फेडरल रिजर्व के नए ब्याज दर फैसले ने USD/CAD में तेज बदलाव ला दिया। जोड़ी 48 पिप्स ऊपर जाकर छह सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंची, जिसका मतलब कैनेडियाई डॉलर यानी लूनी के लिए छह सप्ताह का निचला स्तर था।
यह चाल इसलिए भी अहम थी क्योंकि कैनेडा की ब्याज दर सात बैठकों में नहीं बदली, जबकि अमेरिकी ब्याज दर में ताजा फैसले के साथ बदलाव आया। दोनों तरफ नीति की यह अलग दिशा मुद्रा बाजार के लिए साफ पृष्ठभूमि बन गई।
संकीर्ण रेंज से तेज बाहरनिकलने की चाल
USD/CAD अठारह घंटों तक लगभग 25 पिप्स की सीमा में ही घूमता रहा। फैसले के आसपास के आधे घंटे में जोड़ी ने उस दूरी से दोगुना सफर तय कर लिया, और पहले की धीमी चाल अचानक तेज चाल में बदल गई।
फैसले से पहले के स्तर से नापने पर कुल इजाफा 48 पिप्स था। जोड़ी 1.4000 से थोड़ा नीचे एक शीर्ष तक पहुंची और वहां से चार पिप्स नीचे कारोबार कर रही थी। शुरुआती बाजार आंकड़े ने छह सप्ताह का उच्च स्तर 1.3990 से नीचे बताया था।
उस दिन का निचला स्तर 62 पिप्स नीचे था और यह स्तर दोपहर से पहले बना था। बाद में कीमत वहां वापस नहीं गई। पांच-मिनट के मोमेंटम गेज में 72 दिख रहा था, और उसी दिन इस स्तर की पिछली हर पहुंच केवल कुछ मिनट तक ही टिकी थी।
कैनेडा और अमेरिका की अलग नीति
कैनेडा की दर सात बैठकों तक एक जैसी रही। दूसरी ओर, फेडरल रिजर्व ने हाल ही के फैसले में अपनी दर बदल दी। मुद्रा बाजार में ऐसा अंतर महत्वपूर्ण होता है क्योंकि एक देश की दर बदलने पर उसकी मुद्रा पकड़ने का आकर्षण बदल सकता है, भले ही दूसरे देश की दर वही बनी रहे।
यह जानकारी किसी भविष्य के फैसले की भविष्यवाणी नहीं करती। यह केवल उस वक्त की स्पष्ट पृष्ठभूमि बताती है: अमेरिकी पक्ष में ताजा बदलाव था, जबकि कैनेडियाई पक्ष में सात बैठकों का स्थिर सिलसिला था। इसलिए USD/CAD की 48 पिप्स की चाल को नीतिगत अंतर के संदर्भ में देखा गया।
फेडरल रिजर्व के दो मुख्य लक्ष्य
अमेरिका में मौद्रिक नीति की दिशा फेडरल रिजर्व तय करता है। उसके सामने दो बड़े उद्देश्य हैं: कीमतों में स्थिरता बनाना और पूर्ण रोजगार को बढ़ावा देना। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सबसे अहम साधन ब्याज दरों में बदलाव है।
जब कीमतें बहुत तेजी से बढ़ रही हों और महंगाई दर फेडरल रिजर्व के 2% लक्ष्य से ऊपर चली जाए, तो फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ा सकता है। इससे पूरी अर्थव्यवस्था में उधार लेने की लागत बढ़ती है। अमेरिका में पूंजी रखना अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक हो सकता है, जिससे अमेरिकी डॉलर को सहारा मिलता है।
दूसरी स्थिति में, यदि महंगाई दर 2% से नीचे आ जाए या बेरोजगारी दर बहुत अधिक हो, तो फेडरल रिजर्व दरें घटा सकता है। सस्ता उधार लेने को प्रोत्साहित करना इस कदम का उद्देश्य हो सकता है, लेकिन निची दरें अमेरिकी डॉलर यानी ग्रीनबैक पर दबाव डाल सकती हैं।
ब्याज दर से विनिमय दर तक कैसे पहुंचता है असर
USD/CAD बताता है कि एक अमेरिकी डॉलर के बदले कितने कैनेडियाई डॉलर मिलते हैं। जोड़ी ऊपर जाए तो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कैनेडियाई डॉलर कमजोर होता है; नीचे आने पर लूनी को मजबूती मिलती है। फेडरल रिजर्व की दर बढ़ोतरी इस मामले में अमेरिकी डॉलर की मजबूती और कैनेडियाई डॉलर की कमजोरी, दोनों के रूप में दिखी।
इस असर की शुरुआत उधार की लागत से होती है। दरें बढ़ने पर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में वित्तपोषण महंगा हो जाता है। यदि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को अमेरिकी संपत्तियों में पैसा रखना अधिक आकर्षक लगे, तो डॉलर की मांग बढ़ सकती है। ऐसी मांग USD/CAD को ऊपर धकेल सकती है, और फैसले के आसपास 48 पिप्स की चाल यही बाजार प्रतिक्रिया थी।
