अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में बुधवार के कारोबारी सत्र के दौरान न्यूजीलैंड डॉलर ने अपने दो महीने से अधिक के निचले स्तर से मामूली वापसी दर्ज की है। अमेरिकी डॉलर में नीतिगत बैठक से ठीक पहले देखी गई हल्की मुनाफावसूली ने इस मुद्रा जोड़ी को सहारा दिया। हालांकि, चार्ट्स पर तकनीकी ढांचा अभी भी कमजोर बना हुआ है, जिसके कारण बाजार विश्लेषक किसी भी नई तेजी पर दांव लगाने से पहले अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं। ताजा तकनीकी संकेतकों का मिलाजुला रुख यह दर्शा रहा है कि बिकवाली का दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, जिससे इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि तेजी के हर प्रयास पर बिकवाल हावी हो सकते हैं और बढ़त सीमित रह सकती है।
तकनीकी स्तर और महत्वपूर्ण बाधाएं
न्यूजीलैंड डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी में किसी भी सुधारात्मक उछाल के सामने पहला कड़ा प्रतिरोध 61.8 प्रतिशत फाइबोनैचि रिट्रेसमेंट स्तर के पास 0.5765 पर दिखाई दे रहा है। यदि खरीदार इस सीमा को पार करने में सफल रहते हैं, तो अगला अवरोध 50.0 प्रतिशत के स्तर पर 0.5807 के आसपास सामने आएगा। चार्ट पर ऊपर की ओर और मजबूत रुकावट 38.2 प्रतिशत रिट्रेसमेंट 0.5850 और 200-दिवसीय सरल मूविंग एवरेज यानी एसएमए 0.5855 पर मौजूद है। यह दायरा एक व्यापक तकनीकी सीमा तय करता है, जिसके पार 23.6 प्रतिशत रिट्रेसमेंट 0.5903 का स्तर आता है।
दूसरी ओर, यदि मंदी का रुझान दोबारा गहराता है, तो नीचे की तरफ शुरुआती समर्थन 78.6 प्रतिशत फाइबोनैचि रिट्रेसमेंट के पास 0.5704 पर स्थित है। यदि गिरावट का यह सिलसिला और लंबा खिंचता है, तो हालिया निचला स्तर 0.5627 के करीब अगला मजबूत सहारा साबित होगा। इस स्तर पर बिकवाल अपने मुनाफे को सुरक्षित करने के लिए सौदे काट सकते हैं, जिससे गिरावट को कुछ ठहराव मिल सकता है। लाइव मार्केट आंकड़ों के अनुसार, इस समय मुद्रा जोड़ी 0.5724 के आसपास कारोबार कर रही है, जो पिछले बंद स्तर 0.5728 से 0.07 प्रतिशत कम है। इसका 52 हफ्तों का दायरा 0.5584 से 0.6093 के बीच रहा है। 14-दिवसीय आरएसआई 29 के आंकड़े के साथ ओवरसोल्ड स्थिति का संकेत दे रहा है, जबकि एमएसीडी मंदी के दायरे में बना हुआ है और 20-दिवसीय बोलिंगर बैंड 0.5694 से 0.6017 के बीच फैला है।
फेडरल रिजर्व का दोहरा जनादेश और ब्याज दरें
संयुक्त राज्य अमेरिका में मौद्रिक नीति का निर्धारण केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा किया जाता है। फेडरल रिजर्व मुख्य रूप से दोहरे उद्देश्यों पर काम करता है, जिसमें कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और अधिकतम रोजगार को बढ़ावा देना शामिल है। इन दोनों लक्ष्यों को साधने के लिए केंद्रीय बैंक का प्राथमिक हथियार ब्याज दरों में समायोजन करना है। जब अर्थव्यवस्था में कीमतें अत्यधिक तेजी से बढ़ती हैं और मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत के आधिकारिक लक्ष्य को पार कर जाती है, तब फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है। कर्ज की लागत बढ़ने से पूरी अर्थव्यवस्था में उधारी महंगी हो जाती है। यह कदम विदेशी निवेशकों को अमेरिका में पूंजी लगाने के लिए आकर्षित करता है, जिससे अमेरिकी डॉलर की मांग और कीमत में तेजी आती है। इसके विपरीत, जब मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत से नीचे फिसलती है या बेरोजगारी दर चिंताजनक रूप से बढ़ जाती है, तब फेडरल रिजर्व उधार को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती करता है, जिसका असर अमेरिकी डॉलर पर दबाव के रूप में देखा जाता है।
एफओएमसी की बैठकें और नीतिगत फैसला
