यूरोपीय कारोबारी सत्र के दौरान मंगलवार को यूरो ने जापानी येन के मुकाबले अपनी बढ़त को लगातार बनाए रखा और यह करेंसी जोड़ा 179.00 के स्तर के आसपास कारोबार करता हुआ दिखाई दिया। यूरो-येन (EUR/JPY) दर में लगातार दूसरे दिन आई इस मजबूती की मुख्य वजह वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। तेल की बढ़ती कीमतों ने जापान की आयात लागत को काफी बढ़ा दिया है, जिससे जापानी येन पर भारी बिकवाली का दबाव देखा जा रहा है क्योंकि जापान अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। हालांकि, येन को निचले स्तरों पर कुछ सहारा भी मिल रहा है। बाजार में इस बात की चर्चा है कि बैंक ऑफ जापान (BOJ) आने वाले समय में अपनी मौद्रिक नीतियों को सख्त कर सकता है। इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर कैरी ट्रेड को समेटने और जापानी निवेशकों द्वारा विदेशी संपत्तियों को वापस देश में लाना येन की गिरावट को सीमित कर रहा है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और जापानी येन पर दबाव
जापान एक ऐसा देश है जिसके पास अपने प्राकृतिक संसाधनों की भारी कमी है। यही कारण है कि जापान की पूरी अर्थव्यवस्था बाहरी देशों से आयात किए जाने वाले कच्चे तेल और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर करती है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो जापान के व्यापार संतुलन पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है। देश को उतनी ही मात्रा में तेल आयात करने के लिए कहीं अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। इस वजह से घरेलू कंपनियों को जापानी येन बेचकर अमेरिकी डॉलर जैसी विदेशी मुद्राएं खरीदनी पड़ती हैं ताकि वे अपने आयात बिलों का भुगतान कर सकें। बाजार में येन की इस लगातार बिकवाली के कारण येन की विनिमय दर पर नकारात्मक असर पड़ता है।
इसके बावजूद, येन की इस गिरावट को थामने के लिए कुछ महत्वपूर्ण आर्थिक कारक भी काम कर रहे हैं। बाजार के निवेशक लगातार यह मानकर चल रहे हैं कि बैंक ऑफ जापान (BOJ) अपनी मौद्रिक नीतियों में बड़ा बदलाव कर सकता है और ब्याज दरों को और बढ़ा सकता है। इसके अलावा, वैश्विक वित्तीय बाजारों में कैरी ट्रेड को बंद करने की प्रक्रिया चल रही है। कैरी ट्रेड के तहत निवेशक कम ब्याज दर वाली मुद्रा जैसे येन में कर्ज लेकर उसे अधिक ब्याज देने वाली संपत्तियों में निवेश करते हैं। जब इन ट्रेडों को बंद किया जाता है, तो निवेशकों को कर्ज चुकाने के लिए येन खरीदना पड़ता है, जिससे येन की मांग बढ़ती है। साथ ही, जापानी घरेलू निवेशकों द्वारा विदेशों से अपनी पूंजी को वापस लाने के संकेत भी मिल रहे हैं, जिससे येन को काफी मदद मिल रही है।
यूरोपीय सेंट्रल बैंक की नीतियां और जर्मन ZEW सर्वे
येन के विपरीत, यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) के सख्त और आक्रामक रुख के कारण यूरो काफी मजबूत स्थिति में बना हुआ है। वित्तीय बाजारों के निवेशकों की नजरें अब जर्मनी और यूरोज़ोन के आर्थिक सेंटीमेंट को दर्शाने वाले ZEW सर्वे डेटा पर टिकी हुई हैं, जो आर्थिक दिशा तय करने में मदद करेगा।
यूरोपीय सेंट्रल बैंक के शीर्ष अधिकारियों ने बार-बार चेतावनी दी है कि महंगाई बढ़ने का जोखिम अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। हाल ही में ब्याज दरों में की गई चौथाई प्रतिशत की बढ़ोतरी के बाद भी केंद्रीय बैंक ने आगे और दरों को बढ़ाने की संभावना जताई है। गोल्डमैन सैक्स, सिटी और बार्कलेज जैसे दुनिया के दिग्गज निवेश बैंकों ने अपने अनुमानों में बदलाव किया है और उन्हें उम्मीद है कि दिसंबर में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी होगी। LSEG के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर में ब्याज दर बढ़ने की संभावना 94% तक पहुंच गई है। वहीं, सिटी के विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय सेंट्रल बैंक की यह नीतिगत सख्ती मार्च 2027 तक जारी रह सकती है।
इस सख्त नीतिगत माहौल को देखते हुए कॉमर्जबैंक के अर्थशास्त्रियों ने अपने पुराने अनुमानों को बदला है। बैंक का मानना है कि दिसंबर में होने वाली बैठक में दरों को तीसरी बार बढ़ाया जा सकता है, जिससे जमा दर बढ़कर 2.75% हो जाएगी। कॉमर्जबैंक के विश्लेषकों का कहना है कि मुख्य मुद्रास्फीति के ऊंचे स्तर पर बने रहने के कारण महंगाई लंबे समय तक लक्ष्य से ऊपर रहेगी। इसी वजह से उन्होंने साल 2027 में होने वाली ब्याज दरों में कटौती की संभावना को अपने अनुमानों से हटा दिया है।
केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियां और ब्याज दरों का आर्थिक गणित
