वैश्विक वित्तीय बाजारों में केंद्रीय बैंकों के आगामी फैसलों को लेकर बढ़ती हलचल के बीच, यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) द्वारा मुद्रास्फीति पर अपनाया गया सख्त रुख अमेरिकी डॉलर के मुकाबले यूरो को मजबूती प्रदान कर सकता है. वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और फ्रांस व इटली जैसे यूरोज़ोन देशों में बजटीय चिंताओं के बावजूद, फ्रैंकफर्ट स्थित इस केंद्रीय बैंक ने अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट कर दी हैं. ईसीबी ने आर्थिक विकास की चिंताओं पर काबू पाते हुए लक्ष्य से ऊपर चल रही महंगाई दर से निपटने को प्राथमिकता दी है, जिससे यह साफ होता है कि यह बैंक घरेलू राजनीतिक दबावों से पूरी तरह मुक्त होकर काम कर रहा है.
डीबीएस बैंक के विश्लेषकों का मानना है कि महंगाई को वापस तय लक्ष्य के स्तर पर लाने के लिए ईसीबी का कड़ा फोकस यूरो को एक मजबूत आधार प्रदान करता है. हालांकि फ्रांस और इटली जैसी दक्षिण यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ वित्तीय चिंताएं जुड़ी हुई हैं, लेकिन केंद्रीय बैंक की गवर्निंग काउंसिल इन क्षेत्रीय राजनीतिक अस्थिरताओं से प्रभावित नहीं दिखती. यह नीतिगत मजबूती यूरो के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर रही है, जो इसे अमेरिकी डॉलर के बढ़ते दबाव के बीच भी बाजार में टिके रहने की ताकत देती है.
फ्रैंकफर्ट और वॉशिंगटन की मौद्रिक नीतियों में बड़ा अंतर
ईसीबी द्वारा अपनाया गया यह नीतिगत रास्ता वॉशिंगटन में फेडरल रिजर्व (फेड) द्वारा अपनाई जा रही रणनीति के बिल्कुल विपरीत है. वैश्विक मुद्रा बाजारों के लिए अब इस बड़े अंतर को नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है. फेड के चेयरमैन केविन वॉर्श ने अमेरिका में कीमतों की स्थिरता बहाल करने की आवश्यकता पर बार-बार जोर दिया है. हालांकि, भविष्य के नीतिगत कदमों को लेकर कोई स्पष्ट संकेत (फॉरवर्ड गाइडेंस) न देने के उनके फैसले ने बाजार के लिए अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है. फेड की ओर से भविष्य के स्पष्ट रुख की कमी के कारण निवेशकों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक नए आर्थिक आंकड़ों पर किस तरह की प्रतिक्रिया देगा.
फेडरल रिजर्व के भीतर चल रही यह आंतरिक खींचतान चेयरमैन केविन वॉर्श के नीतिगत निर्णयों को लगातार प्रभावित कर रही है. केविन वॉर्श ने अस्थिर महंगाई के दौर के बाद मूल्य स्थिरता हासिल करने की प्रतिबद्धता जताई है. लेकिन उनके द्वारा किसी भी तरह की अग्रिम नीतिगत घोषणा न करने से बाजार में भ्रम फैला है. निवेशक अब यह अनुमान लगाने में असमर्थ हैं कि आने वाले पीपीआई (PPI) या सीपीआई (CPI) जैसे महंगाई के आंकड़ों पर केंद्रीय बैंक का अगला कदम क्या होगा.
फेड का सख्त रुख भी डॉलर के लिए क्यों नहीं हो रहा मददगार
आमतौर पर, जब भी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाता है, तो अमेरिकी डॉलर (USD) में मजबूती देखने को मिलती है. लेकिन मौजूदा बाजार की स्थिति यह दर्शाती है कि अब ऐसा होना तय नहीं है. चूंकि वित्तीय बाजार पहले से ही अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की पूरी संभावना को अपनी कीमतों में शामिल (डिस्काउंट) कर चुके हैं, इसलिए केवल इस उम्मीद पर डॉलर में और तेजी आने की गुंजाइश सीमित है. यदि फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को बढ़ाने के बजाय उन्हें स्थिर रखने का फैसला करता है, तो इससे वैश्विक मुद्रा बाजारों में अचानक तेज बदलाव आ सकता है, जिससे डॉलर की वैल्यू में भारी गिरावट आ सकती है.