कैनेडा की ओर से सात बैठकों तक कोई दर बदलाव नहीं बताया गया। इसलिए फेडरल रिजर्व के कदम को संतुलित करने वाला समान कैनेडियाई दर परिवर्तन सामने नहीं था। यह अगली नीति का वादा नहीं है, लेकिन उस समय की मुद्रा चाल की पृष्ठभूमि स्पष्ट करता है।
मौद्रिक नीति का फैसला कौन लेता है
फेडरल रिजर्व साल में आठ नीतिगत बैठकें करता है। इन बैठकों में फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) आर्थिक हालात का आकलन करती है और मौद्रिक नीति से जुड़े फैसले लेती है।
इस समिती में कुल बारह अधिकारी शामिल होते हैं। इनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात सदस्य, फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अध्यक्ष और बाकी ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों के अध्यक्षों में से चार शामिल होते हैं। क्षेत्रीय अध्यक्षों के चार स्थान बारी-बारी से आते हैं, और चयनित सदस्य एक वर्ष के कार्यकाल के लिए समिती में रहता है।
संकट में क्वांटिटेटिव ईजिंग का उपयोग
बेहद कठिन स्थितियों में फेडरल रिजर्व क्वांटिटेटिव ईजिंग यानी QE का सहारा ले सकता है। यह तब किया जाता है जब वित्तीय प्रणाली फंस जाए और क्रेडिट का प्रवाह तेजी से बढ़ाने की जरूरत हो। यह सामान्य से हटकर अपनाई जाने वाली नीति है, जो संकट के दौर में या महंगाई बेहद कम होने पर इस्तेमाल हो सकती है।
2008 के महावित्तीय संकट के दौरान QE फेडरल रिजर्व का मुख्य हथियार था। इस प्रक्रिया में अधिक डॉलर छापकर वित्तीय संस्थाओं से उच्च गुणवत्ता वाले बॉन्ड खरीदे जाते हैं। क्रेडिट का प्रवाह बढ़ाने वाले इस कदम से आमतौर पर अमेरिकी डॉलर कमजोर होता है।
QE केवल ब्याज दर बदलने का दूसरा नाम नहीं है। यह बॉन्ड खरीद और क्रेडिट उपलब्धता के जरिए वित्तीय प्रणाली में धन के प्रवाह को बढ़ाता है। इसलिए इसका सामान्य असर डॉलर पर दर बढ़ाने वाले कदम से अलग होता है: QE आमतौर पर डॉलर को कमजोर करता है, जबकि ऊंची दरें डॉलर के लिए आकर्षण बढ़ा सकती हैं।
क्वांटिटेटिव टाइटनिंग उल्टी दिशा में काम करती है
क्वांटिटेटिव टाइटनिंग यानी QT, QE की उल्टी प्रक्रिया है। इसमें फेडरल रिजर्व वित्तीय संस्थाओं से बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है। साथ ही, उसके पास मौजूद बॉन्डों के अधिक परिपक्व होने पर मिलने वाले मूलधन को नए बॉन्ड खरीदने के लिए फिर से नहीं लगाया जाता।
इसका मतलब है कि बाजार में अतिरिक्त खरीदारी या पुराने बॉन्डों से लौटने वाली रकम के जरिए समान समर्थन जारी नहीं रखा जाता। इस नीति का असर आमतौर पर अमेरिकी डॉलर के मूल्य के लिए सकारात्मक माना जाता है।
QE और QT मिलकर दिखाते हैं कि फेडरल रिजर्व के पास ब्याज दर के अलावा भी साधन हैं। दर बदलाव उधार की लागत और निवेशकों की पसंद से गुजरता है, जबकि QE और QT क्रेडिट प्रवाह और बॉन्ड होल्डिंग्स से असर डालते हैं। डॉलर पर इनके आम असर एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।
तेज बाजार चाल से क्या संकेत मिलता है
अठारह घंटे तक 25 पिप्स की सीमा में रहने के बाद आधे घंटे में दोगुनी दूरी तय होना दिखाता है कि फैसले ने बाजार की गति तुरंत बदल दी। लेकिन पांच-मिनट के मोमेंटम गेज का 72 रहना अकेले यह नहीं बताता कि छह सप्ताह का उच्च स्तर लंबे समय तक बना रहेगा। उसी दिन इस स्तर की पिछली हर चाल केवल मिनटों में समाप्त हो चुकी थी।
अगली नीतिगत दिशा अभी तय नहीं है। फेडरल रिजर्व के ढांचे में 2% के मुकाबले महंगाई की स्थिति और बेरोजगारी दर केंद्रीय बनी रहती हैं। अभी पुष्ट तथ्य यही हैं कि फेडरल रिजर्व ने दर बढ़ाई, कैनेडा की दर सात बैठकों में नहीं बदली और USD/CAD 48 पिप्स चढ़कर छह सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंचा।


