विदेशी मुद्रा बाजारों में हो रहे इन उतार-चढ़ाव को समझने के लिए केंद्रीय बैंकों की कार्यप्रणाली को समझना बेहद जरूरी है। ब्याज दरें मूल रूप से कर्ज लेने की लागत या बचत पर मिलने वाला प्रतिफल होती हैं। केंद्रीय बैंक कीमतों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए इन ब्याज दरों का उपयोग मुख्य हथियार के रूप में करते हैं, जहां आमतौर पर 2% की मुख्य मुद्रास्फीति दर को लक्षित किया जाता है।
जब किसी देश की आर्थिक विकास दर धीमी होती है और महंगाई 2% के लक्ष्य से नीचे गिर जाती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करते हैं। इससे कर्ज सस्ते हो जाते हैं, जिससे उपभोक्ता और कारोबारी अधिक खर्च और निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है। इसके विपरीत, जब महंगाई 2% के लक्ष्य से काफी अधिक बढ़ जाती है, तो केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था को ठंडा करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करते हैं। इससे कर्ज महंगे हो जाते हैं और मांग में कमी आती है, जिससे महंगाई नियंत्रित होती है। विदेशी मुद्रा बाजार में, अधिक ब्याज दर वाले देश की संपत्तियां विदेशी निवेशकों को आकर्षित करती हैं, जिससे उस देश की मुद्रा मजबूत होती है।
बॉन्ड यील्ड, अमेरिकी डॉलर और सोने की कीमतों का संबंध
ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव का सीधा असर सोने जैसी मूल्यवान धातुओं पर भी पड़ता है। जब ब्याज दरें उच्च स्तर पर होती हैं, तो सोने जैसे बिना ब्याज देने वाले साधनों में निवेश करने की अवसर लागत बढ़ जाती है। चूंकि सोने पर निवेशकों को कोई नियमित ब्याज या लाभांश नहीं मिलता, इसलिए निवेशक अपना पैसा ब्याज देने वाले बॉन्ड या बैंक खातों में लगाना पसंद करते हैं, जिससे सोने की बिकवाली बढ़ती है।
इसके अलावा, अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी से अमेरिकी डॉलर भी मजबूत होता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में आंकी जाती है, इसलिए डॉलर के मजबूत होने से अन्य देशों के खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे इसकी मांग और कीमतों में गिरावट आती है।
फेड फंड्स रेट और CME FedWatch टूल का महत्व
वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों की दिशा तय करने में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियां सबसे अहम होती हैं। फेड फंड्स रेट वह बेंचमार्क ब्याज दर है जिस पर अमेरिकी वाणिज्यिक बैंक रात भर के लिए एक-दूसरे को धन उधार देते हैं। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) इस दर को एक सीमा के भीतर तय करती है, जैसे कि 4.75% से 5.00%, जिसमें ऊपरी सीमा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है।
भविष्य की ब्याज दरों का अनुमान लगाने के लिए बाजार के खिलाड़ी CME FedWatch टूल का उपयोग करते हैं। जब कच्चे तेल की महंगाई के कारण ब्याज दरें ऊंची रहने की संभावना बढ़ती है, तो अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच जाती है, जिससे डॉलर को भारी समर्थन मिलता है।
अन्य मुद्रा जोड़ियों का विश्लेषण: AUD/USD और USD/JPY
अगर हम अन्य प्रमुख मुद्रा जोड़ियों की बात करें, तो ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव में रहा। मंगलवार को एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान AUD/USD की दर 0.7150 के स्तर से नीचे बनी रही, जो कि पिछले दिन दर्ज किए गए तीन सप्ताह के निचले स्तर के काफी करीब है। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में तेजी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण डॉलर मजबूत बना हुआ है। इसके अलावा, अगस्त महीने के लिए चीन से आए मिले-जुले आर्थिक आंकड़ों ने भी ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को कोई खास राहत नहीं दी, क्योंकि चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है।
इसी तरह, USD/JPY जोड़ी मंगलवार की सुबह 155.00 के स्तर की ओर बढ़ती नजर आई। निवेशक इस सप्ताह होने वाली फेडरल रिजर्व की FOMC बैठक और बैंक ऑफ जापान की मौद्रिक नीति बैठक का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। जहां एक तरफ अमेरिकी डॉलर को ऊंचे बॉन्ड यील्ड से समर्थन मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी नीतियों को सामान्य बनाने के किसी भी संकेत से जापानी येन को मजबूती मिल सकती है, जिससे USD/JPY की तेजी सीमित होने की संभावना है।
FOMC बैठक से पहले सोने की कीमतों में सुस्ती
कमोडिटी बाजार में, सोने की कीमतें एशियाई सत्र की शुरुआती बढ़त को बनाए रखने में असमर्थ रहीं और यह $4,300 के स्तर के ठीक नीचे बनी रहीं। निवेशक दो दिवसीय FOMC बैठक के शुरू होने से पहले कोई बड़ा जोखिम नहीं लेना चाहते हैं और बाजार में सतर्क रुख अपना रहे हैं। इस बैठक के निष्कर्ष से आने वाले हफ्तों में डॉलर और सोने की दिशा तय होगी।

















