ऑस्ट्रेलियाई डॉलर ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार दो दिनों की बढ़त दर्ज करते हुए 0.6980 के स्तर पर कारोबार किया, जो 0.50 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्शाता है। इस मजबूती को चीन के मजबूत सकल घरेलू उत्पाद और खुदरा बिक्री के आंकड़ों से सहारा मिला, जिसने वैश्विक बाजार में जोखिम लेने की धारणा को बढ़ावा दिया। मुद्रा बाजार में यह धारणा बेहद अहम होती है, जहां निवेशक जोखिम भरी संपत्तियों की ओर रुख करते हैं तो ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जैसी मुद्राओं को लाभ होता है, जबकि अनिश्चितता के दौर में निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की ओर भागते हैं।
येन और सोने के बाजार में भी हलचल
एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान अन्य प्रमुख संपत्तियों में भी महत्वपूर्ण उतार चढ़ाव दर्ज किए गए। अमेरिकी डॉलर और जापानी येन का मुद्रा जोड़ा 158.00 के स्तर के पास रक्षात्मक स्थिति में बना रहा। हाल के दिनों में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आई गिरावट के चलते अमेरिकी डॉलर दो सप्ताह के निचले स्तर के करीब दबाव में दिखा। इसके साथ ही बैंक ऑफ जापान के गवर्नर काज़ुओ उएदा के सख्त बयानों और बाजार में जापानी अधिकारियों द्वारा संभावित हस्तक्षेप के जोखिमों ने येन को सहारा दिया, जिससे इस मुद्रा जोड़े पर दबाव बना रहा। हालांकि अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं और भू राजनीतिक अनिश्चितताओं ने डॉलर के बड़े नुकसान को सीमित रखा। दूसरी तरफ कमोडिटी बाजार में सोने की कीमत मंगलवार के शुरुआती एशियाई सत्र के दौरान गिरकर लगभग 4,135 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गई। ऊर्जा की कीमतों में आई नरमी के बावजूद अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के ऊंचे स्तरों पर बने रहने से इस कीमती धातु में बिकवाली हावी रही। निवेशक अगले सप्ताह होने वाली फेडरल रिज़र्व की नीतिगत बैठक से पहले ब्याज दरों के रुख को लेकर सतर्क रुख अपना रहे हैं और अपने पोर्टफोलियो का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं।















