बुधवार को अमेरिकी शेयर बाजार में जमकर बिकवाली देखने को मिली और निवेशक जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाते नजर आए। इसकी सबसे बड़ी वजह रही फेडरल रिजर्व का ब्याज दर पर आने वाला अहम फैसला, जिसका इंतजार पूरी दुनिया के बाजार कर रहे हैं। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में लौटी तेजी और मिडिल ईस्ट में फिर से गरमाए हालात ने माहौल को और नर्वस बना दिया। गिरावट की अगुवाई टेक्नोलॉजी और औद्योगिक कंपनियों के शेयरों ने की, जबकि बड़ी टेक कंपनियों के तिमाही नतीजों से पहले भी कारोबारी फूंक फूंककर कदम रख रहे थे।
डाओ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज कारोबार के शुरुआती घंटों में ही तेजी से लुढ़का। 29 जुलाई को दोपहर 12:13 बजे (GMT-4) तक यह सूचकांक 903.04 अंक यानी 1.71 फीसदी गिरकर 51,844.28 पर आ गया। सूचकांक ने दिन की शुरुआत 52,674.21 के स्तर से की थी और यही इसका दिन का ऊपरी स्तर भी रहा। इसके बाद यह फिसलते हुए 51,814.32 के निचले स्तर तक चला गया। पिछले कारोबारी सत्र में यह 52,747.32 पर बंद हुआ था, यानी वहां से गिरावट का सिलसिला और आगे बढ़ गया।
टेक और सेमीकंडक्टर शेयरों पर सबसे ज्यादा दबाव
सिर्फ डाओ ही नहीं, व्यापक दायरे वाला S&P 500 और नैस्डैक कंपोजिट भी लाल निशान में कारोबार करते रहे, क्योंकि निवेशक जोखिम वाली संपत्तियों में अपना पैसा घटा रहे थे। बिकवाली का सबसे साफ असर टेक्नोलॉजी शेयरों पर दिखा। दुनिया भर की चिप बनाने वाली कंपनियों में कमजोरी के चलते सेमीकंडक्टर शेयर भी दबाव में बने रहे।
फेड का फैसला सबसे बड़ा ट्रिगर
इस हफ्ते वैश्विक बाजारों के लिए सबसे बड़ा ट्रिगर फेडरल रिजर्व का ब्याज दर पर ऐलान ही है। हालांकि बाजार के ज्यादातर जानकार मान रहे हैं कि केंद्रीय बैंक मुख्य ब्याज दरों को फिलहाल जस का तस रखेगा, फिर भी निवेशकों की पैनी नजर पॉलिसी स्टेटमेंट और चेयरमैन जेरोम पॉवेल की टिप्पणियों पर टिकी है। इन्हीं संकेतों से आगे ब्याज दरों की दिशा तय होगी।
अगर कहीं से भी यह इशारा मिलता है कि कर्ज महंगा और लंबे समय तक बना रह सकता है, तो इसका असर ग्रोथ वाले सेक्टरों पर पड़ेगा, जैसे टेक्नोलॉजी, रियल एस्टेट और उपभोक्ता खर्च से जुड़े शेयर। निवेशक यह भी टटोलने की कोशिश कर रहे हैं कि हाल के महीनों में कीमतों का दबाव कुछ हल्का पड़ने के बावजूद नीति निर्माता महंगाई को लेकर कितने चिंतित हैं।
कच्चे तेल में उछाल ने बढ़ाई बेचैनी
बाजार की घबराहट को बढ़ाने का काम कच्चे तेल ने भी किया। मिडिल ईस्ट में ताजा घटनाक्रम के बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता गहराई और तेल की कीमतें दोबारा ऊपर चढ़ गईं। बीते कुछ दिनों में बरसों की सबसे तेज गिरावटों में से एक झेलने के बाद ब्रेंट क्रूड ने वापसी की, वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड फिर से 83 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया।
तेल में यह तेजी उन खबरों के बाद आई जिनमें कहा गया कि अमेरिका ने इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए ईरानी हमले को नाकाम कर दिया। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से आई प्रतिक्रिया ने बाजार की अनिश्चितता और बढ़ा दी। उन्होंने कड़े जवाब की चेतावनी दी, लेकिन साथ ही बातचीत का रास्ता भी खुला रखने का संकेत दिया।
महंगाई की चिंता फिर लौटी
तेल के दाम चढ़ने से एक बार फिर महंगाई की आशंका केंद्र में आ गई है। ऊर्जा की बढ़ती लागत परिवहन, विनिर्माण और कच्चे माल के खर्च को महंगा कर सकती है। ऐसे में फेडरल रिजर्व के सामने नीति तय करने की राह और उलझ सकती है, क्योंकि एक तरफ अर्थव्यवस्था को सहारा देने का दबाव है तो दूसरी तरफ कीमतों पर लगाम लगाने की चुनौती।



















