अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आगामी नीतिगत फैसलों पर दुनिया भर के वित्तीय बाजारों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि अब ब्याज दरों को लेकर निवेशकों की उम्मीदें बदलने लगी हैं। जैक्सन होल संगोष्ठी में फेड अध्यक्ष केविन वॉर्श के संबोधन के बाद केंद्रीय बैंक के अगले कदमों को लेकर बाजार के अनुमानों में बड़ा बदलाव आया है। विश्लेषक अब सितंबर में ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट (25bp) की बढ़ोतरी को एक बेहद संभावित कदम मान रहे हैं। इस दृष्टिकोण को हाल ही में आए आर्थिक आंकड़ों से भी समर्थन मिला है। श्रम बाजार और मुद्रास्फीति के मौजूदा रुख से संकेत मिलते हैं कि केंद्रीय बैंक को लगातार ब्याज दरें बढ़ाने की कोई लंबी श्रृंखला शुरू करने की आवश्यकता नहीं होगी। यह उस पारंपरिक धारणा को चुनौती देता है जिसके तहत माना जाता है कि एक बार ब्याज दर बढ़ने के बाद आगे भी बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहता है।
बाजार की उम्मीदें और एकल बढ़ोतरी का अनुमान
सामान्य परिस्थितियों में वित्तीय बाजार यह मानकर चलते हैं कि जब फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला करता है, तो वह केवल एक बार ऐसा नहीं करता। ऐतिहासिक रूप से, एक एकल बढ़ोतरी को नीति कड़ा करने के बड़े चक्र की शुरुआत माना जाता है। इसी सोच के तहत वित्तीय बाजार वर्तमान में 16 सितंबर को होने वाली लगभग तय बढ़ोतरी के बाद ढाई और बार दरों में वृद्धि की उम्मीद लगा रहे हैं। बाजार के खिलाड़ी 16 सितंबर की इस बढ़ोतरी को पूरी तरह से तय मानकर चल रहे हैं। हालांकि, इन आक्रामक अनुमानों के विपरीत मौजूदा आर्थिक विश्लेषण कुछ और ही संकेत दे रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि इस बार एक बार बढ़ोतरी और फिर विराम की स्थिति बन सकती है, जिसमें सितंबर की बढ़ोतरी ही आखिरी होगी। नौकरियों और मुद्रास्फीति के अनुमान किसी लंबी बढ़ोतरी श्रृंखला की जरूरत का समर्थन नहीं करते हैं, जिससे संकेत मिलता है कि सितंबर की बैठक के बाद केंद्रीय बैंक अपनी नीति के असर का आकलन करने के लिए रुक सकता है।
आर्थिक आंकड़े जो नीतिगत बदलाव का दे रहे हैं संकेत
आर्थिक आंकड़ों पर गहराई से नजर डालने पर उन कारणों का पता चलता है जिनकी वजह से ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर रोक लग सकती है। फेडरल रिजर्व द्वारा अपने पिछले आर्थिक अनुमान जारी किए जाने के बाद से कई प्रमुख आंकड़ों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी का संकेत दिया है। सबसे पहले, दूसरी तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की रिपोर्ट उम्मीद से कमजोर रही है। दूसरा, अगस्त के रोजगार आंकड़ों में आए अप्रत्याशित उछाल के बावजूद, कुल मिलाकर रोजगार सृजन की रफ्तार धीमी पड़ी है। मुद्रास्फीति के मोर्चे पर भी राहत के संकेत दिख रहे हैं, हालांकि सालाना आधार पर महंगाई दर अभी भी फेडरल रिजर्व के 2% के दीर्घकालिक लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। कुछ ऐसे कारक हैं जो अगले साल तक मुद्रास्फीति को 2% के लक्ष्य तक लाने में मदद करेंगे। इनमें कमजोर वेतन वृद्धि, टैरिफ रिफंड और सुस्त रियल एस्टेट बाजार शामिल हैं, जिसके कारण आवास संबंधी मुद्रास्फीति में मंदी आएगी। हालांकि, महंगाई को कम करने का यह रास्ता पूरी तरह से जोखिम मुक्त नहीं है, क्योंकि कच्चे तेल की अस्थिर कीमतें उपभोक्ता कीमतों के नीचे जाने के रास्ते में सबसे बड़ा खतरा बनी हुई हैं।
अमेरिकी डॉलर और वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार पर असर