अमेरिकी डॉलर को अपनी बढ़त बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि फेड निवेशकों की मौजूदा सख्त उम्मीदों को पूरा करे. यह स्थिति ऐसे समय में बनी हुई है जब फेड चेयरमैन केविन वॉर्श की स्वतंत्रता की परीक्षा हो रही है, क्योंकि उन पर ब्याज दरें कम करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप का लगातार राजनीतिक दबाव है. डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगातार मिलने वाले बयानों ने केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया है.
प्रमुख मुद्रा जोड़ों में हलचल की स्थिति
केंद्रीय बैंकों के इन फैसलों की उम्मीदों का असर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं पर साफ देखा जा रहा है. सोमवार को एशियाई व्यापारिक सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर (AUD/USD) की जोड़ी में गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह करीब डेढ़ हफ्ते के निचले स्तर 0.7140 के पास पहुंच गई. हालांकि इस जोड़ी में और अधिक गिरावट के लिए पर्याप्त रफ्तार नहीं दिखी, फिर भी स्पॉट कीमतें 0.7100 के मध्य स्तर से थोड़ी ऊपर बनी हुई थीं, जो कि दिन के दौरान लगभग 0.25% की गिरावट को दर्शाती हैं.
दूसरी ओर, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर (USD/JPY) में सप्ताह की शुरुआत में कुछ खरीदारी देखी गई और यह एशियाई सत्र के दौरान 154.00 के स्तर के करीब पहुंच गया. इससे पिछले शुक्रवार को हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई हो सकी. इसके बावजूद, यह जोड़ी पिछले एक हफ्ते से एक सीमित दायरे में ही कारोबार कर रही है और यह पिछले मंगलवार को छुए गए लगभग सात महीने के निचले स्तर के बेहद करीब बनी हुई है. बाजार के कारोबारी इस हफ्ते होने वाली केंद्रीय बैंकों की महत्वपूर्ण बैठकों का इंतजार कर रहे हैं.
सोने की कीमतों में गिरावट और क्रिप्टोकरेंसी में मजबूती
फेड के आगामी फैसले के प्रभाव से कमोडिटी और डिजिटल एसेट्स भी अछूते नहीं रहे हैं. सोमवार को सोने की कीमतें गिरकर 4,300 डॉलर के स्तर से नीचे आ गईं. बुधवार को फेड के नीतिगत फैसले से पहले अमेरिकी डॉलर की मांग में आई भारी तेजी के कारण सोने पर यह दबाव देखा गया, क्योंकि निवेशकों ने ब्याज दरें बढ़ाए जाने की उम्मीदें बढ़ा दी हैं. प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) और कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) की मजबूत रिपोर्टों के बाद ब्याज दरों में बढ़ोतरी की ये उम्मीदें और मजबूत हुई हैं. ऐसे में फेड का आने वाला 'डॉट प्लॉट' डॉलर की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा.
इसके विपरीत, क्रिप्टोकरेंसी बाजार में सोमवार को स्थिरता के साथ सकारात्मक रुख देखा गया. बिटकॉइन मामूली बढ़त के साथ 77,884 डॉलर के स्तर के आसपास कारोबार कर रहा था, जो कि पूरे डिजिटल एसेट बाजार में देखी गई तेजी के अनुकूल है. एथेरियम और रिपल जैसी अन्य बड़ी क्रिप्टोकरेंसी भी बिटकॉइन के इसी मिले-जुले से सकारात्मक रुख पर चलती दिखीं. एथेरियम ने 2,521 डॉलर के अपने महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल को सफलतापूर्वक बनाए रखा, जबकि रिपल 1.38 डॉलर के सपोर्ट स्तर से ऊपर टिकने में कामयाब रहा, जो व्यापक आर्थिक अनिश्चितता के बीच डिजिटल संपत्तियों की मजबूती को दर्शाता है.


