फेडरल रिजर्व हर वर्ष आठ नियमित नीतिगत बैठकें आयोजित करता है, जहां फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी एफओएमसी देश की समग्र आर्थिक परिस्थितियों का आकलन करती है और ब्याज दरों पर निर्णय लेती है। एफओएमसी की इस महत्वपूर्ण बैठक में केंद्रीय बैंक के बारह शीर्ष अधिकारी शामिल होते हैं। इनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात सदस्य, न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व बैंक के अध्यक्ष, और शेष ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों में से चुने गए चार अध्यक्ष शामिल होते हैं, जो एक-एक वर्ष के रोटेशन के आधार पर अपनी सेवाएं देते हैं। इन बैठकों से पहले जारी हुए आंकड़ों में अमेरिकी अगस्त रोजगार रिपोर्ट काफी मजबूत रही थी, जिसने दरों के बाजार में फेड की ओर से सख्त रुख की उम्मीदों को हवा दी थी, हालांकि बाद में सामने आए अमेरिकी अगस्त उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आंकड़ों ने बाजार का रुख तय करने में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
क्वांटिटेटिव ईजिंग और टाइटनिंग के मायने
असाधारण या संकटकालीन परिस्थितियों में फेडरल रिजर्व अपरंपरागत नीतियों का सहारा लेता है, जिसे क्वांटिटेटिव ईजिंग यानी क्यूई कहा जाता है। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से केंद्रीय बैंक वित्तीय संकट या अत्यंत कम मुद्रास्फीति के समय पूरी बैंकिंग प्रणाली में नकदी के प्रवाह को बड़े पैमाने पर बढ़ाता है। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान फेडरल रिजर्व ने इस रणनीति का व्यापक इस्तेमाल किया था। इसके तहत केंद्रीय बैंक अतिरिक्त डॉलर का सृजन कर वित्तीय संस्थानों से उच्च श्रेणी के बॉन्ड खरीदता है, जो आमतौर पर अमेरिकी डॉलर को कमजोर करता है। इसके विपरीत प्रक्रिया को क्वांटिटेटिव टाइटनिंग यानी क्यूटी कहा जाता है। इस चरण में केंद्रीय बैंक वित्तीय संस्थानों से नए बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है और परिपक्व होने वाले बॉन्ड की मूल राशि का दोबारा निवेश नहीं करता। नकदी का प्रवाह कम होने से यह नीति सामान्यतः अमेरिकी डॉलर के मूल्य को मजबूती प्रदान करती है।
वैश्विक मुद्राओं और बॉन्ड प्रतिफल का परिदृश्य
बुधवार के कारोबारी सत्र में एशियाई समय के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी 0.7100 के स्तर का बचाव करते हुए लगातार तीसरे दिन दबाव में रही और अपने मासिक निचले स्तर के निकट बनी रही। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से मुद्रास्फीति बढ़ने के डर और फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दर में संभावित वृद्धि की आशंका ने अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल को कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया, जिससे अमेरिकी डॉलर दो सप्ताह के उच्च स्तर के पास मजबूत दिखा। इसके अतिरिक्त, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ा दी, जिससे जोखिम से जुड़ी ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा प्रभावित हुई।
इसी तरह, अमेरिकी डॉलर और जापानी येन की जोड़ी एशियाई सत्र में तेजी के साथ 155.00 के ऊपर एक सप्ताह के नए उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। अमेरिका और ईरान के बीच गहराते तनाव ने डॉलर की आरक्षित मुद्रा की स्थिति को मजबूती दी, हालांकि बाद में होने वाले फेड के फैसले और गुरुवार से शुरू होने वाली बैंक ऑफ जापान की बैठक से पहले यह जोड़ी 155.50 के नीचे ही सीमित रही। एक दशक से अधिक समय तक जापान की बेहद कम ब्याज दरों ने दुनिया भर में खरबों डॉलर के निवेश को वित्तपोषित करने में मदद की थी, जिससे जापानी येन दुनिया का सबसे सस्ता फंडिंग स्रोत बन गया था। अब जब बैंक ऑफ जापान द्वारा नीति को और सख्त करने की उम्मीद की जा रही है, तब यह ऐतिहासिक समीकरण एक नए दौर में प्रवेश कर सकता है। वहीं दूसरी ओर, यूरोपीय व्यापार में सोना 4,350 डॉलर के नीचे अटका रहा, जहां दो सप्ताह के उच्च स्तर के बाद डॉलर की चाल ठहरने से इसे हल्का सहारा तो मिला, लेकिन प्रमुख नीतिगत जोखिम के चलते कारोबारियों ने बड़े सौदे करने से परहेज किया।



