फेडरल रिजर्व की नीति में बदलाव की इन उम्मीदों का अमेरिकी डॉलर और वैश्विक मुद्रा बाजारों पर सीधा असर पड़ेगा। वैसे तो आमतौर पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी से डॉलर में मजबूती आती है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इस बार अमेरिकी डॉलर को बहुत मजबूत होने की आवश्यकता नहीं है। इसका कारण यह है कि सितंबर की ब्याज दर बढ़ोतरी को नीति में केवल एक मामूली सुधार माना जा रहा है, न कि एक नए सख्त चक्र की शुरुआत। परिणामस्वरूप, अगले साल अमेरिकी डॉलर में गिरावट का रुख बने रहने का अनुमान है। यह गिरावट अगले साल की दूसरी तिमाही में विशेष रूप से देखने को मिल सकती है, जब अमेरिकी मुद्रास्फीति अपने लक्ष्य पर वापस आ जाएगी। एक बार जब महंगाई नियंत्रित हो जाएगी, तो मुद्रा बाजार ब्याज दरों को कड़ा करने के बजाय नीति को उदार बनाने यानी दरों में कटौती पर ध्यान केंद्रित करने लगेंगे, जिससे डॉलर पर दबाव बढ़ेगा।
प्रमुख मुद्रा जोड़ों का प्रदर्शन
विदेशी मुद्रा बाजार में इन आर्थिक उम्मीदों का असर प्रमुख मुद्रा जोड़ों के उतार-चढ़ाव में साफ देखा जा सकता है
- सोमवार को एशियाई व्यापारिक सत्र के दौरान AUD/USD की जोड़ी दबाव में रही और करीब डेढ़ सप्ताह के निचले स्तर 0.7140 के आसपास पहुंच गई। हालांकि, इस स्तर पर पहुंचने के बाद बिकवाली की रफ्तार सुस्त पड़ गई। अंततः स्पॉट कीमतें 0.7100 के मध्य स्तर से थोड़ा ऊपर स्थिर हुईं, जो इस दिन करीब 0.25% की गिरावट को दर्शाती हैं।
- दूसरी ओर, सप्ताह की शुरुआत में USD/JPY जोड़ी को खरीदारों का समर्थन मिला और यह एशियाई सत्र में 154.00 के स्तर के करीब पहुंच गई। इस बढ़त से पिछले शुक्रवार को हुए नुकसान की कुछ भरपाई हुई। इसके बावजूद, यह जोड़ी पिछले एक सप्ताह से बनी अपनी सीमित सीमा में ही घूम रही है और पिछले मंगलवार को छुए गए लगभग सात महीने के निचले स्तर के बेहद करीब बनी हुई है। निवेशक इस सप्ताह होने वाली प्रमुख केंद्रीय बैंकों की बैठकों और फैसलों का इंतजार कर रहे हैं।
सोने में गिरावट और क्रिप्टो बाजार में मजबूती
वित्तीय बाजारों में आए इस बदलाव का असर कमोडिटी और डिजिटल एसेट बाजारों पर भी देखने को मिला। सोमवार को सोने की कीमतों में गिरावट तेज हुई और यह प्रति ट्रॉय औंस 4,250 डॉलर के स्तर के करीब पहुंच गया। अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आई तेजी के कारण सोना कई सप्ताह के निचले स्तर के करीब आ गया। सोने की कीमतों में आई इस गिरावट के पीछे फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की लगातार लग रही अटकलें और कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी के कारण दोबारा उभरीं महंगाई की चिंताएं शामिल हैं।
इसके विपरीत, क्रिप्टोकरेंसी बाजार में लचीलापन और मजबूती देखी गई। सोमवार को बिटकॉइन की कीमत ऊपर चढ़कर 77,884 डॉलर के स्तर के करीब पहुंच गई, जो पूरे डिजिटल एसेट बाजार में आई तेजी के अनुकूल है। अन्य प्रमुख क्रिप्टोकरेंसी भी इसी तरह के सकारात्मक रुख पर रहीं, जिसमें एथेरियम 2,521 डॉलर और रिपल 1.38 डॉलर के अपने महत्वपूर्ण समर्थन स्तरों को बनाए रखने में सफल रहे।
महंगाई रिपोर्ट, डॉट प्लॉट और राजनीतिक दबाव
हाल ही में आई उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की रिपोर्टों के बाद फेड द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदें और मजबूत हुई हैं। आने वाले समय में फेडरल रिजर्व का नया डॉट प्लॉट बेहद महत्वपूर्ण होगा, जो यह तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा कि अमेरिकी डॉलर का अगला रुख क्या होगा। इसके साथ ही, राजनीतिक दबाव भी इस स्थिति को जटिल बना रहा है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ब्याज दरों को कम रखने के लगातार दबाव के बीच फेड अध्यक्ष केविन वॉर्श की केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता की एक बड़ी परीक्षा होगी। अगर अमेरिकी डॉलर को अपनी तेजी को आगे बढ़ाना है, तो फेड को बाजार की मौजूदा सख्त नीतिगत उम्मीदों को पूरा करना होगा।


















